DEVOTIONAL PATHS TO THE DIVINE
ఈ అధ్యాయం దైవానికి భక్తి మార్గాలను వివరిస్తుంది, ఇందులో అద్వైత సిద్ధాంతం, మోక్షం యొక్క భావన, ఆళ్వార్లు మరియు నాయనార్ల వంటి భక్తుల గురించి, భక్తి యొక్క ప్రాముఖ్యత మరియు యోగాసనాలు, బీజక్, అభంగ్ వంటి సంబంధిత అంశాలు ఉన్నాయి. ఇది విద్యార్థులకు భారతదేశ ఆధ్యాత్మిక మరియు భక్తి సంప్రదాయాలపై లోతైన అవగాహనను అందిస్తుంది, వివిధ మతపరమైన ఉద్యమాలు మరియు వాటి తత్వశాస్త్రాలను పరిచయం చేస్తుంది.
भक्ति आंदोलन का उदय: पृष्ठभूमि और विशेषताएँ
भक्ति आंदोलन मध्यकालीन भारत में एक महत्वपूर्ण धार्मिक सुधार आंदोलन था। इसका उद्देश्य ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत प्रेम और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करना था।
उदय के कारण
- जाति व्यवस्था की कठोरता और सामाजिक असमानता।
- कर्मकांडों और अनुष्ठानों की जटिलता।
- संस्कृत भाषा के प्रभुत्व के कारण आम लोगों की धर्म से दूरी।
- इस्लाम के एकेश्वरवाद और समानता के संदेश का प्रभाव।
- स्थानीय भाषाओं में धार्मिक साहित्य का विकास।
प्रमुख विशेषताएँ
- एकेश्वरवाद: अधिकांश भक्ति संतों ने एक ही ईश्वर में विश्वास पर जोर दिया, चाहे वह किसी भी रूप में हो।
- व्यक्तिगत भक्ति: ईश्वर के प्रति गहरा व्यक्तिगत प्रेम और समर्पण मोक्ष का मार्ग माना गया।
- जाति व्यवस्था का खंडन: भक्ति संतों ने जाति, पंथ और लिंग के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार किया।
- गुरु का महत्व: गुरु को ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम माना गया।
- सरल अनुष्ठान: जटिल कर्मकांडों के बजाय सरल पूजा पद्धतियों और भजन-कीर्तन पर जोर दिया गया।
- स्थानीय भाषाओं का प्रयोग: संतों ने अपनी शिक्षाओं का प्रसार आम लोगों की भाषाओं में किया, जिससे वे अधिक सुलभ हुईं।
- मानव समानता: सभी मनुष्यों को ईश्वर की संतान मानकर समानता का प्रचार किया गया।
- सामाजिक सुधार: भक्ति आंदोलन ने समाज में सहिष्णुता, भाईचारे और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दिया।
भक्ति आंदोलन ने आम लोगों को धर्म से जोड़ा और उन्हें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक मंच प्रदान किया। इसने सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दक्षिण भारत में भक्ति: अलवर और नयनार
दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का उदय सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच हुआ। यहाँ दो प्रमुख संत समूह थे:
अलवर
- विष्णु के भक्त थे।
- उनकी संख्या बारह थी।
- उनके गीतों को दिव्य प्रबंधम् नामक संकलन में संकलित किया गया है, जिसे तमिल वेद भी कहा जाता है।
- प्रमुख अलवर संत: पेरियालवर, अंडाल (एकमात्र महिला अलवर), नम्मालवर, तिरुप्पानलवर।
- अंडाल के भक्ति गीत आज भी दक्षिण भारत में लोकप्रिय हैं।
नयनार
- शिव के भक्त थे।
- उनकी संख्या तिरेसठ थी।
- उनके गीतों को तेवरम् नामक संकलन में संकलित किया गया है।
- प्रमुख नयनार संत: अप्पार, संबंदर, सुंदरार, मणिक्कवाचगर।
- ये संत गाँव-गाँव घूमकर अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन गाते थे।
- इन्होंने जातिगत भेदभाव का विरोध किया और सभी वर्गों के लोगों को अपने आंदोलन में शामिल किया।
अलवर और नयनार की साझा विशेषताएँ
- ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण।
- स्थानीय भाषाओं (तमिल) में भक्ति गीतों की रचना।
- मंदिरों के निर्माण और महत्व को बढ़ावा।
- जातिगत भेदभाव का विरोध और सामाजिक समानता पर जोर।
- तीर्थयात्राओं को महत्व देना।
अंडाल दक्षिण भारत की एकमात्र महिला अलवर संत थीं, जिनके भजन आज भी गाए जाते हैं।
शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के दर्शन
दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन के साथ-साथ दार्शनिक विचारों का भी विकास हुआ, जिन्होंने भक्ति परंपरा को प्रभावित किया।
शंकराचार्य (8वीं शताब्दी)
- जन्म: केरल।
- दर्शन: अद्वैतवाद (Advaita)।
- मुख्य सिद्धांत: ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः (ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, जीव ब्रह्म ही है, कोई दूसरा नहीं)।
- आत्मा (जीव) और परमात्मा (ब्रह्म) की एकता पर बल दिया।
- मोक्ष का मार्ग: ज्ञान मार्ग। उन्होंने ज्ञान के माध्यम से आत्मा और ब्रह्म की पहचान पर जोर दिया।
- जगत को माया माना, जो अज्ञान के कारण सत्य प्रतीत होता है।
- भारत के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की (शृंगेरी, द्वारका, पुरी, बद्रीनाथ)।
रामानुजाचार्य (11वीं शताब्दी)
- जन्म: तमिलनाडु।
- दर्शन: विशिष्टाद्वैतवाद (Vishishtadvaita)।
- मुख्य सिद्धांत: आत्मा और परमात्मा एक होते हुए भी विशिष्टताओं से युक्त हैं।
- उन्होंने माना कि आत्मा ब्रह्म का ही अंश है, लेकिन पूरी तरह से ब्रह्म में विलीन नहीं होती, बल्कि अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखती है।
- मोक्ष का मार्ग: भक्ति मार्ग। उन्होंने विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति को मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग बताया।
- अलवर संतों की भक्ति परंपरा से प्रभावित थे।
- शंकराचार्य के अद्वैतवाद का खंडन किया और कहा कि ईश्वर गुणों से युक्त है, निर्गुण नहीं।
तुलनात्मक अध्ययन
शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के दर्शन ने भारतीय दर्शन और भक्ति परंपरा को गहराई से प्रभावित किया।
| विशेषता | शंकराचार्य (अद्वैतवाद) | रामानुजाचार्य (विशिष्टाद्वैतवाद) | |---|---|---| | शताब्दी | 8वीं | 11वीं | | जन्म स्थान | केरल | तमिलनाडु | | आत्मा-परमात्मा संबंध | पूर्ण एकता (जीव ब्रह्म ही है) | आत्मा ब्रह्म का अंश है, पर विशिष्ट पहचान रखती है | | जगत की प्रकृति | माया (मिथ्या) | सत्य, ईश्वर का शरीर | | मोक्ष का मार्ग | ज्ञान मार्ग | भक्ति मार्ग | | ईश्वर का स्वरूप | निर्गुण, निराकार ब्रह्म | सगुण, साकार ईश्वर (विष्णु) | | प्रभाव | ज्ञान मार्ग पर जोर, मठों की स्थापना | भक्ति आंदोलन को दार्शनिक आधार प्रदान किया |
शंकराचार्य का अद्वैतवाद और रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर तुलनात्मक प्रश्न के रूप में पूछा जाता है। उनके प्रमुख सिद्धांतों और मोक्ष के मार्ग पर ध्यान दें।
वीरशैव आंदोलन
12वीं शताब्दी के मध्य में कर्नाटक में बसवन्ना (Basavanna) और उनके साथियों द्वारा वीरशैव आंदोलन शुरू किया गया।
प्रमुख सिद्धांत और विशेषताएँ
- शिव की पूजा: वीरशैव 'वीर शिव के नायक' या 'शिव के योद्धा' कहलाते थे। वे शिव के लिंग रूप की पूजा करते थे।
- जाति व्यवस्था का विरोध: इन्होंने जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी कर्मकांडों और मूर्ति पूजा का तीव्र विरोध किया।
- पुनर्जन्म का खंडन: वीरशैवों ने पुनर्जन्म के सिद्धांत को अस्वीकार किया। उनका मानना था कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में विलीन हो जाते हैं।
- सामाजिक समानता: इन्होंने सभी मनुष्यों की समानता पर जोर दिया, चाहे वे किसी भी जाति, लिंग या सामाजिक पृष्ठभूमि के हों।
- विधवा पुनर्विवाह का समर्थन: वीरशैवों ने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया, जो उस समय के समाज में एक क्रांतिकारी कदम था।
- कन्नड़ भाषा में साहित्य: बसवन्ना और अन्य वीरशैव संतों ने अपनी शिक्षाओं को कन्नड़ भाषा में 'वचन' (Vachanas) नामक काव्यों के माध्यम से प्रसारित किया। ये वचन नैतिक और दार्शनिक विचारों से परिपूर्ण हैं।
