जीवों का विकास
यह अध्याय पृथ्वी पर जीवों की विविधता, उनके विकास के कारणों और प्राकृतिक चयन के सिद्धांतों की पड़ताल करता है। छात्र डायनासोर के युग से लेकर वर्तमान प्रजातियों तक के जीवों के विकास को समझेंगे। चार्ल्स डार्विन की बीगल यात्रा, उनके अवलोकन और विकास के सिद्धांत, जिसमें सजातीय और समवृत्ति लक्षण शामिल हैं, पर विस्तार से चर्चा की गई है। अध्याय अनुकूलन और प्रजातिकरण की अवधारणाओं को भी समझाता है, जिससे छात्रों को यह समझने में मदद मिलती है कि कैसे प्रजातियाँ समय के साथ बदलती और विकसित होती हैं।
जीवों की विविधता और डायनासोर
पृथ्वी पर हजारों/लाखों की संख्या में जीवों की प्रजातियाँ मौजूद हैं। इनमें से कुछ वर्तमान में हैं, कुछ विलुप्त हो चुकी हैं (जैसे डायनासोर)।
- डायनासोर का युग:
- लगभग 2000 लाख से 600 लाख वर्ष पूर्व पृथ्वी पर डायनासोर का राज था।
- इनका आकार 50 सेमी से लेकर 40 मीटर तक होता था।
- कुछ मांसाहारी, कुछ शाकाहारी, कुछ दो पैरों पर चलने वाले, कुछ चार पैरों पर और कुछ उड़ने वाले थे।
- उदाहरण: जबलपुर के लमेटाघाट और नर्मदा घाटी में इनके अवशेष मिले हैं।
- डायनासोर के समय के अन्य जीव:
- शैवाल, फर्न, मॉस, साइकस, गिंको (Ginkgo) जैसे पौधे आज भी पाए जाते हैं।
- चूहे जैसे स्तनधारी और तिलचट्टा (कॉकरोच) भी उस समय मौजूद थे।
- आज के पक्षियों को डायनासोर का छोटा रूप माना जा सकता है।
- डायनासोर के बाद का युग:
- डायनासोर के विलुप्त होने के बाद विशालकाय हाथी जैसे स्तनधारी और अन्य जीवों की संख्या बढ़ने लगी।
- मनुष्य और हाथी जैसी प्रजातियाँ डायनासोर के युग में नहीं थीं।
- विलुप्ति और विकास के प्रश्न:
- जीवों में परिवर्तन कैसे आया होगा?
- नए जीव कैसे बने होंगे?
- क्या डायनासोर की विलुप्ति के पीछे कोई विशेष कारण था?
गिंकों नामक पेड़ डायनासोर के युग का है और हिरोशिमा में एटम बम से सब कुछ ध्वंस होने के बाद पहला पनपने वाला सजीव यही था। यह इसकी अत्यधिक अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।
आवास और जनसंख्या पर उसका प्रभाव
जीवों के विकास में आवास और संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- आवास की आवश्यकताएँ:
- किसी भी जीव के आवास में उसकी बुनियादी जरूरतों (भोजन, प्रजनन, सुरक्षा) की पूर्ति होती है।
- पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता से जीवों की संख्या में वृद्धि होती है।
- जनसंख्या वृद्धि और संसाधन:
- कुछ प्रजातियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जबकि कुछ की तेजी से घट रही है (जैसे बाघ, बाज, सोनचिरैया)।
- मनुष्य की बढ़ती आबादी के कारण संसाधनों की कमी होने लगी है।
- जनसंख्या वृद्धि और खाद्य आपूर्ति का ग्राफ:
- खाद्य संसाधन की मात्रा समय के साथ लगभग स्थिर या धीमी गति से बढ़ती है।
- जनसंख्या वृद्धि अनियंत्रित होने पर तेजी से बढ़ती है (घातीय वृद्धि)।
- वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जनसंख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ती है, तो खाद्य संसाधन पर्याप्त नहीं होंगे।
- ऐसी स्थिति में प्राकृतिक आपदा, परस्पर द्वंद्व व लड़ाई से कुछ जीव मर जाते हैं, जबकि कुछ बच जाते हैं।
- इस प्रकार, जीवों की संख्या नियंत्रित रहती है।
- जीवों पर प्रकृति का प्रभाव:
- जो जीव बच जाते हैं, उनमें कुछ विशेष विशेषताएँ होती हैं जो उन्हें जीवित रहने में मदद करती हैं।
- प्रकृति जीवों पर गहरा प्रभाव डालती है, जिससे उनकी उत्पत्ति, विलुप्ति या बदलाव हो सकता है।
- डायनासोर की विलुप्ति के पीछे भी ऐसा ही कोई कारण रहा होगा, जैसे संसाधनों की कमी या पर्यावरणीय बदलाव।
- कोशिका सिद्धांत का संदर्भ:
- पिछली कक्षा में पढ़ा गया है कि कोशिकाएँ पूर्ववर्ती कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं, और इन्हीं से बहुकोशिकीय जीव बनते हैं।
- यह सिद्धांत जीवों की उत्पत्ति और विकास की आधारशिला है।
- डार्विन और वैलेस:
- चार्ल्स डार्विन और अल्फ्रेड रसेल वैलेस ने जीवों की उत्पत्ति के बारे में अपने व्यापक अध्ययन के आधार पर सिद्धांत दिए।
ग्राफ विश्लेषण: जनसंख्या वृद्धि और खाद्य संसाधन के ग्राफ को समझें। यह दर्शाता है कि जनसंख्या घातीय रूप से बढ़ती है जबकि संसाधन रैखिक रूप से बढ़ते हैं, जिससे संघर्ष उत्पन्न होता है।
बीगल का सफर और डार्विन का अनुभव
चार्ल्स डार्विन ने अपनी बीगल यात्रा के दौरान जीवों की विविधता और प्रकृति के प्रभाव का गहन अध्ययन किया, जिससे उनके विकास के सिद्धांत की नींव पड़ी।
- डार्विन की रुचि:
- बचपन से ही प्राकृतिक परिघटनाओं, प्राणियों के आवास और व्यवहार में रुचि रखते थे।
- अपने आसपास से जानकारी जुटाने में लगे रहते थे।
- बीगल यात्रा (1831-1836):
- सन् 1831 में, डार्विन को एच.एम.एस. बीगल नामक जहाज में अन्वेषी यात्रा का मौका मिला।
- यह यात्रा इंग्लैंड से शुरू होकर दक्षिण अमेरिका और पृथ्वी के कई महाद्वीपों तक फैली थी।
- उद्देश्य: नक्शा तैयार करना, इलाकों की खनिज संपदा और जैव विविधता का अध्ययन करना।
- जहाज में रहने, अध्ययन करने के कक्ष के अलावा एक अच्छा पुस्तकालय भी था।
- यात्रा 27 दिसंबर 1831 से 2 अक्टूबर 1836 तक चली।
- यात्रा का महत्व:
- इस यात्रा ने डार्विन को दुनिया भर की अद्वितीय जैव विविधता का प्रत्यक्ष अनुभव करने का अवसर दिया।
- उनके अवलोकनों ने वैज्ञानिक और सामाजिक सोच में व्यापक परिवर्तन लाया।
डार्विन की बीगल यात्रा जीवों के विकास के सिद्धांत की नींव थी। उन्होंने इस यात्रा के दौरान जो अवलोकन किए, वे उनके सिद्धांत के लिए महत्वपूर्ण प्रमाण बने।
डार्विन के अवलोकन
बीगल के सफर के दौरान डार्विन ने कई महत्वपूर्ण अवलोकन किए, जिन्होंने उन्हें जीवों के विकास का सिद्धांत प्रतिपादित करने में मदद की।
- समुद्री जीवों का अध्ययन:
- समुद्र के पानी के नमूनों में कई प्रकार के जीव देखे।
- उन्हें खाने व खाए जाने की अद्भुत खाद्य श्रृंखला नज़र आई।
