From Trade to Territory –The Company Establishes Power
ఈ అధ్యాయం మొఘల్ సామ్రాజ్యం పతనం, ఈస్ట్ ఇండియా కంపెనీ భారతదేశంలో ఎలా అధికారాన్ని స్థాపించింది, బెంగాల్లో వారి వాణిజ్య కార్యకలాపాలు మరియు ప్లాసీ, బక్సర్ యుద్ధాల వంటి కీలక సంఘర్షణలను వివరిస్తుంది. టిప్పు సుల్తాన్ పాత్ర, బ్రిటిష్ ఆధిపత్యం మరియు రాజ్య సంక్రమణ సిద్ధాంతం యొక్క ప్రభావాలను విశ్లేషిస్తుంది. బ్రిటిష్ వారు ఏర్పాటు చేసిన కొత్త పరిపాలనా వ్యవస్థ మరియు సైనిక నియామకాలలో మార్పులను కూడా ఇది వివరిస్తుంది. ఈ అధ్యాయం భారతదేశ చరిత్రలో ఒక ముఖ్యమైన పరివర్తన కాలాన్ని అర్థం చేసుకోవడానికి విద్యార్థులకు సహాయపడుతుంది.
मुगल साम्राज्य का पतन और क्षेत्रीय शक्तियों का उदय
औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा।
- कमजोर उत्तराधिकारी: औरंगजेब के बाद कोई भी मजबूत मुगल शासक नहीं आया जो विशाल साम्राज्य को संभाल सके।
- प्रांतीय गवर्नरों की बढ़ती शक्ति: बंगाल, अवध और हैदराबाद जैसे प्रांतों के गवर्नरों ने अपनी शक्ति बढ़ा ली और स्वतंत्र शासकों की तरह व्यवहार करने लगे।
- लगातार युद्ध: मुगल साम्राज्य को मराठों, सिखों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों से लगातार युद्ध लड़ने पड़े, जिससे उनकी आर्थिक और सैन्य शक्ति कमजोर हुई।
- नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण: इन आक्रमणों ने मुगल साम्राज्य को और भी कमजोर कर दिया और उसकी प्रतिष्ठा को गहरा धक्का पहुँचाया।
- परिणाम: 18वीं शताब्दी तक, दिल्ली अब प्रभावी शक्ति का केंद्र नहीं रह गया था। भारत कई छोटे-छोटे क्षेत्रीय राज्यों में बँट गया था।
औरंगजेब की मृत्यु (1707) को अक्सर भारत में ब्रिटिश शक्ति के उदय की शुरुआत माना जाता है, क्योंकि इसके बाद केंद्रीय मुगल सत्ता कमजोर हो गई थी।
ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन और बंगाल में व्यापार
ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) 1600 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से चार्टर प्राप्त कर भारत आई।
- उद्देश्य: पूर्वी देशों के साथ व्यापार करना, खासकर मसाले, कपास, रेशम, नील आदि का व्यापार।
- एकमात्र व्यापार का अधिकार: चार्टर ने कंपनी को पूर्व के साथ व्यापार का एकमात्र अधिकार दिया, जिससे कोई अन्य ब्रिटिश व्यापारी प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता था।
- भारत में पहली फैक्ट्री: 1651 में हुगली नदी के किनारे बंगाल में पहली इंग्लिश फैक्ट्री स्थापित की गई।
- व्यापार का विस्तार: कंपनी ने व्यापारियों और कारीगरों को फैक्ट्री के पास बसने के लिए प्रोत्साहित किया। 1696 तक, कंपनी ने बस्ती के चारों ओर एक किला बनाना शुरू कर दिया।
- फर्रुखसियर का फरमान (1717): मुगल सम्राट फर्रुखसियर ने कंपनी को बंगाल में शुल्क-मुक्त व्यापार (duty-free trade) का अधिकार दे दिया।
- दुरुपयोग: कंपनी के अधिकारी निजी व्यापार के लिए भी इस अधिकार का दुरुपयोग करने लगे, जिससे बंगाल के नवाबों को भारी राजस्व का नुकसान हुआ।
- नवाबों का विरोध: बंगाल के नवाब (जैसे मुर्शिद कुली खान, अलीवर्दी खान, सिराजुद्दौला) ने इस दुरुपयोग का विरोध किया और कंपनी से करों का भुगतान करने की मांग की।
- किलेबंदी का विरोध: नवाबों ने कंपनी द्वारा की जा रही किलेबंदी का भी विरोध किया, क्योंकि इससे उनकी संप्रभुता को खतरा था।
चार्टर (Charter): एक शाही दस्तावेज जो किसी कंपनी को व्यापार करने का विशेष अधिकार देता है।
अक्सर छात्र सोचते हैं कि कंपनी केवल व्यापार करने आई थी, लेकिन उसका उद्देश्य शुरू से ही राजनीतिक और सैन्य शक्ति प्राप्त करना भी था ताकि वह अपने व्यापारिक हितों की रक्षा कर सके।
प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey)
प्लासी का युद्ध 1757 में लड़ा गया, जो भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव का पत्थर बना।
- कारण:
