From Trade to Territory
ఈ అధ్యాయం బ్రిటీష్ ఈస్ట్ ఇండియా కంపెనీ కేవలం వర్తక సంస్థగా భారతదేశంలోకి ప్రవేశించి, క్రమంగా రాజకీయ శక్తిగా ఎలా మారిందో వివరిస్తుంది. ప్లాసీ యుద్ధం, బక్సర్ యుద్ధం, అనుబంధ సంధి, రాజ్య సంక్రమణ సిద్ధాంతం వంటి ముఖ్యమైన సంఘటనలు మరియు విధానాలను ఇది చర్చిస్తుంది. భారతీయ పాలకుల ప్రతిఘటనలు మరియు బ్రిటీష్ వారు తమ సామ్రాజ్యాన్ని ఎలా విస్తరించారో ఈ అధ్యాయం విశ్లేషిస్తుంది. ఇది భారతదేశ చరిత్రలో ఒక కీలకమైన పరివర్తన కాలాన్ని అర్థం చేసుకోవడానికి విద్యార్థులకు సహాయపడుతుంది.
ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में आती है
1. ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में आती है
- 1600 ईस्वी: ईस्ट इंडिया कंपनी को इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से भारत के साथ व्यापार करने का एकाधिकार (Charter) प्राप्त हुआ।
- उद्देश्य: पूर्वी देशों से सस्ते में सामान खरीदकर यूरोप में ऊंची कीमतों पर बेचना।
- एकाधिकार का अर्थ: कोई अन्य अंग्रेजी व्यापारिक कंपनी पूर्व में व्यापार नहीं कर सकती थी।
- समस्या: अन्य यूरोपीय व्यापारिक शक्तियाँ (पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी) पहले से ही भारत में मौजूद थीं।
- पुर्तगाली: वास्को डी गामा ने 1498 में भारत के लिए समुद्री मार्ग खोजा था। गोवा में उनका आधार था।
- डच: 17वीं शताब्दी की शुरुआत में भारत आए।
- फ्रांसीसी: 17वीं शताब्दी के मध्य में आए।
- प्रतिस्पर्धा: सभी कंपनियाँ समान चीजें (कपास, रेशम, काली मिर्च, लौंग, इलायची, दालचीनी) खरीदना चाहती थीं।
- इससे वस्तुओं की कीमतें बढ़ गईं और लाभ कम हो गया।
- व्यापारिक प्रतिस्पर्धा अक्सर सशस्त्र संघर्षों में बदल जाती थी।
- व्यापारिक चौकियाँ: कंपनियों ने अपनी व्यापारिक चौकियाँ (फैक्ट्रियां) स्थापित कीं और उन्हें किलेबंद किया।
- इससे स्थानीय शासकों के साथ टकराव हुआ।
- उदाहरण: बंगाल के नवाबों ने कंपनी को किलेबंदी करने और राजस्व भुगतान न करने से रोका।
1600 में प्राप्त एकाधिकार पत्र ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अटलांटिक पार करके पूर्व में व्यापार करने का अधिकार दिया। यह कंपनी के भारत में आगमन का पहला महत्वपूर्ण कदम था।
ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल में व्यापार शुरू करती है
2. ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल में व्यापार शुरू करती है
- 1651: हुगली नदी के किनारे पहली अंग्रेजी फैक्ट्री स्थापित हुई।
- यह कंपनी के व्यापारियों (जिन्हें 'फैक्टर्स' कहा जाता था) का आधार था।
- फैक्ट्री में एक गोदाम था जहाँ निर्यात के लिए सामान रखा जाता था।
- विस्तार: जैसे-जैसे व्यापार बढ़ा, कंपनी ने व्यापारियों और कारीगरों को फैक्ट्री के पास बसने के लिए राजी किया।
- 1696: कंपनी ने बस्ती के चारों ओर एक किले का निर्माण शुरू किया।
- 1698: मुगल अधिकारियों को रिश्वत देकर तीन गाँवों की जमींदारी अधिकार प्राप्त किए, जिनमें से एक कालीकट (बाद में कलकत्ता) था।
- फरमान: औरंगजेब से एक फरमान प्राप्त किया, जिसमें कंपनी को बिना शुल्क चुकाए व्यापार करने का अधिकार दिया गया।
- दुरुपयोग: कंपनी के अधिकारी निजी व्यापार भी करते थे और उनसे शुल्क चुकाने की उम्मीद की जाती थी, लेकिन वे अक्सर ऐसा नहीं करते थे।
- इससे बंगाल को भारी राजस्व का नुकसान हुआ।
- बंगाल के नवाबों के साथ संघर्ष: मुर्शिद कुली खान, अलीवर्दी खान और सिराज-उद-दौला जैसे नवाबों ने कंपनी की बढ़ती शक्ति का विरोध किया।
- उन्होंने कंपनी को रियायतें देने से इनकार कर दिया।
- किलेबंदी करने से रोका।
- राजस्व भुगतान की मांग की।
