CONSTITUTIONAL DESIGN
ఈ అధ్యాయం రాజ్యాంగ రూపకల్పన యొక్క ప్రాముఖ్యతను వివరిస్తుంది. దక్షిణాఫ్రికాలో జాతి వివక్షకు వ్యతిరేకంగా జరిగిన పోరాటం, నెల్సన్ మండేలా పాత్ర, మరియు వారి రాజ్యాంగ నిర్మాణం గురించి తెలుసుకుంటారు. భారత రాజ్యాంగం ఎలా రూపొందించబడింది, దాని ప్రాథమిక విలువలు ఏమిటి, మరియు స్వాతంత్ర్యానికి ముందు జరిగిన చర్చలు కూడా ఇందులో ఉన్నాయి. రాజ్యాంగం ఎందుకు అవసరం, అది పౌరుల హక్కులను మరియు ప్రభుత్వ అధికారాలను ఎలా నిర్ణయిస్తుంది అనే విషయాలపై ఈ అధ్యాయం దృష్టి సారిస్తుంది.
दक्षिण अफ्रीका में लोकतांत्रिक संविधान
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद (Apartheid) एक ऐसी व्यवस्था थी जो नस्लीय भेदभाव पर आधारित थी। यह व्यवस्था विशेष रूप से दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित थी, जहाँ गोरे यूरोपीय लोगों ने इसे लागू किया था।
रंगभेद के मुख्य बिंदु:
- नस्लीय विभाजन: लोगों को उनकी त्वचा के रंग के आधार पर 'गोरे', 'काले', 'रंगीन' (मिश्रित नस्ल) और 'भारतीय' में विभाजित किया गया था।
- अधिकारों का अभाव: गैर-गोरों, विशेषकर कालों को मतदान का अधिकार नहीं था।
- अलगाव (Segregation): सार्वजनिक स्थानों जैसे ट्रेन, बस, अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, पुस्तकालय, सिनेमा हॉल, समुद्र तट, शौचालय आदि में गोरे और काले लोगों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएँ थीं। यहाँ तक कि काले लोग उन चर्चों में भी नहीं जा सकते थे जहाँ गोरे पूजा करते थे।
- निवास प्रतिबंध: काले लोगों को गोरे इलाकों में रहने की अनुमति नहीं थी। वे केवल परमिट के साथ ही गोरे इलाकों में काम कर सकते थे।
- विरोध पर प्रतिबंध: काले लोगों को संघ बनाने या इस व्यवस्था के खिलाफ विरोध करने की अनुमति नहीं थी।
रंगभेद के खिलाफ संघर्ष:
- शुरुआत: 1950 से काले, रंगीन और भारतीय लोगों ने रंगभेद व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष शुरू किया।
- नेतृत्व: अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ANC) इस संघर्ष का मुख्य संगठन था। इसमें कई मजदूर संघ और कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थीं।
- अंतर्राष्ट्रीय समर्थन: कई देशों ने रंगभेद को अन्यायपूर्ण और नस्लवादी करार दिया और इसकी निंदा की।
- नेल्सन मंडेला: रंगभेद विरोधी संघर्ष के सबसे प्रमुख नेता। उन्हें 1964 में देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उन्होंने अगले 28 साल रॉबेन द्वीप की जेल में बिताए।
नए संविधान की ओर:
- दबाव: रंगभेद के खिलाफ बढ़ते विरोध और संघर्षों के कारण सरकार को एहसास हुआ कि वे अब काले लोगों को दमन के माध्यम से अपने अधीन नहीं रख सकते।
- नीति परिवर्तन: भेदभावपूर्ण कानूनों को रद्द कर दिया गया, राजनीतिक दलों पर से प्रतिबंध हटा दिए गए और मीडिया पर लगे प्रतिबंधों को भी हटा दिया गया।
- मंडेला की रिहाई: 28 साल की कैद के बाद नेल्सन मंडेला जेल से रिहा हुए।
