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तत्वों का आवर्ती वर्गीकरण
Chhattisgarh · Class 10 · 🔬 Science · Chapter 4

तत्वों का आवर्ती वर्गीकरण

डॉबेराइनर के त्रिकन्यूलैंड्स का अष्टक सिद्धांतमेन्डेलीफ का आवर्त नियमआधुनिक आवर्त नियमसमूह और आवर्तसंयोजकता में आवर्तिता

इस अध्याय में, आप तत्वों के वर्गीकरण के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन करेंगे, जिसमें डॉबेराइनर के त्रिक, न्यूलैंड्स के अष्टक सिद्धांत और मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी शामिल हैं। आप आधुनिक आवर्त सारणी की विशेषताओं, इसके समूहों और आवर्तों की संरचना, और संयोजकता, परमाणु आकार, धात्विक/अधात्विक गुण, आयनन ऊर्जा, इलेक्ट्रॉन बंधुता और विद्युत ऋणता जैसे आवर्ती गुणों में होने वाले परिवर्तनों को समझेंगे। यह अध्याय आपको तत्वों के गुणों को व्यवस्थित रूप से समझने में मदद करेगा।

तत्वों की प्रारंभिक अवधारणा और वर्गीकरण की आवश्यकता

तत्वों का वर्गीकरण एक व्यवस्थित अध्ययन के लिए आवश्यक है।

  • प्रारंभिक अवधारणाएँ:
  • अरस्तु (ईसा पूर्व 384-322): ब्रह्मांड को पाँच तत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश) से बना माना।
  • रॉबर्ट बॉयल (17वीं शताब्दी): अरस्तु के पंच तत्वों को तत्व की श्रेणी से बाहर किया।
  • लेवोजियर (18वीं शताब्दी): तत्व वह पदार्थ है जिसे सरल पदार्थों में विघटित नहीं किया जा सकता। उन्होंने 33 तत्वों की सूची बनाई।
  • वर्गीकरण की आवश्यकता:
  • वर्तमान में 118 से अधिक तत्व ज्ञात हैं।
  • प्रत्येक तत्व के गुणधर्मों का अलग-अलग अध्ययन करना अत्यंत कठिन है।
  • वर्गीकरण से तत्वों के अध्ययन में सरलता और व्यवस्था आती है।
  • यह भविष्य में नए तत्वों की खोज और उनके गुणों की भविष्यवाणी में सहायक होता है।
  • आधारभूत गुणधर्म:
  • तत्वों के वर्गीकरण के लिए परमाणु संख्या, परमाणु भार और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास जैसे गुणों का उपयोग किया गया।
  • डाल्टन का परमाणु सिद्धांत (1808): इसने वैज्ञानिकों को यह दिशा दी कि तत्वों के परमाणु भार और गुणों में संबंध होता है।
महत्त्वपूर्ण

तत्वों के वर्गीकरण का मुख्य उद्देश्य उनके गुणों में समानता और भिन्नता के आधार पर एक व्यवस्थित अध्ययन करना है।

डॉबेराइनर का त्रिक नियम

  • वैज्ञानिक: जोहान्न वुल्फगांग डॉबेराइनर (जर्मन वैज्ञानिक)।
  • आधार: परमाणु भार।
  • नियम: जब समान गुणधर्म वाले तीन तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु भार के क्रम में व्यवस्थित किया जाता है, तो बीच वाले तत्व का परमाणु भार अन्य दो तत्वों के परमाणु भार का औसत होता है। साथ ही, बीच वाले तत्व के गुणधर्म भी शेष दो तत्वों के गुणधर्मों के मध्य होते हैं।
  • उदाहरण:
  • लिथियम (Li), सोडियम (Na), पोटैशियम (K):
  • Li का परमाणु भार = 6.9
  • K का परमाणु भार = 39.1
  • औसत = \((6.9 + 39.1) / 2 = 46 / 2 = 23.0\)
  • Na का परमाणु भार = 23.0 (जो औसत के निकट है)।
  • डॉबेराइनर के त्रिक:
  • Li, Na, K
  • Ca, Sr, Ba
  • Cl, Br, I
  • सीमाएँ:
  • यह नियम उस समय तक ज्ञात सभी तत्वों पर लागू नहीं होता था।
  • डॉबेराइनर केवल तीन त्रिक ही बना सके।
  • इसलिए, यह वर्गीकरण पद्धति सफल नहीं रही।
याद रखें

डॉबेराइनर का त्रिक नियम तत्वों के वर्गीकरण की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम था, जिसने यह दर्शाया कि तत्वों के गुणधर्म उनके परमाणु भार से संबंधित होते हैं।