- कंपनी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया।
- कंपनी की मांगें: कंपनी अधिक रियायतें और व्यापार शुल्क हटाने की मांग करती रही।
- उसका मानना था कि व्यापार तभी फलेगा-फूलेगा जब शुल्क हटा दिए जाएंगे।
- नवाबों को हटाकर कठपुतली शासक बिठाना चाहती थी।
फरमान: एक शाही आदेश, विशेष रूप से मुगल सम्राट द्वारा जारी किया गया। औरंगजेब का फरमान कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण विशेषाधिकार था।
प्लासी का युद्ध
3. प्लासी का युद्ध (1757)
- पृष्ठभूमि: अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराज-उद-दौला 1756 में बंगाल के नवाब बने।
- कंपनी ने एक कठपुतली शासक बिठाने की कोशिश की, जिससे सिराज-उद-दौला नाराज हो गए।
- सिराज-उद-दौला ने कंपनी को अपनी राजनीतिक गतिविधियों को रोकने, किलेबंदी बंद करने और राजस्व चुकाने का आदेश दिया।
- टकराव: कंपनी ने आदेश मानने से इनकार कर दिया।
- नवाब ने 30,000 सैनिकों के साथ कासिम बाजार में अंग्रेजी फैक्ट्री पर हमला किया।
- कंपनी के अधिकारियों को गिरफ्तार किया, गोदाम पर ताला लगा दिया, और अंग्रेजी जहाजों को घेर लिया।
- फिर कलकत्ता में कंपनी के किले पर नियंत्रण करने के लिए आगे बढ़े।
- रॉबर्ट क्लाइव का हस्तक्षेप: मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में कंपनी की सेना भेजी गई।
- क्लाइव ने नवाब के सेनापति मीर जाफर को रिश्वत दी।
- मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाने का वादा किया गया।
- युद्ध: 1757 में प्लासी के मैदान में युद्ध हुआ।
- मीर जाफर की सेना ने युद्ध में भाग नहीं लिया।
- सिराज-उद-दौला को हार मिली और उनकी हत्या कर दी गई।
- परिणाम: प्लासी का युद्ध भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव था।
- मीर जाफर को कठपुतली नवाब बनाया गया।
- कंपनी को बंगाल में व्यापार के व्यापक अधिकार और रियायतें मिलीं।
- कंपनी ने बंगाल के संसाधनों का उपयोग अपने युद्धों और व्यापारिक खर्चों को पूरा करने के लिए किया।
- मीर जाफर की समस्याएँ: मीर जाफर को कंपनी की मांगों को पूरा करने में कठिनाई हुई।
- कंपनी ने उसे हटाकर मीर कासिम को नवाब बनाया।
- जब मीर कासिम ने कंपनी का विरोध किया, तो उसे भी हटा दिया गया और मीर जाफर को फिर से नवाब बनाया गया।
- 1765 में मीर जाफर की मृत्यु के बाद, कंपनी ने घोषणा की कि वह स्वयं बंगाल की नवाब होगी।
प्लासी का युद्ध (1757) और बक्सर का युद्ध (1764) अक्सर तुलना के लिए पूछे जाते हैं। इनके कारणों, प्रमुख व्यक्तियों और परिणामों को ध्यान से याद करें।
कंपनी एक प्रशासनिक शक्ति बनती है
4. कंपनी एक प्रशासनिक शक्ति बनती है
- बक्सर का युद्ध (1764): मीर कासिम, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेनाओं को कंपनी ने बक्सर में हराया।
- दीवानी अधिकार (1765): इस जीत के बाद, मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल प्रांत का दीवान नियुक्त किया।
- दीवानी: राजस्व एकत्र करने का अधिकार।
- यह कंपनी के लिए एक बड़ी सफलता थी, क्योंकि अब वह बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों का उपयोग कर सकती थी।
- लाभ: भारत में सामान खरीदने के लिए ब्रिटेन से सोना और चांदी लाने की आवश्यकता नहीं रही। अब भारतीय राजस्व से ही खर्च पूरे किए जा सकते थे।
- कंपनी के अधिकारी 'नवाब' बनते हैं: प्लासी के युद्ध के बाद, कंपनी के अधिकारियों ने धन और शक्ति जमा करना शुरू कर दिया।
- नबोब: 'नवाब' का अंग्रेजी संस्करण।
- रॉबर्ट क्लाइव ने भारत में बहुत धन कमाया और ब्रिटेन लौटकर एक धनी व्यक्ति के रूप में जीवन व्यतीत किया।
- हालांकि, सभी अधिकारी क्लाइव जितने सफल नहीं थे, और कई बीमारियों या युद्ध में मारे गए।