- यह अवलोकन दक्षिण अमेरिका के जंगलों व पहाड़ों पर भी दिखा, जहाँ 'हर तरफ संघर्ष है, मरो या मारो' की स्थिति थी।
- उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भौगोलिक जरूरत के अनुसार जो ढल गया, वही जीव बच जाता है।
- उष्णकटिबंधीय जंगलों का अवलोकन:
- डार्विन ने पहली बार विविध प्रकार के प्राणियों और उनके आवास का अवलोकन किया।
- भूवैज्ञानिक अवलोकन:
- दक्षिण अमेरिकी पहाड़ों पर समुद्री जीवों के जीवाश्म वाली चट्टानें मिलीं।
- एक भूकंप का अनुभव किया जिससे समुद्र की सतह लगभग 3 मीटर ऊँची हो गई थी।
- इन अवलोकनों से पता चला कि समय के साथ महाद्वीप और महासागर में व्यापक बदलाव आ सकता है।
- रेतीले समुद्री किनारों के स्थान पर ऊँचे चट्टानों से घिरे किनारों से अनुमान लगाया कि निरंतर चलने वाली प्रक्रियाओं से भी पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन आ सकता है।
- जीवाश्मों का अध्ययन:
- विशालकाय विलुप्त स्तनधारियों, सरीसृपों आदि के जीवाश्मों से पता चला कि पूर्व के जीवों और वर्तमान के जीवों में भिन्नताओं के साथ-साथ समानताएँ भी हैं।
- यह दर्शाता है कि पृथ्वी की सतह पर परिवर्तन के साथ-साथ जीवों में भी परिवर्तन आया होगा।
- सीलकेन्थ मछली:
- 1938 में अफ्रीकी तट पर पकड़ी गई 'सीलकेन्थ' मछली को पहले विलुप्त माना जाता था।
- इसमें उभयचरों और मछलियों दोनों की विशेषताएँ थीं।
- इसे लंबे समय तक 'जीवित जीवाश्म' कहा गया, लेकिन अब माना जाता है कि इसमें विकास की प्रक्रिया अभी भी हो रही है।
जीवाश्म पूर्व और वर्तमान में पाए जाने वाले जीवों के आपसी संबंध दर्शाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे विकास के प्रमाण प्रदान करते हैं।
गलापागोस द्वीप समूह पर डार्विन के अवलोकन
गलापागोस द्वीप समूह डार्विन के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहाँ उन्होंने विविधता और अनुकूलन के कई प्रमाण देखे।
- गलापागोस की विशेषताएँ:
- दक्षिण अमेरिका के इक्वेडोर के पास स्थित, ज्वालामुखी लावा से बने कई छोटे-बड़े टापुओं का समूह।
- डार्विन ने यहाँ के कैक्टस, पौधे, छिपकली, पक्षी, कछुए, वर्मी (आर्माडिल्लो) आदि का अध्ययन किया।
- वर्मियों का अवलोकन:
- गलापागोस में मिले वर्मी (आर्माडिल्लो) के जीवाश्म दर्शाते थे कि पूर्व के वर्मी काफी बड़े थे।
- डार्विन द्वारा अध्ययन किए गए वर्मी आकार में छोटे थे।
- निष्कर्ष: समय के साथ वर्मियों में बदलाव आया है।
- फिंच पक्षियों का अध्ययन:
- डार्विन ने गलापागोस में लगभग 15 अलग-अलग प्रकार के फिंच का अध्ययन किया।
- सभी फिंच एक जैसे थे, लेकिन अलग-अलग टापुओं पर मिलने वाले फिंच थोड़े अलग थे, खासकर उनकी चोंच और पंख के रंग में।
- चोंच की विविधता: डार्विन ने देखा कि अलग-अलग चोंच वाले फिंच का भोजन भी अलग-अलग था (बीज, फल, कीड़े, फूलों का रस)।
- यह विविधता खाद्य संसाधनों की उपलब्धता से संबंधित थी; कार्य के अनुसार चोंच में विविधताएँ थीं।
- डार्विन का अनुमान: ये फिंच इक्वेडोर से उड़कर गलापागोस पहुँचे होंगे और फिर अलग-अलग टापुओं के परिवेश में ढल गए होंगे।
