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AP · Class 10 · 📘 Physical_Science · Chapter 12

Magnetic Effects of Electric Current

అయస్కాంత క్షేత్రంఅయస్కాంత క్షేత్ర రేఖలుకుడిచేతి బొటనవేలు నియమంవృత్తాకార లూప్ ద్వారా అయస్కాంత క్షేత్రంసోలెనాయిడ్అయస్కాంత క్షేత్రంలో విద్యుత్ ప్రవాహం ఉన్న వాహకంపై బలం

ఈ అధ్యాయం విద్యుత్ ప్రవాహం యొక్క అయస్కాంత ప్రభావాలను వివరిస్తుంది. అయస్కాంత క్షేత్రాలు, అయస్కాంత క్షేత్ర రేఖలు, కుడిచేతి బొటనవేలు నియమం, వృత్తాకార లూప్ ద్వారా ప్రవహించే విద్యుత్ వల్ల ఏర్పడే అయస్కాంత క్షేత్రం మరియు అయస్కాంత క్షేత్రంలో విద్యుత్ ప్రవాహం ఉన్న వాహకంపై పనిచేసే బలం వంటి ముఖ్యమైన అంశాలను ఇది కవర్ చేస్తుంది. విద్యుత్ మోటారుల పనితీరుకు ఈ సూత్రాలు ఎలా ఆధారమో కూడా ఇది వివరిస్తుంది. అయస్కాంతత్వం మరియు విద్యుత్ మధ్య ఉన్న సంబంధాన్ని అర్థం చేసుకోవడానికి ఈ అధ్యాయం చాలా ముఖ్యం.

चुंबकीय क्षेत्र और क्षेत्र रेखाएँ

1. चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field)

  • चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ उसके बल का अनुभव किया जा सकता है, चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है।
  • यह एक सदिश राशि है, जिसकी दिशा और परिमाण दोनों होते हैं।

2. चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ (Magnetic Field Lines)

  • ये वे काल्पनिक रेखाएँ हैं जो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और प्रबलता को दर्शाती हैं।
  • गुणधर्म:
  • चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्तरी ध्रुव से निकलकर दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं और चुंबक के अंदर दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर जाती हैं, जिससे बंद वक्र बनाती हैं।
  • ये रेखाएँ कभी भी एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करतीं। यदि वे ऐसा करतीं, तो प्रतिच्छेदन बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र की दो दिशाएँ होतीं, जो असंभव है।
  • जहाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ घनी होती हैं (जैसे ध्रुवों पर), वहाँ चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता अधिक होती है
  • जहाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ विरल होती हैं, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता कम होती है
  • चुंबक के अंदर, क्षेत्र रेखाएँ समांतर और समान दूरी पर होती हैं, जो एक समान चुंबकीय क्षेत्र को दर्शाती हैं।

3. चुंबकीय कम्पास (Magnetic Compass)

  • यह एक छोटा चुंबक होता है, जिसकी सुई हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरती है
  • इसका उपयोग चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
  • कम्पास की उत्तरी ध्रुव (लाल सिरा) चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को इंगित करता है।
ముఖ్యమైనది

हेंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड ने 1820 में खोजा कि विद्युत धारा चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करती है। यह विद्युत और चुंबकत्व के बीच संबंध का पहला प्रमाण था।

💡సూచన

चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के गुणधर्म अक्सर 2-3 अंक के प्रश्न के रूप में पूछे जाते हैं। विशेष रूप से 'क्यों दो क्षेत्र रेखाएँ एक-दूसरे को प्रतिच्छेद नहीं करतीं' यह बहुत महत्वपूर्ण है।

धारावाही चालक के कारण चुंबकीय क्षेत्र

1. सीधे धारावाही चालक के कारण चुंबकीय क्षेत्र

  • जब एक सीधा चालक (तार) से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसके चारों ओर संकेन्द्रीय वृत्ताकार चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्पन्न होती हैं।
  • इन वृत्तों का केंद्र चालक पर होता है।
  • क्षेत्र की प्रबलता:
  • चालक से दूरी बढ़ने पर चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता घटती है
  • चालक में प्रवाहित धारा के परिमाण में वृद्धि होने पर चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता बढ़ती है