- प्रशासनिक परिवर्तन: कंपनी ने धीरे-धीरे भारत में अपना प्रशासन स्थापित करना शुरू किया।
- उन्हें अब केवल व्यापारिक कंपनी के रूप में नहीं, बल्कि एक शासक शक्ति के रूप में कार्य करना था।
दीवानी अधिकार प्राप्त करने से कंपनी की वित्तीय स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। यह एक व्यापारी कंपनी से एक क्षेत्रीय शक्ति में उसके परिवर्तन का महत्वपूर्ण कदम था।
कंपनी का विस्तार: सहायक संधि
5. कंपनी का विस्तार: सहायक संधि (Subsidiary Alliance)
- लॉर्ड वेलेजली (1798-1805): गवर्नर-जनरल के रूप में भारत में ब्रिटिश शक्ति का विस्तार करने के लिए इस नीति की शुरुआत की।
- सिद्धांत: भारतीय शासकों को अपनी स्वतंत्र सशस्त्र सेना रखने की अनुमति नहीं थी।
- उन्हें कंपनी की सेना द्वारा संरक्षित किया जाना था।
- इसके लिए उन्हें कंपनी को 'सहायक शुल्क' (subsidiary charges) का भुगतान करना होता था।
- परिणाम: यदि कोई शासक भुगतान करने में विफल रहता था, तो उसके क्षेत्र का एक हिस्सा कंपनी द्वारा जब्त कर लिया जाता था।
- उदाहरण: अवध के नवाब को 1801 में अपने क्षेत्र का आधा हिस्सा कंपनी को सौंपने के लिए मजबूर किया गया, क्योंकि वह सहायक शुल्क का भुगतान करने में विफल रहा था।
- हैदराबाद के निजाम ने भी इसी तरह अपने क्षेत्र खो दिए।
- उद्देश्य: भारतीय राज्यों को कमजोर करना और ब्रिटिश नियंत्रण का विस्तार करना, जबकि सीधे तौर पर उन्हें अपने अधीन न करना।
- यह एक चतुर रणनीति थी जिसने कंपनी को बिना सीधे युद्ध के अपनी सेना का खर्च भारतीय शासकों से वसूलने और उनके क्षेत्रों को हड़पने की अनुमति दी।
सहायक संधि: एक ऐसी व्यवस्था जिसके तहत भारतीय शासक अपनी सेना खो देते थे और ब्रिटिश सेना द्वारा संरक्षित होते थे, जिसके लिए उन्हें भुगतान करना पड़ता था। भुगतान न करने पर क्षेत्र जब्त कर लिया जाता था।
टीपू सुल्तान – मैसूर का शेर
6. टीपू सुल्तान – मैसूर का शेर
- मैसूर की शक्ति: हैदर अली (1761-1782) और उनके पुत्र टीपू सुल्तान (1782-1799) के नेतृत्व में मैसूर एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा।
- मैसूर ने मालाबार तट पर होने वाले लाभदायक व्यापार को नियंत्रित किया, जहाँ से कंपनी काली मिर्च और इलायची खरीदती थी।
- टीपू सुल्तान का विरोध: 1785 में टीपू सुल्तान ने अपनी रियासत में चंदन, काली मिर्च और इलायची के निर्यात को रोक दिया।
- उन्होंने स्थानीय व्यापारियों को कंपनी के साथ व्यापार करने से भी मना किया।
- फ्रांसीसियों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए और उनकी मदद से अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया।
- एंग्लो-मैसूर युद्ध: कंपनी टीपू सुल्तान को एक खतरा मानती थी।
- ब्रिटिश और मैसूर के बीच चार युद्ध लड़े गए (1767-69, 1780-84, 1790-92, 1799)।
- अंतिम युद्ध (1799): श्रीरंगपट्टनम का युद्ध।
- टीपू सुल्तान अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए मारे गए।
- परिणाम: मैसूर पर वोडेयार राजवंश को बहाल किया गया और उस पर सहायक संधि थोप दी गई।
- मैसूर अब ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया।
टीपू सुल्तान को 'मैसूर का शेर' कहा जाता है। उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी और अपनी स्वतंत्रता के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष किया।
मराठों के साथ युद्ध
7. मराठों के साथ युद्ध
- 18वीं सदी के अंत तक: कंपनी मराठों की शक्ति को भी कुचलना चाहती थी।
- मराठों का साम्राज्य दिल्ली से लेकर दक्षिण तक फैला हुआ था।
- पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) में हार के बाद, मराठा शक्ति कई राज्यों में विभाजित हो गई थी।