- राजस्व का नुकसान: कंपनी द्वारा शुल्क-मुक्त व्यापार का दुरुपयोग, जिससे बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को भारी राजस्व का नुकसान हो रहा था।
- किलेबंदी: कंपनी द्वारा कोलकाता में बिना नवाब की अनुमति के किलेबंदी करना।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: कंपनी का नवाब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप।
- सिराजुद्दौला की कार्रवाई: नवाब सिराजुद्दौला ने कासिमबाजार में इंग्लिश फैक्ट्री पर कब्जा कर लिया और कोलकाता में कंपनी के किले पर हमला कर दिया।
- घटनाक्रम:
- रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में कंपनी की सेना ने सिराजुद्दौला का सामना किया।
- मीर जाफर, सिराजुद्दौला का सेनापति, क्लाइव के साथ मिल गया और उसने युद्ध में भाग नहीं लिया।
- सिराजुद्दौला की सेना हार गई और उसे मार दिया गया।
- परिणाम:
- मीर जाफर नवाब बना: कंपनी ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया, जो एक कठपुतली शासक था।
- व्यापारिक रियायतें: कंपनी को बंगाल में व्यापक व्यापारिक रियायतें और भारी धन मिला।
- राजनीतिक शक्ति का उदय: यह कंपनी की पहली बड़ी राजनीतिक जीत थी, जिसने उसे भारत में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।
- बंगाल की लूट: कंपनी ने बंगाल के संसाधनों का जमकर दोहन किया, जिससे बंगाल की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई।
प्लासी का युद्ध (1757) और बक्सर का युद्ध (1764) के कारणों और परिणामों की तुलना अक्सर बोर्ड परीक्षाओं में पूछी जाती है। दोनों के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है।
बक्सर का युद्ध (Battle of Buxar)
प्लासी के युद्ध के बाद भी कंपनी की लालसाएँ बढ़ती रहीं, जिससे बक्सर का युद्ध हुआ।
- कारण:
- मीर जाफर की अक्षमता: मीर जाफर कंपनी की बढ़ती मांगों को पूरा करने में असमर्थ था।
- मीर कासिम का विरोध: कंपनी ने मीर जाफर को हटाकर मीर कासिम को नवाब बनाया। मीर कासिम एक स्वतंत्र शासक बनना चाहता था और उसने कंपनी के शुल्क-मुक्त व्यापार के दुरुपयोग को रोकने की कोशिश की।
- गठबंधन: मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर कंपनी के खिलाफ एक गठबंधन बनाया।
- घटनाक्रम:
- 1764 में बक्सर में यह युद्ध लड़ा गया।
- हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने गठबंधन सेना को निर्णायक रूप से हराया।
- परिणाम:
- इलाहाबाद की संधि (1765): इस संधि के तहत, मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) प्रदान कर दी।
- वास्तविक शासक: कंपनी बंगाल की वास्तविक शासक बन गई, जबकि नवाब केवल नाममात्र का प्रमुख रह गया।
- द्वैध शासन: बंगाल में द्वैध शासन प्रणाली लागू हुई, जहाँ कंपनी के पास राजस्व और सैन्य नियंत्रण था, जबकि नवाब के पास प्रशासनिक जिम्मेदारी थी। यह प्रणाली बंगाल के लिए विनाशकारी साबित हुई।
- भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व की पुष्टि: बक्सर के युद्ध ने भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व को और मजबूत किया और यह साबित कर दिया कि ब्रिटिश सेना भारतीय शक्तियों से कहीं अधिक श्रेष्ठ थी।
दीवानी (Diwani): राजस्व वसूलने और नागरिक न्याय का प्रशासन करने का अधिकार।
मैसूर के साथ युद्ध: टीपू सुल्तान
कंपनी ने केवल बंगाल पर ही कब्जा नहीं किया, बल्कि दक्षिण भारत में भी अपनी शक्ति का विस्तार किया, जहाँ उसे मैसूर के हैदर अली और उनके पुत्र टीपू सुल्तान से कड़ा प्रतिरोध मिला।
- मैसूर की बढ़ती शक्ति: हैदर अली और टीपू सुल्तान के नेतृत्व में मैसूर एक शक्तिशाली राज्य बन गया था, जिसने मालाबार तट पर होने वाले व्यापार को नियंत्रित किया।
- टीपू सुल्तान का प्रतिरोध:
- टीपू सुल्तान ने अपनी रियासत से कंपनी के व्यापार को रोक दिया।
- उसने स्थानीय सौदागरों को कंपनी के साथ व्यापार करने से मना किया।