2. चुंबकीय क्षेत्र की दिशा: दाएँ हाथ का अंगूठे का नियम (Right-Hand Thumb Rule)

  • यह नियम सीधे धारावाही चालक के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए उपयोग किया जाता है।
  • नियम: कल्पना कीजिए कि आप अपने दाएँ हाथ में धारावाही चालक को इस प्रकार पकड़े हुए हैं कि आपका अंगूठा धारा की दिशा की ओर संकेत करता है। तब आपकी मुड़ी हुई उंगलियाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा को दर्शाएँगी।
  • इस नियम को मैक्सवेल का कॉर्कस्क्रू नियम भी कहते हैं।
  • अनुप्रयोग:
  • यदि धारा ऊपर की ओर है, तो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ वामावर्त होंगी।
  • यदि धारा नीचे की ओर है, तो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ दक्षिणावर्त होंगी।

3. वृत्ताकार लूप के कारण चुंबकीय क्षेत्र

  • जब एक वृत्ताकार लूप से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो प्रत्येक बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ संकेन्द्रीय वृत्तों के रूप में होती हैं।
  • जैसे-जैसे हम लूप के केंद्र की ओर बढ़ते हैं, वृत्त बड़े होते जाते हैं और केंद्र पर लगभग सीधी रेखाओं के रूप में दिखाई देते हैं।
  • केंद्र पर क्षेत्र की दिशा: दाएँ हाथ के अंगूठे के नियम का उपयोग करके, लूप के प्रत्येक खंड के कारण केंद्र पर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा एक ही होती है
  • क्षेत्र की प्रबलता:
  • लूप में प्रवाहित धारा के सीधे आनुपातिक होती है।
  • लूप की त्रिज्या के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
  • यदि लूप में 'n' फेरे हों, तो चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता n गुना बढ़ जाती है, क्योंकि प्रत्येक फेरे का क्षेत्र जुड़ जाता है।

4. परिनालिका (Solenoid)

  • इंसुलेटेड तांबे के तार के कई वृत्ताकार फेरों को एक सिलेंडर के आकार में कसकर लपेटने पर बनी कुंडली को परिनालिका कहते हैं।
  • चुंबकीय क्षेत्र:
  • परिनालिका के अंदर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ समांतर सीधी रेखाएँ होती हैं, जो दर्शाती हैं कि अंदर एक समान चुंबकीय क्षेत्र है।
  • परिनालिका का चुंबकीय क्षेत्र छड़ चुंबक के चुंबकीय क्षेत्र के समान होता है
  • एक सिरा उत्तरी ध्रुव और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव की तरह व्यवहार करता है।
  • ध्रुवीयता का निर्धारण:
  • यदि परिनालिका के सिरे से देखने पर धारा दक्षिणावर्त प्रवाहित होती है, तो वह सिरा दक्षिणी ध्रुव (S-pole) होता है।
  • यदि परिनालिका के सिरे से देखने पर धारा वामावर्त प्रवाहित होती है, तो वह सिरा उत्तरी ध्रुव (N-pole) होता है।
  • क्षेत्र की प्रबलता बढ़ाने वाले कारक:
  • परिनालिका में फेरों की संख्या बढ़ाना।
  • प्रवाहित धारा का परिमाण बढ़ाना।
  • परिनालिका के अंदर नरम लोहे का क्रोड डालना (विद्युत चुंबक बनाने के लिए)।
📖నిర్వచనం

विद्युत चुंबक (Electromagnet): एक अस्थायी चुंबक जो तब बनता है जब एक नरम लोहे के क्रोड को धारावाही परिनालिका के अंदर रखा जाता है। इसकी प्रबलता को धारा और फेरों की संख्या बदलकर नियंत्रित किया जा सकता है।

గుర్తుంచుకోండి

परिनालिका के अंदर चुंबकीय क्षेत्र समान और प्रबल होता है, जबकि बाहर यह दुर्बल होता है।

चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल (फ्लेमिंग का वामहस्त नियम)

1. चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल

  • जब एक धारावाही चालक को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो चालक पर एक बल लगता है
  • इस बल की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और धारा की दिशा दोनों के लंबवत होती है।
  • यह बल विद्युत मोटर के कार्य सिद्धांत का आधार है।
  • बल का परिमाण निर्भर करता है:
  • चालक में प्रवाहित धारा के परिमाण पर।
  • चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता पर।
  • चालक की लंबाई पर।
  • चुंबकीय क्षेत्र और धारा की दिशा के बीच के कोण पर (अधिकतम जब लंबवत हो)।

2. फ्लेमिंग का वामहस्त नियम (Fleming's Left-Hand Rule)

  • यह नियम चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए उपयोग किया जाता है।
  • नियम: अपने बाएँ हाथ के अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा को इस प्रकार फैलाएँ कि वे एक-दूसरे के लंबवत हों
  • यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को दर्शाती है।
  • और मध्यमा धारा की दिशा को दर्शाती है।
  • तो अंगूठा चालक पर लगने वाले बल की दिशा को दर्शाएगा।
  • याद रखने का तरीका:
  • Forefinger (तर्जनी) → Field (क्षेत्र)
  • Central finger (मध्यमा) → Current (धारा)
  • Thumb (अंगूठा) → Thrust / Force (बल)

3. विद्युत मोटर (Electric Motor)

  • एक युक्ति जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करती है
  • सिद्धांत: यह इस सिद्धांत पर कार्य करता है कि जब एक धारावाही कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस पर एक बल आघूर्ण (torque) लगता है, जिससे वह लगातार घूमती है।
  • मुख्य भाग:
  • आर्मेचर कुंडली: एक आयताकार कुंडली (ABCD) जिसे नरम लोहे के क्रोड पर लपेटा जाता है।
  • प्रबल चुंबकीय क्षेत्र: स्थायी चुंबक (N और S ध्रुव) द्वारा उत्पन्न।
  • विभक्त वलय (Split Ring / Commutator): दो अर्ध-वृत्ताकार वलय (P और Q) जो कुंडली के सिरों से जुड़े होते हैं। यह धारा की दिशा को उत्क्रमित करता है, जिससे कुंडली लगातार एक ही दिशा में घूमती रहती है।
  • ब्रश (Brushes): कार्बन के ब्रश (X और Y) जो विभक्त वलय को छूते हैं और बैटरी से धारा प्रदान करते हैं।
  • बैटरी: कुंडली में धारा प्रवाहित करने के लिए।
  • कार्यविधि:
  1. जब कुंडली में धारा प्रवाहित होती है, तो फ्लेमिंग के वामहस्त नियम के अनुसार, भुजा AB पर नीचे की ओर और भुजा CD पर ऊपर की ओर बल लगता है।
  2. ये बल एक बल आघूर्ण बनाते हैं, जिससे कुंडली वामावर्त दिशा में घूमती है
  3. आधे घूर्णन के बाद, विभक्त वलय का संपर्क बदल जाता है (P का Y से और Q का X से), जिससे कुंडली में धारा की दिशा उत्क्रमित हो जाती है।
  4. अब भुजा CD पर नीचे की ओर और भुजा AB पर ऊपर की ओर बल लगता है, लेकिन बल आघूर्ण की दिशा वही रहती है, जिससे कुंडली लगातार एक ही दिशा में घूमती रहती है।
  • उपयोग: पंखे, रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, कंप्यूटर, MP3 प्लेयर आदि।
📖నిర్వచనం

बल आघूर्ण (Torque): वह घूर्णी बल जो किसी वस्तु को उसके अक्ष के चारों ओर घुमाता है।

💡సూచన

विद्युत मोटर का सिद्धांत, संरचना और कार्यविधि 5 अंक का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। विभक्त वलय के कार्य को स्पष्ट रूप से समझाना आवश्यक है।

विद्युत चुम्बकीय प्रेरण और विद्युत जनित्र

1. विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)