- यह संभव हुआ क्योंकि फिंच की प्रजाति में भी विविधताएँ थीं।
- एक जैसी चोंच वाले पूर्वजों से, कार्य के अनुसार फिंचों की चोंच में विविधताएँ, सजातीय लक्षण का एक महत्वपूर्ण प्रमाण था।
- सजातीय लक्षण (Homologous Characters):
- ऐसे लक्षण जिनकी उत्पत्ति एक जैसी होती है, लेकिन कार्य अलग-अलग होते हैं।
- उदाहरण:
- पौधों में: कद्दू/झुमकलता के प्रतान, नींबू के काँटे, आलू के कंद - सभी की उत्पत्ति तने की कलिका से हुई है, पर कार्य अलग हैं।
- जंतुओं में: पक्षी व चमगादड़ के पंख, डॉल्फिन व सील के पंख, भेड़ व कुत्ते की अगली टांग, मनुष्य व छछूंदर के अग्रपाद। इन सभी की संरचना (ह्यूमेरस, रेडियस, अल्ना) एक जैसी है, लेकिन कार्य (उड़ना, तैरना, दौड़ना, पकड़ना) अलग-अलग हैं। यह समान पूर्वज को दर्शाता है।
- समवृत्ति लक्षण (Analogous Characters):
- ऐसे लक्षण जिनकी उत्पत्ति अलग-अलग होती है, लेकिन कार्य एक जैसे होते हैं।
- उदाहरण: तितलियों और पक्षियों के पंख। दोनों का कार्य उड़ना है, लेकिन पक्षी का पंख उसके अग्र टांग से बना है, जबकि तितलियों का पंख मुख्य रूप से त्वचा से बना है। यह अलग-अलग पूर्वजों को दर्शाता है।
सजातीय लक्षण (Homologous Characters): वे अंग जिनकी मूल संरचना और उत्पत्ति समान होती है, लेकिन विभिन्न कार्यों के लिए अनुकूलित होने के कारण उनकी बाहरी रूपरेखा भिन्न हो सकती है। ये समान पूर्वज को दर्शाते हैं।
समवृत्ति लक्षण (Analogous Characters): वे अंग जिनकी उत्पत्ति और आंतरिक संरचना भिन्न होती है, लेकिन समान कार्य करने के कारण उनकी बाहरी रूपरेखा समान दिखाई देती है। ये अलग-अलग पूर्वजों को दर्शाते हैं।
प्रजातिकरण की अवधारणा
डार्विन के अवलोकनों ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या प्रकृति में भी कृत्रिम चयन जैसी कोई प्रक्रिया होती है, जिससे जीवों की विविधता उत्पन्न होती है।
- कृत्रिम चयन (Artificial Selection):
- मनुष्य द्वारा अपनी इच्छा अनुसार लक्षणों का चयन कर जानवर और पौधों की अलग-अलग प्रजाति तैयार करने की प्रक्रिया।
- उदाहरण: धान, गेहूँ की हजारों किस्में; सब्जियों की कई किस्में (जैसे सरसों से नवलगोल, मूली, ब्रोकली, पत्तागोभी, फूलगोभी)।
- यह दर्शाता है कि चयन से नई प्रजातियाँ बन सकती हैं।
- प्राकृतिक चयन (Natural Selection):
- डार्विन ने सुझाया कि प्रकृति में स्वतः चलने वाली चयन की प्रक्रिया से दुनिया के अधिकांश जीवों की उत्पत्ति हुई है।
- इसमें भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप लक्षणों का चयन होता रहता है।
- यह कृत्रिम चयन जैसी सोची-समझी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि प्रकृति में स्वतः होने वाली प्रक्रिया है।
- अल्फ्रेड रसेल वैलेस: डार्विन के समकालीन वैज्ञानिक, जिन्होंने तितलियों और कुछ स्तनधारी जीवों का अध्ययन कर डार्विन जैसे निष्कर्ष पर पहुँचे कि प्रजातियाँ पूर्ववर्ती प्रजातियों से ही उत्पन्न होती हैं।