- लोकतांत्रिक दक्षिण अफ्रीका: 26 अप्रैल 1994 की आधी रात को दक्षिण अफ्रीका गणराज्य का नया राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया, जो एक नए लोकतांत्रिक देश के जन्म का प्रतीक था। रंगभेद सरकार का अंत हुआ और एक बहु-नस्लीय सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- समझौता: नए लोकतांत्रिक दक्षिण अफ्रीका के उदय के बाद, काले नेताओं ने अपने साथी कालों से गोरों को उनके अत्याचारों के लिए माफ करने की अपील की। उन्होंने सभी जातियों, पुरुषों और महिलाओं की समानता, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों पर आधारित एक नया दक्षिण अफ्रीका बनाने का आह्वान किया।
- संविधान निर्माण: दमनकारी पार्टी और स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व करने वाली पार्टी दोनों ने मिलकर एक सामान्य संविधान का मसौदा तैयार किया। दो साल की चर्चा और बहस के बाद, उन्होंने दुनिया के सबसे बेहतरीन संविधानों में से एक का निर्माण किया। इस संविधान ने अपने नागरिकों को किसी भी देश में उपलब्ध सबसे व्यापक अधिकार दिए।
- मंडेला का दृष्टिकोण: मंडेला ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका का संविधान अतीत और भविष्य दोनों की बात करता है। यह एक गंभीर समझौता है कि वे अपने नस्लवादी, क्रूर और दमनकारी अतीत को कभी दोहराने नहीं देंगे। यह देश को एक ऐसे देश में बदलने का एक चार्टर भी है जो वास्तव में सभी लोगों - काले और गोरे, महिलाओं और पुरुषों द्वारा साझा किया जाता है।
दक्षिण अफ्रीका का संविधान दुनिया भर के लोकतंत्रवादियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आंदोलन के नायक थे। उन्हें 1964 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और 28 साल बाद 1990 में रिहा किया गया। वे 1994 में दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने।
रंगभेद (Apartheid): दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित नस्लीय भेदभाव की एक व्यवस्था, जहाँ लोगों को उनकी त्वचा के रंग के आधार पर अलग किया जाता था और गैर-गोरों पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाते थे।
हमें संविधान की आवश्यकता क्यों है?
दक्षिण अफ्रीकी उदाहरण हमें यह समझने में मदद करता है कि हमें संविधान की आवश्यकता क्यों है और संविधान क्या करते हैं।
संविधान की आवश्यकता के कारण:
- विश्वास और समन्वय: यह विभिन्न प्रकार के लोगों को एक साथ रहने के लिए आवश्यक विश्वास और समन्वय की डिग्री उत्पन्न करता है। दक्षिण अफ्रीका में, उत्पीड़क और उत्पीड़ितों को एक साथ रहना था, और संविधान ने उनके बीच विश्वास स्थापित करने में मदद की।
- सरकार का गठन और शक्तियाँ: यह निर्दिष्ट करता है कि सरकार का गठन कैसे होगा, और किसे कौन से निर्णय लेने की शक्ति होगी। यह तय करता है कि शासकों का चुनाव कैसे किया जाएगा।
- सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ और नागरिक अधिकार: यह सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ निर्धारित करता है और हमें बताता है कि नागरिकों के अधिकार क्या हैं। यह सुनिश्चित करता है कि बहुमत का शासन निरंकुश न हो।
- एक अच्छे समाज के लिए आकांक्षाएँ: यह एक अच्छे समाज के निर्माण के बारे में लोगों की आकांक्षाओं को व्यक्त करता है।
संविधान क्या है?