- अनुभव मंडप: बसवन्ना ने अनुभव मंडप नामक एक सभा की स्थापना की, जहाँ सभी जाति और लिंग के लोग धार्मिक और दार्शनिक मुद्दों पर चर्चा करते थे।
प्रभाव
- वीरशैव आंदोलन ने कर्नाटक में सामाजिक और धार्मिक सुधारों को बढ़ावा दिया।
- इसने निचली जातियों और महिलाओं को सशक्त किया।
- इसकी शिक्षाओं ने भक्ति आंदोलन को और अधिक समावेशी बनाया।
वचन (Vachanas): वीरशैव संतों द्वारा कन्नड़ भाषा में रचित काव्य, जिनमें उनके दार्शनिक और नैतिक विचार व्यक्त किए गए हैं।
महाराष्ट्र के संत
13वीं से 17वीं शताब्दी तक महाराष्ट्र में कई संत-कवियों का उदय हुआ, जिन्होंने विट्ठल (विष्णु का एक रूप) की भक्ति पर जोर दिया।
प्रमुख संत और उनकी शिक्षाएँ
- ज्ञानेश्वर (Dnyaneshwar):
- 13वीं शताब्दी के प्रमुख संत।
- भगवद गीता पर 'ज्ञानेश्वरी' नामक टीका लिखी, जो मराठी साहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
- भक्ति और ज्ञान के समन्वय पर जोर दिया।
- नामदेव (Namdev):
- 13वीं-14वीं शताब्दी के संत।
- विट्ठल भक्ति के प्रबल समर्थक।
- इनके कुछ भजन गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं।
- जातिगत भेदभाव का विरोध किया।
- एकनाथ (Eknath):
- 16वीं शताब्दी के संत।
- भागवत पुराण पर टीका लिखी।
- जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता का विरोध किया।
- मराठी भाषा में भक्ति गीतों (अभंगों) की रचना की।
- तुकाराम (Tukaram):
- 17वीं शताब्दी के सबसे प्रसिद्ध संत-कवियों में से एक।
- विट्ठल को समर्पित 'अभंग' (Abhangs) नामक हजारों भक्ति गीत लिखे।
- सामाजिक समानता और सादगी पर जोर दिया।
- इनके अभंग आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हुए।
- सखुबाई (Sakhubai):
- एक महिला संत-कवि, जिन्होंने विट्ठल की भक्ति में अभंगों की रचना की।
- इन्होंने पितृसत्तात्मक समाज की बाधाओं को चुनौती दी।
महाराष्ट्र भक्ति आंदोलन की विशेषताएँ
- विट्ठल भक्ति: पंढरपुर के विट्ठल मंदिर इस आंदोलन का केंद्र था।
- मराठी भाषा: संतों ने अपनी शिक्षाओं का प्रसार मराठी भाषा में अभंगों के माध्यम से किया।
- सामाजिक समानता: जाति, लिंग और धन के आधार पर भेदभाव का तीव्र विरोध किया गया।
- पारिवारिक जीवन का महत्व: इन संतों ने संन्यास के बजाय पारिवारिक जीवन में रहते हुए भक्ति करने पर जोर दिया।
- मानवतावाद: दूसरों की सेवा और दुखियों के प्रति करुणा को ईश्वर भक्ति का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया।
अभंग (Abhang): महाराष्ट्र के संत-कवियों द्वारा मराठी भाषा में रचित भक्ति गीत, विशेष रूप से विट्ठल को समर्पित।
नाथपंथी, सिद्ध और योगी
सातवीं शताब्दी के बाद उत्तरी भारत में कई धार्मिक समूहों का उदय हुआ, जिन्होंने रूढ़िवादी धर्म के कर्मकांडों और सामाजिक पहलुओं को चुनौती दी। इनमें नाथपंथी, सिद्ध और योगी प्रमुख थे।
प्रमुख विशेषताएँ
- योग और ध्यान पर जोर: इन्होंने योग, प्राणायाम और ध्यान जैसी तकनीकों के माध्यम से मन और शरीर को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया।
- सांसारिक त्याग: सांसारिक सुखों का त्याग और मोक्ष प्राप्त करने के लिए निर्गुण ब्रह्म की कल्पना की।
- जाति व्यवस्था का विरोध: इन्होंने जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी कर्मकांडों को अस्वीकार किया।
- स्थानीय भाषाओं का प्रयोग: अपनी शिक्षाओं का प्रसार आम बोलचाल की भाषाओं में किया, जिससे वे आम लोगों के बीच लोकप्रिय हुए।
- हठयोग: इन्होंने हठयोग की विभिन्न मुद्राओं और आसनों का अभ्यास किया, जिनका उद्देश्य शरीर को नियंत्रित कर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करना था।