- विकास का सिद्धांत (डार्विन और वैलेस द्वारा):
- विविधता: जीवों में विविधता पाई जाती है, जिससे उनके जीने की क्षमता में अंतर होता है। जिनकी जीने की क्षमता ज्यादा होती है, वे परिवेश में ढलकर जीते हैं।
- उत्पत्ति: प्रजातियों की रचना एक झटके में नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रजातियों से होती है।
- शाखित पेड़: विविध जीवों की उत्पत्ति एक समान पूर्वज से हुई है, इसलिए विकास की प्रक्रिया को एक शाखित पेड़ के रूप में दर्शाया जा सकता है।
- विभिन्नताओं का संचरण: जनसंख्या में पाई जाने वाली कुछ विभिन्नताएँ ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाती हैं।
- नई प्रजाति का निर्माण: लाभदायक भिन्नताओं वाली प्रजातियाँ आवास में पनपती हैं और समय के साथ उनकी आबादी बढ़ती है, जो अन्य प्रजातियों की आबादी को प्रभावित करती है।
- अनुकूलन और प्रजातिकरण:
- अनुकूलन (Adaptation): समय के साथ किसी जीव का अपने आवास में ढल जाने की प्रक्रिया। अनुकूलित जीवों की आबादी बढ़ती रहती है।
- प्रजातिकरण (Speciation): जीवों में विविधता से अलग-अलग प्रजातियों के बनने की प्रक्रिया।
- उदाहरण: गलापागोस के फिंच, जो दक्षिण अमेरिका की एक प्रजाति से विकसित हुए और अलग-अलग द्वीपों पर अलग-अलग आवासों में अनुकूलित हो गए। वे इतने विविध हो गए कि एक द्वीप के फिंच दूसरे द्वीप के फिंच के साथ लैंगिक प्रजनन करने में असमर्थ हो गए।
- प्रजाति की परिभाषा:
- जैविक प्रजाति: जीवों का वह समूह जो आपस में लैंगिक प्रजनन कर सके।
- समस्याएँ: यह परिभाषा उन जीवों पर लागू नहीं होती जो अलैंगिक प्रजनन करते हैं (जैसे जीवाणु, कुछ पौधे)। डार्विन को भी ऐसे उदाहरण मिले जहाँ लैंगिक प्रजनन के बावजूद इतनी भिन्नता थी कि उन्हें नई प्रजाति मानना बेहतर था।
- प्रजातिकरण के कारण: प्राकृतिक आपदा या आवास और खाद्य संसाधनों में बदलाव से प्रजातिकरण की संभावना रहती है।
- विविधताओं की उत्पत्ति:
- डार्विन ने पौधों (मिराबिलस) और जंतुओं (कबूतर) के साथ प्रयोग किए।
- ग्रेगर जोहान मेंडल के अध्ययनों ने विविधताओं के साधनों के बारे में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसे हम 'आनुवंशिकी' अध्याय में पढ़ेंगे।
कृत्रिम चयन (Artificial Selection): वह प्रक्रिया जिसमें मनुष्य अपनी पसंद के गुणों वाले जीवों को प्रजनन के लिए चुनता है, जिससे समय के साथ उन गुणों में वृद्धि होती है और नई किस्में या प्रजातियाँ बनती हैं।
प्राकृतिक चयन (Natural Selection): वह प्रक्रिया जिसमें प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जो अपने पर्यावरण में सबसे अच्छी तरह अनुकूलित होते हैं, जिससे वे जीवित रहते हैं और प्रजनन करते हैं, तथा उनके अनुकूल गुण अगली पीढ़ी में जाते हैं।
डार्विन के विकास के सिद्धांत का वर्णन उनकी पुस्तक "ऑन द ऑरिजिन ऑफ स्पीसीस बाइ नैचुरल सेलेक्शन" (1859) में मिलता है, जबकि वैलेस की पुस्तक "डार्विनिज़्म" (1889) में भी इसका उल्लेख है।