- संविधान एक देश में एक साथ रहने वाले सभी लोगों द्वारा स्वीकार किए गए लिखित नियमों का एक समूह है।
- यह देश का सर्वोच्च कानून है।
- यह एक क्षेत्र (नागरिकों) में रहने वाले लोगों के बीच संबंधों को निर्धारित करता है।
- यह लोगों और सरकार के बीच संबंधों को भी निर्धारित करता है।
- ये नियम तभी काम करते हैं जब विजेता उन्हें आसानी से नहीं बदल सकता।
लोकतांत्रिक देशों में संविधान:
- सभी देश जिनके पास संविधान हैं, वे आवश्यक रूप से लोकतांत्रिक नहीं हैं। उदाहरण के लिए, चीन और सऊदी अरब के पास संविधान हैं, लेकिन वे लोकतांत्रिक नहीं हैं।
- लेकिन सभी लोकतांत्रिक देशों में संविधान होते हैं।
- अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के बाद, अमेरिकियों ने खुद को एक संविधान दिया।
- फ्रांसीसी क्रांति के बाद, फ्रांसीसी लोगों ने एक लोकतांत्रिक संविधान को मंजूरी दी।
- तब से, सभी लोकतंत्रों में एक लिखित संविधान होना एक प्रथा बन गई है।
अन्य संगठनों में संविधान:
- यह केवल सरकारों पर लागू नहीं होता है। किसी भी संघ को अपने संविधान की आवश्यकता होती है।
- यह आपके क्षेत्र में एक क्लब, एक सहकारी समिति या एक राजनीतिक दल हो सकता है, उन सभी को एक संविधान की आवश्यकता होती है।
संविधान के चार मुख्य कार्य याद रखें: विश्वास, सरकार का गठन, शक्तियों पर सीमाएँ, और आकांक्षाएँ। यह अक्सर 3-5 अंकों के प्रश्न के रूप में पूछा जाता है।
संविधान केवल लोकतांत्रिक देशों में ही नहीं होता, बल्कि सभी लोकतांत्रिक देशों में संविधान अवश्य होता है।
भारतीय संविधान का निर्माण
दक्षिण अफ्रीका की तरह, भारत का संविधान भी बहुत कठिन परिस्थितियों में तैयार किया गया था। भारत जैसे विशाल और विविध देश के लिए संविधान बनाना आसान काम नहीं था।
संविधान निर्माण की चुनौतियाँ:
- विभाजन: देश का विभाजन धार्मिक मतभेदों के आधार पर हुआ था, जिससे भारत और पाकिस्तान के लोगों के लिए एक दर्दनाक अनुभव था। विभाजन संबंधी हिंसा में कम से कम दस लाख लोग मारे गए थे।
- रियासतों का विलय: ब्रिटिशों ने रियासतों के शासकों पर छोड़ दिया था कि वे भारत या पाकिस्तान में विलय करना चाहते हैं या स्वतंत्र रहना चाहते हैं। इन रियासतों का विलय एक कठिन और अनिश्चित कार्य था।
- भविष्य की अनिश्चितता: जब संविधान लिखा जा रहा था, तब देश का भविष्य उतना सुरक्षित नहीं लग रहा था जितना आज है। संविधान निर्माताओं को देश के वर्तमान और भविष्य के बारे में चिंताएँ थीं।
संविधान की ओर मार्ग:
- सर्वसम्मति का विकास: दक्षिण अफ्रीका के विपरीत, भारतीय संविधान निर्माताओं को यह तय करने के लिए सर्वसम्मति बनाने की आवश्यकता नहीं थी कि लोकतांत्रिक भारत कैसा दिखना चाहिए। यह सर्वसम्मति स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही विकसित हो गई थी।
- राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव: हमारा राष्ट्रीय आंदोलन केवल विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष नहीं था, बल्कि हमारे देश को पुनर्जीवित करने और हमारे समाज और राजनीति को बदलने का संघर्ष भी था।
- प्रारंभिक प्रयास:
- 1928: मोतीलाल नेहरू और आठ अन्य कांग्रेस नेताओं ने भारत के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार किया।
- 1931: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि स्वतंत्र भारत का संविधान कैसा होना चाहिए।
- इन दोनों दस्तावेजों में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्रता और समानता का अधिकार, और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा शामिल थी।
- औपनिवेशिक संस्थानों का अनुभव: औपनिवेशिक शासन के राजनीतिक संस्थानों से परिचित होने से संस्थागत डिजाइन पर सहमति बनाने में मदद मिली।
- ब्रिटिश शासन ने केवल कुछ लोगों को मतदान का अधिकार दिया था, और 1937 में प्रांतीय विधानसभाओं और मंत्रालयों के लिए चुनाव हुए थे।
- ये पूरी तरह से लोकतांत्रिक सरकारें नहीं थीं, लेकिन भारतीयों द्वारा विधायी संस्थानों के कामकाज में प्राप्त अनुभव देश के लिए अपने स्वयं के संस्थानों की स्थापना और उनमें काम करने के लिए बहुत उपयोगी साबित हुआ।