- रहस्यवादी अनुभव: ये समूह रहस्यवादी अनुभवों और आंतरिक साधना पर अधिक ध्यान केंद्रित करते थे।
प्रभाव
- नाथपंथी, सिद्ध और योगियों ने उत्तरी भारत में भक्ति आंदोलन के लिए आधार तैयार किया।
- इनकी शिक्षाओं ने निचली जातियों के लोगों को आकर्षित किया।
- इन्होंने योग और ध्यान को लोकप्रिय बनाया, जो आज भी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है।
- कबीर और गुरु नानक जैसे संतों पर इनका गहरा प्रभाव पड़ा।
नाथपंथी, सिद्ध और योगियों ने ब्राह्मणवादी धर्म की आलोचना की और मोक्ष के लिए व्यक्तिगत साधना पर जोर दिया।
सूफीवाद
सूफीवाद इस्लाम का एक रहस्यवादी आयाम है, जो ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति पर जोर देता है। यह मध्य एशिया से भारत आया और 11वीं शताब्दी के बाद लोकप्रिय हुआ।
प्रमुख विशेषताएँ
- एकेश्वरवाद: सूफी ईश्वर की एकता (तौहीद) में विश्वास करते थे।
- ईश्वर के प्रति प्रेम: उनका मानना था कि ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण ही मोक्ष का मार्ग है।
- मानव सेवा: सूफी संतों ने मानव सेवा और सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता पर जोर दिया।
- पीर और मुरीद: सूफी परंपरा में पीर (गुरु) और मुरीद (शिष्य) का संबंध बहुत महत्वपूर्ण था। पीर मुरीदों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते थे।
- खानकाह (Khanqah): ये सूफी संतों के निवास स्थान और सामुदायिक केंद्र थे, जहाँ लोग आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सहायता के लिए आते थे।
- सिलसिला (Silsila): सूफी संतों की विभिन्न परंपराएँ या आध्यात्मिक वंशावली, जैसे चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी, नक्शबंदी।
- समा (Sama): सूफी संगीत और नृत्य, विशेष रूप से कव्वाली, जो आध्यात्मिक परमानंद प्राप्त करने का एक साधन था।
- जातिगत भेदभाव का विरोध: सूफी संतों ने जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव को अस्वीकार किया।
- स्थानीय भाषाओं का प्रयोग: उन्होंने अपनी शिक्षाओं का प्रसार स्थानीय भाषाओं (जैसे हिंदी, पंजाबी, बंगाली) में किया।
भारत में प्रमुख सूफी सिलसिले
- चिश्ती सिलसिला:
- भारत में सबसे लोकप्रिय सिलसिला।
- संस्थापक: ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर)।
- अन्य प्रमुख संत: कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, बाबा फरीद, निजामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली।
- इन्होंने सादगी, सहिष्णुता और मानव सेवा पर जोर दिया।
- सुहरावर्दी सिलसिला:
- संस्थापक: शेख बहाउद्दीन जकारिया (मुल्तान)।
- चिश्ती संतों की तुलना में राजकीय संरक्षण स्वीकार करते थे।
प्रभाव
- सूफीवाद ने भारतीय समाज में धार्मिक सहिष्णुता और भाईचारे को बढ़ावा दिया।
- इसने हिंदू-मुस्लिम एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- सूफी संगीत और साहित्य ने भारतीय कला और संस्कृति को समृद्ध किया।
खानकाह (Khanqah): सूफी संतों के निवास स्थान और सामुदायिक केंद्र, जहाँ भक्त और आम लोग आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए आते थे। सिलसिला (Silsila): सूफी संतों की आध्यात्मिक वंशावली या परंपरा।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर में है और यह हिंदू-मुस्लिम दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।
कबीर: एक रहस्यवादी संत
कबीर 15वीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली संत-कवियों में से एक थे। वे निर्गुण भक्ति परंपरा से संबंधित थे।
जीवन और शिक्षाएँ
- जन्म: वाराणसी के पास।
- पृष्ठभूमि: एक जुलाहा (बुनकर) परिवार से थे।