  • वह परिघटना जिसमें किसी चालक में सापेक्ष गति के कारण चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन से प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है, विद्युत चुम्बकीय प्रेरण कहलाती है।
  • माइकल फैराडे ने 1831 में इसकी खोज की।
  • प्रेरित धारा (Induced Current): इस प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न धारा।
  • प्रेरित विभवांतर (Induced Potential Difference): इस प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न विभवांतर।
  • प्रेरित धारा उत्पन्न करने के तरीके:
  • कुंडली के सापेक्ष चुंबक को गति कराना।
  • कुंडली के सापेक्ष दूसरी धारावाही कुंडली को गति कराना।
  • कुंडली के पास धारावाही कुंडली में धारा के परिमाण को बदलना।

2. फ्लेमिंग का दक्षिणहस्त नियम (Fleming's Right-Hand Rule)

  • यह नियम प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए उपयोग किया जाता है।
  • नियम: अपने दाएँ हाथ के अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा को इस प्रकार फैलाएँ कि वे एक-दूसरे के लंबवत हों
  • यदि तर्जनी चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को दर्शाती है।
  • और अंगूठा चालक की गति की दिशा को दर्शाता है।
  • तो मध्यमा प्रेरित धारा की दिशा को दर्शाएगी।
  • याद रखने का तरीका:
  • Forefinger (तर्जनी) → Field (क्षेत्र)
  • Thumb (अंगूठा) → Thrust / Motion (गति)
  • Central finger (मध्यमा) → Current (धारा)

3. विद्युत जनित्र (Electric Generator)

  • एक युक्ति जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है
  • सिद्धांत: यह विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • मुख्य भाग:
  • आर्मेचर कुंडली: एक आयताकार कुंडली (ABCD) जिसे चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है।
  • प्रबल चुंबकीय क्षेत्र: स्थायी चुंबक द्वारा उत्पन्न।
  • स्लिप रिंग (Slip Rings): दो पूर्ण वलय (R1 और R2) जो कुंडली के सिरों से जुड़े होते हैं और बाहरी परिपथ से संपर्क बनाए रखते हैं।
  • ब्रश (Brushes): कार्बन के ब्रश (B1 और B2) जो स्लिप रिंग को छूते हैं और बाहरी परिपथ में धारा प्रवाहित करते हैं।
  • कार्यविधि:
  1. जब कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है (यांत्रिक ऊर्जा), तो कुंडली से जुड़े चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है।
  2. फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम के अनुसार, कुंडली में प्रेरित धारा उत्पन्न होती है।
  3. फ्लेमिंग के दक्षिणहस्त नियम का उपयोग करके प्रेरित धारा की दिशा ज्ञात की जा सकती है।
  4. जब कुंडली आधे घूर्णन में होती है, तो धारा की दिशा उत्क्रमित हो जाती है, जिससे प्रत्यावर्ती धारा (AC) उत्पन्न होती है।
  5. दिष्ट धारा जनित्र (DC Generator): यदि स्लिप रिंग के स्थान पर विभक्त वलय (commutator) का उपयोग किया जाए, तो बाहरी परिपथ में दिष्ट धारा प्राप्त होती है।
  • उपयोग: बिजली उत्पादन संयंत्रों में।

4. प्रत्यावर्ती धारा (AC) और दिष्ट धारा (DC)

  • प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - AC):
  • वह धारा जिसकी दिशा निश्चित समय अंतराल के बाद उत्क्रमित होती रहती है
  • भारत में AC की आवृत्ति 50 Hz है (अर्थात 1 सेकंड में 100 बार दिशा बदलती है)।
  • इसे लंबी दूरी तक कम ऊर्जा हानि के साथ संचरित किया जा सकता है
  • घरों में उपयोग की जाने वाली धारा।
  • दिष्ट धारा (Direct Current - DC):
  • वह धारा जो हमेशा एक ही दिशा में प्रवाहित होती है
  • बैटरी, सेल, DC जनित्र द्वारा उत्पन्न।
  • लंबी दूरी तक संचरण में अधिक ऊर्जा हानि होती है।
  • इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उपयोग की जाती है।
ముఖ్యమైనది

विद्युत चुम्बकीय प्रेरण की खोज ने आधुनिक विद्युत उत्पादन और वितरण प्रणालियों की नींव रखी।