- इसीलिए भारतीय संविधान ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 जैसे औपनिवेशिक कानूनों से कई संस्थागत विवरण और प्रक्रियाएँ अपनाईं।
- अन्य देशों से प्रेरणा: हमारे नेताओं ने अन्य देशों से सीखने का आत्मविश्वास प्राप्त किया, लेकिन अपनी शर्तों पर।
- फ्रांसीसी क्रांति के आदर्शों, ब्रिटेन में संसदीय लोकतंत्र की प्रथा, और अमेरिका में अधिकारों के बिल से कई नेता प्रेरित थे।
- रूस में समाजवादी क्रांति ने कई भारतीयों को सामाजिक और आर्थिक समानता पर आधारित एक प्रणाली को आकार देने के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया।
- हालांकि, उन्होंने केवल दूसरों ने जो किया था उसकी नकल नहीं की। हर कदम पर वे सवाल कर रहे थे कि क्या ये चीजें हमारे देश के अनुकूल हैं।
संविधान सभा:
- गठन: संविधान नामक दस्तावेज का मसौदा निर्वाचित प्रतिनिधियों की एक सभा द्वारा तैयार किया गया था जिसे संविधान सभा कहा जाता था।
- चुनाव: संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई 1946 में हुए थे।
- पहली बैठक: इसकी पहली बैठक दिसंबर 1946 में हुई थी।
- विभाजन: देश के विभाजन के तुरंत बाद, संविधान सभा को भारत की संविधान सभा और पाकिस्तान की संविधान सभा में विभाजित किया गया।
- सदस्य: भारतीय संविधान लिखने वाली संविधान सभा में 299 सदस्य थे।
- अंगीकरण: सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान को अपनाया।
- लागू होना: यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। इस दिन को चिह्नित करने के लिए हम हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं।
संविधान की वैधता:
- सर्वसम्मति: संविधान अपने सदस्यों के विचारों को अकेले प्रतिबिंबित नहीं करता है। यह अपने समय की व्यापक सर्वसम्मति को व्यक्त करता है।
- स्थिरता: दुनिया के कई देशों को अपने संविधान को फिर से लिखना पड़ा है क्योंकि बुनियादी नियम सभी प्रमुख सामाजिक समूहों या राजनीतिक दलों को स्वीकार्य नहीं थे। भारत में, किसी भी बड़े सामाजिक समूह या राजनीतिक दल ने कभी भी संविधान की वैधता पर सवाल नहीं उठाया है। यह किसी भी संविधान के लिए एक असामान्य उपलब्धि है।
- प्रतिनिधित्व: संविधान सभा ने भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व किया। उस समय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं था, इसलिए संविधान सभा को सीधे भारत के सभी लोगों द्वारा नहीं चुना जा सकता था। इसे मुख्य रूप से मौजूदा प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा चुना गया था।
- विविधता: सभा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभुत्व था, लेकिन कांग्रेस में ही विभिन्न राजनीतिक समूह और राय शामिल थीं। सामाजिक दृष्टि से भी, सभा ने विभिन्न भाषा समूहों, जातियों, वर्गों, धर्मों और व्यवसायों के सदस्यों का प्रतिनिधित्व किया।
भारतीय संविधान निर्माण की महत्वपूर्ण तिथियाँ
- 1928: मोतीलाल नेहरू और 8 अन्य कांग्रेस नेताओं द्वारा संविधान का मसौदा।
- 1931: कराची अधिवेशन में स्वतंत्र भारत के संविधान की रूपरेखा पर प्रस्ताव।
- जुलाई 1946: संविधान सभा के लिए चुनाव।
- दिसंबर 1946: संविधान सभा की पहली बैठक।
- 26 नवंबर 1949: संविधान सभा द्वारा संविधान को अपनाया गया।
- 26 जनवरी 1950: भारतीय संविधान लागू हुआ (गणतंत्र दिवस)।
भारतीय संविधान ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 से कई संस्थागत विवरण और प्रक्रियाएँ अपनाईं।
भारतीय संविधान के मार्गदर्शक मूल्य
संविधान की समग्र विचारधारा को समझने के लिए, हम इसके प्रमुख नेताओं के विचारों और संविधान की प्रस्तावना को देखते हैं।
प्रमुख नेताओं के विचार:
- महात्मा गांधी:
- उन्होंने 1931 में अपनी पत्रिका 'यंग इंडिया' में अपने संविधान के दृष्टिकोण को स्पष्ट किया था।
- उनकी इच्छा थी कि संविधान भारत को सभी गुलामी और संरक्षण से मुक्त करे।
- वह एक ऐसे भारत के लिए काम करना चाहते थे जहाँ सबसे गरीब भी महसूस करें कि यह उनका देश है, जहाँ उनकी प्रभावी आवाज हो।
- एक ऐसा भारत जहाँ कोई उच्च वर्ग और निम्न वर्ग न हो, और सभी समुदाय पूर्ण सद्भाव में रहें।
- अस्पृश्यता और नशीले पेय और दवाओं के लिए कोई जगह न हो।
- महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलें।