- उसने फ्रांसीसियों के साथ संबंध स्थापित किए और अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया।
- मैसूर युद्ध (Anglo-Mysore Wars): कंपनी ने मैसूर के साथ चार युद्ध लड़े।
- पहला (1767-69) और दूसरा (1780-84) युद्ध: हैदर अली के नेतृत्व में मैसूर ने कंपनी को कड़ी टक्कर दी।
- तीसरा युद्ध (1790-92): टीपू सुल्तान को हार का सामना करना पड़ा और उसे अपनी रियासत का एक बड़ा हिस्सा और अपने दो बेटों को बंधक के रूप में कंपनी को देना पड़ा।
- चौथा युद्ध (1799): श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में टीपू सुल्तान बहादुरी से लड़ते हुए मारा गया।
- परिणाम:
- मैसूर पर कंपनी का नियंत्रण स्थापित हो गया।
- मैसूर के पुराने वाडियार राजवंश को सत्ता सौंप दी गई और मैसूर पर सहायक संधि (Subsidiary Alliance) थोप दी गई।
टीपू सुल्तान को 'मैसूर का शेर' (Tiger of Mysore) कहा जाता था। वह अपनी बहादुरी और अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध के लिए जाने जाते हैं।
मराठों के साथ युद्ध
मैसूर के बाद, कंपनी ने अपनी शक्ति का विस्तार मराठा क्षेत्रों में किया।
- मराठा शक्ति: 18वीं शताब्दी के अंत तक, मराठा शक्ति कई प्रमुख सरदारों (सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़, भोंसले) के अधीन थी, जो पेशवा (Chief Minister) के अधीन एक परिसंघ (confederacy) का हिस्सा थे।
- मराठा युद्ध (Anglo-Maratha Wars): कंपनी ने मराठों के साथ तीन युद्ध लड़े।
- पहला युद्ध (1775-82): सालबाई की संधि (Treaty of Salbai) के साथ समाप्त हुआ, जिसमें कोई स्पष्ट विजेता नहीं था।
- दूसरा युद्ध (1803-05): कंपनी ने उड़ीसा और आगरा व दिल्ली के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।
- तीसरा युद्ध (1817-19): मराठा शक्ति को पूरी तरह से कुचल दिया गया। पेशवा को कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया और पेंशन पर रखा गया।
- परिणाम:
- दक्कन पर कंपनी का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया।
- मराठा परिसंघ का अंत हो गया और उनके क्षेत्र कंपनी के अधीन आ गए।
मराठा युद्धों ने कंपनी को भारत की सर्वोच्च शक्ति बना दिया, क्योंकि अब उन्हें कोई बड़ी भारतीय शक्ति चुनौती नहीं दे सकती थी।
सर्वोच्चता का दावा (Claim to Paramountcy)
19वीं शताब्दी की शुरुआत से, कंपनी ने अपनी शक्ति को सर्वोच्च मानना शुरू कर दिया।
- लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813-1823): गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 'सर्वोच्चता की नीति' (Policy of Paramountcy) शुरू की।
- नीति का अर्थ: कंपनी का दावा था कि उसकी सत्ता भारतीय राज्यों की सत्ता से सर्वोच्च (paramount) है।
- कंपनी अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी भारतीय राज्य पर कब्जा कर सकती है या उसे धमकी दे सकती है।
- विरोध और संघर्ष:
- कित्तूर की रानी चेन्नम्मा: कर्नाटक में कित्तूर की रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए और 1824 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
- रायन्ना: चेन्नम्मा की मृत्यु के बाद, संगोली के गरीब चौकीदार रायन्ना ने प्रतिरोध जारी रखा, लेकिन 1830 में उन्हें भी पकड़कर फाँसी दे दी गई।
- परिणाम: इस नीति के कारण कंपनी ने कई भारतीय राज्यों को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिससे भारतीय शासकों में असंतोष बढ़ा।
सर्वोच्चता का दावा (Paramountcy): कंपनी का यह दावा कि उसकी सत्ता भारतीय राज्यों की सत्ता से श्रेष्ठ या सर्वोच्च है।
विलय नीति (Doctrine of Lapse)
लॉर्ड डलहौजी (1848-1856) ने 'सर्वोच्चता के दावे' को और आगे बढ़ाते हुए 'विलय नीति' (Doctrine of Lapse) लागू की।
- नीति का सिद्धांत: यदि किसी भारतीय शासक की मृत्यु हो जाती है और उसका कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता है, तो उसकी रियासत को कंपनी अपने राज्य में विलय (annex) कर लेगी।
- दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
- विलय किए गए राज्य:
- सतारा (1848)
- संभलपुर (1850)
- उदयपुर (1852)
- नागपुर (1853)
- झाँसी (1854)
- अवध का विलय (1856): अवध को 'कुशासन' (misgovernance) के आरोप में विलय कर लिया गया, जिससे लोगों में भारी गुस्सा था।
- परिणाम: इस नीति ने भारतीय शासकों में भय और अविश्वास पैदा किया और 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारणों में से एक बनी।
विलय नीति (Doctrine of Lapse): लॉर्ड डलहौजी द्वारा लागू की गई नीति, जिसके तहत यदि किसी शासक का प्राकृतिक पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता था, तो उसकी रियासत ब्रिटिश साम्राज्य में मिला ली जाती थी।
कंपनी का नया प्रशासन
कंपनी ने अपने बढ़ते क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए एक नई प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की।
- वारेन हेस्टिंग्स (1773-1785): पहले गवर्नर-जनरल, जिन्होंने कंपनी की शक्ति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- प्रशासनिक इकाइयाँ: ब्रिटिश क्षेत्रों को प्रेसिडेंसी (Presidencies) में विभाजित किया गया था: बंगाल, मद्रास और बंबई।
- प्रत्येक प्रेसिडेंसी का प्रमुख एक गवर्नर होता था।
- गवर्नर-जनरल सभी गवर्नरों से ऊपर होता था।
- न्याय व्यवस्था:
- 1772 में एक नई न्याय व्यवस्था स्थापित की गई।
- प्रत्येक जिले में दो अदालतें थीं: एक फौजदारी अदालत (Criminal Court) और एक दीवानी अदालत (Civil Court)।
- फौजदारी अदालतें काजी और मुफ्ती के अधीन थीं, लेकिन कलेक्टर की निगरानी में।
- दीवानी अदालतें यूरोपीय जिला कलेक्टरों के अधीन थीं, जिनकी सहायता के लिए भारतीय पंडित और मौलवी होते थे।
- रेगुलेटिंग एक्ट (1773): इस एक्ट ने कंपनी के प्रशासन को नियंत्रित करने का प्रयास किया और गवर्नर-जनरल का पद बनाया।
- कलेक्टर का पद:
- कलेक्टर का मुख्य कार्य राजस्व एकत्र करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था।
- वह मजिस्ट्रेट और न्यायाधीश की सहायता से कार्य करता था।
- कलेक्टर का कार्यालय (कलेक्ट्रेट) सत्ता का नया केंद्र बन गया।
प्रेसिडेंसी (Presidency): ब्रिटिश भारत में प्रमुख प्रशासनिक इकाइयाँ, जैसे बंगाल, मद्रास और बंबई।
वारेन हेस्टिंग्स पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उन पर महाभियोग चलाया गया, लेकिन अंततः उन्हें बरी कर दिया गया।
कंपनी की सेना
कंपनी ने अपने क्षेत्रों की रक्षा और विस्तार के लिए एक मजबूत सेना का निर्माण किया।
- मुगल सेना की संरचना:
- मुख्य रूप से घुड़सवार (cavalry) और पैदल सैनिक (infantry) होते थे।
- घुड़सवारों को तीरंदाजी और तलवारबाजी में प्रशिक्षित किया जाता था।
- पैदल सैनिक कम प्रशिक्षित होते थे।
- कंपनी की सेना (Sepoy Army):
- कंपनी ने अपनी सेना के लिए भारतीय किसानों को सिपाही (sepoy) के रूप में भर्ती करना शुरू किया।
- सिपाहियों को यूरोपीय शैली में प्रशिक्षित किया जाता था, जिसमें बंदूकें (muskets) और मैचलॉक (matchlocks) का उपयोग शामिल था।
- उन्हें अनुशासित सैन्य जीवन में ढाला गया।
- बदलते सैन्य पैटर्न:
- 19वीं शताब्दी की शुरुआत में, ब्रिटिश साम्राज्य को बर्मा, अफगानिस्तान और मिस्र में युद्ध लड़ने पड़े।
- इन युद्धों में सिपाहियों को समुद्र पार भी जाना पड़ा, जिसे कुछ भारतीय समुदायों में धार्मिक रूप से गलत माना जाता था।
- कंपनी ने अपनी सेना में समान सैन्य संस्कृति विकसित करने की कोशिश की, जिससे जाति और समुदाय की भावनाओं को नजरअंदाज किया गया।
- परिणाम:
- यह बदलाव भारतीय समाज में तनाव का कारण बना और 1857 के विद्रोह में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- कंपनी की सेना भारत में ब्रिटिश सत्ता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन गई।
सिपाही (Sepoy): कंपनी की सेना में भारतीय सैनिक। यह शब्द 'सिपाही' से लिया गया है।