గుర్తుంచుకోండి

मोटर में विभक्त वलय (स्प्लिट रिंग) होता है, जबकि AC जनित्र में स्लिप रिंग होता है। DC जनित्र में भी विभक्त वलय का उपयोग होता है।

घरेलू विद्युत परिपथ

1. घरेलू विद्युत परिपथ (Domestic Electric Circuits)

  • हमारे घरों में विद्युत आपूर्ति प्रत्यावर्ती धारा (AC) के रूप में होती है, जिसकी वोल्टता 220 V और आवृत्ति 50 Hz होती है।
  • मुख्य आपूर्ति में तीन प्रकार के तार होते हैं:
  • विद्युन्मय तार (Live Wire): लाल रंग का इंसुलेशन, उच्च विभव पर (220 V)।
  • उदासीन तार (Neutral Wire): काला रंग का इंसुलेशन, शून्य विभव पर।
  • भू-संपर्क तार (Earth Wire): हरा रंग का इंसुलेशन, सुरक्षा के लिए। इसे धातु के उपकरण के बाहरी आवरण से जोड़ा जाता है।
  • समानांतर संयोजन (Parallel Connection): घरों में सभी उपकरण समानांतर क्रम में जुड़े होते हैं ताकि उन्हें समान वोल्टता मिले और एक उपकरण खराब होने पर भी अन्य काम करते रहें।

2. सुरक्षा उपाय (Safety Measures)

  • फ्यूज (Fuse):
  • एक सुरक्षा युक्ति जो परिपथ को अतिभारण (overloading) और लघुपथन (short-circuiting) से बचाती है।
  • यह उच्च प्रतिरोध और कम गलनांक वाले तार से बना होता है।
  • इसे हमेशा विद्युन्मय तार के श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है।
  • जब परिपथ में अत्यधिक धारा प्रवाहित होती है, तो फ्यूज तार पिघल जाता है और परिपथ टूट जाता है।
  • भू-संपर्कन (Earthing):
  • धातु के आवरण वाले विद्युत उपकरणों (जैसे रेफ्रिजरेटर, इलेक्ट्रिक आयरन) को भू-संपर्क तार से जोड़ा जाता है।
  • यदि उपकरण के धातु के आवरण में कोई दोष के कारण धारा प्रवाहित होती है, तो यह धारा भू-संपर्क तार के माध्यम से जमीन में चली जाती है, जिससे उपयोगकर्ता को विद्युत आघात से बचाया जा सकता है
  • अतिभारण (Overloading):
  • जब एक ही सॉकेट से बहुत सारे उपकरण जोड़ दिए जाते हैं या आपूर्ति वोल्टता में वृद्धि होती है, तो परिपथ में अत्यधिक धारा प्रवाहित होने लगती है। इसे अतिभारण कहते हैं।
  • इससे तारों में अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिससे आग लगने का खतरा होता है।
  • लघुपथन (Short-circuiting):
  • जब विद्युन्मय तार और उदासीन तार सीधे संपर्क में आ जाते हैं (इंसुलेशन खराब होने के कारण), तो परिपथ का प्रतिरोध बहुत कम हो जाता है और अत्यधिक धारा प्रवाहित होती है। इसे लघुपथन कहते हैं।
  • इससे भी आग लगने और उपकरणों को नुकसान होने का खतरा होता है।
  • MCB (Miniature Circuit Breaker):
  • आधुनिक घरों में फ्यूज के स्थान पर MCB का उपयोग किया जाता है।
  • अतिभारण या लघुपथन होने पर यह स्वचालित रूप से परिपथ को तोड़ देता है। इसे मैन्युअल रूप से रीसेट किया जा सकता है।
💡సూచన

फ्यूज, अतिभारण और लघुपथन की परिभाषाएँ और सुरक्षा उपायों का महत्व अक्सर 2-3 अंक के प्रश्नों में पूछा जाता है। भू-संपर्कन का कार्य भी महत्वपूर्ण है।

🚧తప్పుడు అభిప్రాయం

छात्र अक्सर फ्यूज को श्रेणी क्रम में जोड़ने का कारण भूल जाते हैं। याद रखें, यह तभी काम करेगा जब यह मुख्य धारा के मार्ग में हो।

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