- डॉ. बी.आर. अम्बेडकर:
- संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उन्होंने असमानताओं को दूर करने के तरीके के बारे में गांधीजी से अलग दृष्टिकोण रखा।
- संविधान सभा में अपने समापन भाषण में, उन्होंने अपनी चिंता स्पष्ट रूप से व्यक्त की: "26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी और सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमारे पास असमानता होगी।" उन्होंने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता के अभाव को राजनीतिक लोकतंत्र के लिए खतरा बताया।
- जवाहरलाल नेहरू:
- 15 अगस्त 1947 की आधी रात को संविधान सभा को अपना प्रसिद्ध भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' (नियति से भेंट) दिया।
- उन्होंने कहा कि भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।
- स्वतंत्रता और शक्ति जिम्मेदारी लाती है, और यह जिम्मेदारी भारत के लोगों की सेवा करने की है।
- भारत की सेवा का अर्थ है लाखों लोगों की सेवा करना जो पीड़ित हैं।
- इसका अर्थ है गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और अवसर की असमानता का अंत।
संविधान की प्रस्तावना (Preamble):
- संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान के दर्शन को संक्षेप में प्रस्तुत करती है।
- यह संविधान के मूल्यों, आदर्शों और उद्देश्यों को दर्शाती है।
- यह संविधान की आत्मा है।
- प्रस्तावना के मुख्य शब्द और उनके अर्थ:
- हम भारत के लोग (WE, THE PEOPLE OF INDIA): यह दर्शाता है कि संविधान भारत के लोगों द्वारा बनाया और अधिनियमित किया गया है, और वे ही इसके अंतिम स्रोत हैं।
- संप्रभु (SOVEREIGN): भारत एक स्वतंत्र देश है, जो किसी बाहरी शक्ति के नियंत्रण में नहीं है। यह अपने आंतरिक और बाहरी मामलों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है।
- समाजवादी (SOCIALIST): सरकार को सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करनी चाहिए। धन का संचय कुछ हाथों में नहीं होना चाहिए, और सभी को बेहतर जीवन स्तर के लिए समान अवसर मिलने चाहिए।
- धर्मनिरपेक्ष (SECULAR): भारत में सभी धर्मों को समान सम्मान दिया जाता है। सरकार का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है, और सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने, अभ्यास करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता है।
- लोकतांत्रिक (DEMOCRATIC): सरकार लोगों द्वारा चुनी जाती है और लोगों के प्रति जवाबदेह होती है। लोगों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं।
- गणराज्य (REPUBLIC): राज्य का प्रमुख (राष्ट्रपति) एक निर्वाचित व्यक्ति होता है, न कि वंशानुगत शासक।
- न्याय (JUSTICE): सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिलना चाहिए। किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
- स्वतंत्रता (LIBERTY): नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता है, लेकिन यह दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
- समानता (EQUALITY): कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं। किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
- बंधुत्व (FRATERNITY): सभी नागरिकों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे देश की एकता और अखंडता बनी रहे।
संस्थागत डिजाइन:
- संविधान केवल मूल्यों और दर्शन का एक बयान नहीं है।
- यह इन मूल्यों को संस्थागत व्यवस्थाओं में बदलने के बारे में है।
- यह सरकार के विभिन्न अंगों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) की शक्तियों और जिम्मेदारियों को परिभाषित करता है।
- यह उनके बीच संबंधों को भी स्पष्ट करता है।
- भारतीय संविधान एक बहुत ही विस्तृत दस्तावेज है, जिसमें समय-समय पर संशोधन किए गए हैं ताकि यह बदलती परिस्थितियों के अनुकूल हो सके।
प्रस्तावना (Preamble): भारतीय संविधान की प्रस्तावना एक परिचयात्मक कथन है जो संविधान के मार्गदर्शक उद्देश्यों और सिद्धांतों को निर्धारित करती है। इसे संविधान की आत्मा कहा जाता है।
प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़े गए थे।