- मराठा प्रमुख: सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ और भोंसले जैसे प्रमुख सरदार अलग-अलग राजवंशों के थे।
- ये सरदार पेशवा (पुणे में स्थित) के अधीन एक परिसंघ (confederacy) के सदस्य थे।
- एंग्लो-मराठा युद्ध: ब्रिटिश और मराठों के बीच तीन युद्ध लड़े गए।
- पहला युद्ध (1775-1782): सालबाई की संधि के साथ समाप्त हुआ, जिसमें कोई स्पष्ट विजेता नहीं था।
- दूसरा युद्ध (1803-1805): ब्रिटिश ने ओडिशा और यमुना नदी के उत्तर में स्थित आगरा और दिल्ली सहित कई क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया।
- तीसरा युद्ध (1817-1819): मराठा शक्ति को पूरी तरह से कुचल दिया गया।
- पेशवा को हटाकर कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया।
- विंध्य के दक्षिण के सभी मराठा क्षेत्रों पर कंपनी का नियंत्रण हो गया।
मराठों के साथ युद्धों ने ब्रिटिशों को मध्य और पश्चिमी भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने में मदद की, जिससे वे भारत में सर्वोच्च शक्ति बन गए।
सर्वोच्चता का दावा
8. सर्वोच्चता का दावा
- लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813-1823): गवर्नर-जनरल के रूप में एक नई नीति शुरू की जिसे 'सर्वोच्चता की नीति' कहा गया।
- सिद्धांत: कंपनी का दावा था कि उसकी सत्ता भारतीय राज्यों की सत्ता से ऊपर या 'सर्वोच्च' है।
- इसलिए, वह अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी भारतीय राज्य को अपने अधीन करने या उसे हड़पने के लिए न्यायसंगत थी।
- विस्तार: यह नीति ब्रिटिश विस्तारवाद का एक और उपकरण बन गई।
- उदाहरण: कित्तूर (कर्नाटक) में रानी चेन्नम्मा ने ब्रिटिशों के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध किया, लेकिन उन्हें 1824 में गिरफ्तार कर लिया गया।
- उनके बाद रायन्ना ने संघर्ष जारी रखा, लेकिन उन्हें भी पकड़कर फांसी दे दी गई।
- रूस का डर: 1830 के दशक के अंत में, कंपनी को रूस से डर लगने लगा कि वह भारत में अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।
- इसलिए, ब्रिटिश ने उत्तर-पश्चिमी भारत पर नियंत्रण स्थापित करने का फैसला किया।
- अफगानिस्तान के साथ युद्ध (1838-1842): ब्रिटिश ने अफगानिस्तान में एक कठपुतली शासक स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
- सिंध का अधिग्रहण (1843): सिंध को अपने नियंत्रण में ले लिया।
- पंजाब का अधिग्रहण: महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद, पंजाब में दो लंबे युद्ध हुए।
- 1849: पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
सर्वोच्चता की नीति: लॉर्ड हेस्टिंग्स द्वारा शुरू की गई नीति, जिसमें कंपनी ने दावा किया कि उसकी शक्ति भारतीय शासकों से ऊपर है और वह अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी राज्य को हड़प सकती है।
व्यपगत का सिद्धांत
9. व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse)
- लॉर्ड डलहौजी (1848-1856): गवर्नर-जनरल के रूप में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने के लिए इस नीति की शुरुआत की।
- सिद्धांत: यदि किसी भारतीय शासक की मृत्यु हो जाती है और उसका कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता है, तो उसका राज्य 'व्यपगत' (lapse) हो जाएगा, यानी वह कंपनी के क्षेत्र का हिस्सा बन जाएगा।
- भारतीय शासकों को पुत्र गोद लेने का अधिकार नहीं था, जो भारतीय परंपरा में आम था।
- परिणाम: इस नीति के तहत कई राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया।
- सतारा (1848)
- संभलपुर (1850)
- उदयपुर (1852)
- नागपुर (1853)