- गुरु: माना जाता है कि उनके गुरु रामानंद थे।
- निर्गुण ब्रह्म: कबीर ने निर्गुण, निराकार ईश्वर में विश्वास किया। उन्होंने ईश्वर को 'राम', 'हरि', 'अल्लाह', 'खुदा' जैसे विभिन्न नामों से पुकारा, लेकिन जोर दिया कि ईश्वर एक ही है और उसका कोई विशेष रूप नहीं है।
- जाति व्यवस्था का खंडन: उन्होंने जाति व्यवस्था, धार्मिक भेदभाव और कर्मकांडों का तीव्र विरोध किया।
- हिंदू-मुस्लिम एकता: कबीर ने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की कुरीतियों की आलोचना की और दोनों के बीच एकता और सद्भाव पर जोर दिया।
- सरल भाषा: उनकी शिक्षाएँ आम बोलचाल की भाषा (सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी) में थीं, जिससे वे जनसाधारण तक पहुँच सकीं।
- साखियाँ और सबद: उनकी शिक्षाएँ साखियों (दोहे) और सबदों (पदों) के रूप में संकलित हैं, जो बीजक, कबीर ग्रंथावली और गुरु ग्रंथ साहिब में मिलती हैं।
- गुरु का महत्व: उन्होंने गुरु को ईश्वर तक पहुँचने का महत्वपूर्ण माध्यम माना।
- आंतरिक साधना: कबीर ने बाहरी आडंबरों के बजाय आंतरिक शुद्धि और साधना पर जोर दिया।
प्रभाव
- कबीर की शिक्षाओं ने उत्तरी भारत में भक्ति आंदोलन को गहरा प्रभावित किया।
- उन्होंने सामाजिक समानता और धार्मिक सहिष्णुता के लिए एक मजबूत आवाज उठाई।
- उनके विचार आज भी सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
कबीर की शिक्षाएँ बीजक नामक ग्रंथ में संकलित हैं, जो उनके अनुयायियों के लिए एक पवित्र ग्रंथ है।
गुरु नानक और सिख धर्म
गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म 1469 में तलवंडी (वर्तमान ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में हुआ था।
गुरु नानक की शिक्षाएँ
- एक ईश्वर: गुरु नानक ने एक ही ईश्वर (अकाल पुरुष) में विश्वास पर जोर दिया, जो निर्गुण और निराकार है।
- नाम-सिमरन: ईश्वर के नाम का बार-बार स्मरण (नाम-सिमरन) मोक्ष का मार्ग है।
- कीर्तन: भक्ति गीतों का गायन (कीर्तन) ईश्वर से जुड़ने का एक तरीका है।
- समानता: उन्होंने जाति, पंथ और लिंग के आधार पर सभी भेदभावों को अस्वीकार किया।
- कर्मकांडों का विरोध: गुरु नानक ने बाहरी कर्मकांडों, मूर्ति पूजा और तीर्थयात्राओं को व्यर्थ बताया।
- सच्चा आचरण: उन्होंने सच्चाई, ईमानदारी, दया और सेवा जैसे नैतिक मूल्यों पर जोर दिया।
- तीन प्रमुख सिद्धांत:
- नाम जपना: ईश्वर के नाम का स्मरण।
- किरत करना: ईमानदारी से काम करना और आजीविका कमाना।
- वंड छकना: अपनी कमाई को दूसरों के साथ साझा करना।
- लंगर और संगत: उन्होंने 'लंगर' (सामुदायिक रसोई) और 'संगत' (सामुदायिक प्रार्थना सभा) की परंपरा शुरू की, जहाँ सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ भोजन करते और प्रार्थना करते थे।
सिख धर्म का विकास
- गुरु नानक के बाद नौ और गुरुओं ने उनकी शिक्षाओं को आगे बढ़ाया।
- गुरु अर्जुन देव ने गुरु नानक और अन्य संतों की शिक्षाओं को गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित किया, जो सिख धर्म का पवित्र ग्रंथ है।
- गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की और सिखों को एक सैन्य और आध्यात्मिक समुदाय के रूप में संगठित किया।
प्रभाव
- गुरु नानक की शिक्षाओं ने एक नए धर्म, सिख धर्म की नींव रखी।
- उन्होंने सामाजिक समानता और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया।
- सिख धर्म ने पंजाब क्षेत्र में एक मजबूत सामाजिक और राजनीतिक पहचान विकसित की।
गुरु ग्रंथ साहिब: सिख धर्म का पवित्र ग्रंथ, जिसमें गुरु नानक और अन्य सिख गुरुओं तथा कुछ भक्ति संतों की शिक्षाएँ संकलित हैं।
गुरु नानक के तीन प्रमुख सिद्धांत: नाम जपना, किरत करना, वंड छकना।