- झाँसी (1854): रानी लक्ष्मीबाई ने इसका कड़ा विरोध किया।
- अवध का अधिग्रहण (1856): डलहौजी ने अवध को 'कुशासन' के आरोप में ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।
- यह नीति भारतीय शासकों और जनता के बीच व्यापक असंतोष का कारण बनी।
- 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारणों में से एक।
व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse) को सहायक संधि (Subsidiary Alliance) के साथ भ्रमित न करें। सहायक संधि सैन्य सुरक्षा और भुगतान से संबंधित थी, जबकि व्यपगत का सिद्धांत उत्तराधिकार और राज्य को हड़पने से संबंधित था।
नए प्रशासन की स्थापना
10. नए प्रशासन की स्थापना
- वारेन हेस्टिंग्स (1773-1785): पहले गवर्नर-जनरल, जिन्होंने कंपनी की शक्ति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उन्होंने कई प्रशासनिक सुधार किए।
- प्रशासनिक इकाइयाँ: ब्रिटिश क्षेत्रों को प्रेसीडेंसी में विभाजित किया गया था।
- बंगाल, मद्रास और बंबई।
- प्रत्येक प्रेसीडेंसी का शासन एक गवर्नर द्वारा किया जाता था।
- सर्वोच्च प्रमुख गवर्नर-जनरल होता था।
- न्यायिक सुधार: 1772 में एक नई न्याय प्रणाली स्थापित की गई।
- प्रत्येक जिले में दो अदालतें: एक फौजदारी अदालत (आपराधिक मामले) और एक दीवानी अदालत (सिविल मामले)।
- दीवानी अदालत की अध्यक्षता यूरोपीय जिला कलेक्टर करते थे, जिनके अधीन मौलवी और हिंदू पंडित भारतीय कानूनों की व्याख्या करते थे।
- फौजदारी अदालतें काजी और मुफ्ती के अधीन थीं, लेकिन कलेक्टर की निगरानी में।
- रेगुलेटिंग एक्ट (1773): इस अधिनियम ने भारत में कंपनी के प्रशासन को विनियमित करने का प्रयास किया।
- सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई।
- गवर्नर-जनरल को अधिक अधिकार दिए गए।
- कलेक्टर का पद: कलेक्टर जिले में राजस्व एकत्र करने, कानून और व्यवस्था बनाए रखने का मुख्य अधिकारी बन गया।
- उसका कार्यालय 'कलेक्टरेट' शक्ति और संरक्षण का नया केंद्र बन गया।
वारेन हेस्टिंग्स ने ब्रिटिश प्रशासन की नींव रखी, जिसमें न्यायिक और राजस्व संग्रह प्रणालियों का पुनर्गठन शामिल था।
कंपनी की सेना
11. कंपनी की सेना
- शुरुआती सेना: कंपनी ने अपनी सेना को 'सिपाही' सेना कहा, जो भारतीय सैनिकों (सिपाहियों) से बनी थी।
- मुगल सेना मुख्य रूप से घुड़सवार सेना (घोड़े पर सवार प्रशिक्षित सैनिक) और पैदल सेना पर निर्भर करती थी।
- मुगल सेना में तीरंदाजी और तलवारबाजी का प्रशिक्षण महत्वपूर्ण था।
- 18वीं सदी के बदलाव: 18वीं सदी में, मुगल उत्तराधिकारी राज्यों में किसान सैनिकों की भर्ती शुरू हुई।
- कंपनी ने भी अपनी सेना के लिए सैनिकों की भर्ती शुरू की।
- तकनीकी परिवर्तन: 1820 के दशक से, ब्रिटिश साम्राज्य बर्मा, अफगानिस्तान और मिस्र में युद्ध लड़ रहा था।
- सैनिकों को मस्कट (भारी बंदूक) और मैचलॉक (बारूद से जलने वाली बंदूक) से लैस किया गया।
- इससे पैदल सेना का महत्व बढ़ गया।
- सैनिकों का प्रशिक्षण: कंपनी ने सैनिकों को यूरोपीय शैली में प्रशिक्षण देना शुरू किया।
- उन्हें ड्रिल और अनुशासन सिखाया गया।
- इससे एक समान सैन्य संस्कृति विकसित हुई।
- जातीय और सामुदायिक भावनाएँ: कंपनी के अधिकारी सैनिकों की जातीय और सामुदायिक भावनाओं को अक्सर नजरअंदाज करते थे।
- इससे सैनिकों में असंतोष पैदा हुआ, जो 1857 के विद्रोह का एक कारण भी बना।
- निष्कर्ष: कंपनी एक व्यापारिक कंपनी से एक क्षेत्रीय शक्ति में बदल गई, जिसने भारत में एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
कंपनी की सेना में भारतीय सिपाहियों की बड़ी संख्या थी, लेकिन उन्हें यूरोपीय सैन्य तकनीकों और अनुशासन के अनुसार प्रशिक्षित किया जाता था।