न्यूलैंड्स का अष्टक सिद्धांत

  • वैज्ञानिक: जॉन एलेक्जेंडर न्यूलैंड्स (ब्रिटिश वैज्ञानिक)।
  • आधार: परमाणु भार।
  • नियम: यदि तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु भार के क्रम में व्यवस्थित किया जाए, तो प्रत्येक आठवें तत्व के गुणधर्म पहले तत्व के गुणधर्मों के समान होते हैं।
  • इसकी तुलना संगीत के सुरों (सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सा) से की गई, जहाँ आठवाँ सुर पहले सुर जैसा होता है।
  • उन्होंने इसे हाइड्रोजन से शुरू किया और 56वें तत्व थोरियम पर समाप्त किया।
  • उदाहरण:
  • लिथियम (Li) से शुरू करने पर, आठवाँ तत्व सोडियम (Na) है, और इनके गुणधर्म समान हैं।
  • बेरिलियम (Be) से आठवाँ तत्व मैग्नीशियम (Mg) है, इनके गुणधर्म भी समान हैं।
  • सीमाएँ:
  • यह सिद्धांत केवल कैल्सियम (Ca) तक ही लागू होता था। कैल्सियम के बाद, आठवें तत्व के गुणधर्म पहले तत्व से नहीं मिलते थे।
  • यह केवल 56 तत्वों तक ही सीमित था और नए तत्वों के लिए कोई रिक्त स्थान नहीं था।
  • कुछ तत्व जिनके गुण समान नहीं थे, उन्हें एक ही समूह में रखा गया (जैसे कोबाल्ट और निकेल को फ्लोरीन, क्लोरीन, ब्रोमीन के साथ; आयरन को ऑक्सीजन और सल्फर के साथ)।
  • बाद में खोजे गए उत्कृष्ट गैसों (अक्रिय गैसों) के लिए कोई स्थान नहीं था।
  • न्यूलैंड्स ने यह मान लिया था कि प्रकृति में केवल 56 तत्व ही मौजूद हैं।
  • महत्व: न्यूलैंड्स का अष्टक सिद्धांत भी तत्वों के वर्गीकरण में एक महत्वपूर्ण प्रयास था, जिसने आवर्तिता की अवधारणा को मजबूत किया।
🚧ग़लत धारणा

छात्र अक्सर न्यूलैंड्स के अष्टक सिद्धांत की तुलना संगीत के सुरों से करने में गलती करते हैं, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि यह समानता केवल आठवें तत्व के गुणों की पुनरावृत्ति पर आधारित थी।

लोथर मेयर का परमाणु आयतन वक्र

  • वैज्ञानिक: लोथर मेयर (जर्मन वैज्ञानिक)।
  • आधार: तत्वों के परमाणु भार और परमाणु आयतन के मध्य ग्राफ।
  • अवलोकन:
  • उन्होंने देखा कि समान गुणधर्म वाले तत्व वक्र में समान स्थानों पर स्थित होते हैं।
  • उच्चतम शिखर पर: सोडियम (Na), पोटैशियम (K), रूबिडियम (Rb) जैसे क्षार धातुएँ।
  • चढ़ाव के बीच: फ्लोरीन (F), क्लोरीन (Cl), ब्रोमीन (Br) जैसे हैलोजन।
  • घटाव वाले भागों पर: मैग्नीशियम (Mg), कैल्सियम (Ca) जैसी क्षारीय मृदा धातुएँ।
  • निम्नतम बिंदुओं पर: बेरिलियम (Be), बोरॉन (B), कार्बन (C), ऐलुमिनियम (Al) आदि।
  • निष्कर्ष: तत्वों के परमाणु आयतन उनके परमाणु भार के आवर्ती फलन (periodic function) होते हैं।
  • महत्व:
  • लोथर मेयर के कार्य ने मेन्डेलीफ को उनके आवर्त सारणी के निर्माण में आवर्ती शब्द का उपयोग करने की दिशा दी।
  • हालांकि उनका वर्गीकरण मेन्डेलीफ की तरह सरल और व्यापक रूप से स्वीकार्य नहीं हुआ, लेकिन इसने आवर्तिता की अवधारणा को और पुष्ट किया।
महत्त्वपूर्ण

लोथर मेयर और मेन्डेलीफ ने लगभग एक ही समय पर तत्वों के वर्गीकरण पर काम किया, लेकिन मेन्डेलीफ की सारणी अधिक व्यापक और स्वीकार्य हुई क्योंकि उन्होंने तत्वों के भौतिक और रासायनिक दोनों गुणों को आधार बनाया था।

मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी और नियम

  • वैज्ञानिक: डमित्री इवानोविच मेन्डेलीफ (रूसी रसायनज्ञ)।
  • आधार: परमाणु भार और तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म।
  • उन्होंने विशेष रूप से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के साथ तत्वों द्वारा बनाए गए यौगिकों (ऑक्साइड और हाइड्राइड) का अध्ययन किया, क्योंकि ये दोनों तत्व अत्यंत सक्रिय होते हैं और अधिकांश तत्वों के साथ यौगिक बनाते हैं।
  • मेन्डेलीफ का आवर्त नियम (1869):
  • तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुण उनके परमाणु भारों के आवर्ती फलन होते हैं।
  • आवर्त सारणी की संरचना:
  • समूह/वर्ग (Groups): उर्ध्व स्तंभ (vertical columns)। समान गुणधर्म वाले तत्व एक ही समूह में आते हैं।
  • आवर्त (Periods): क्षैतिज पंक्तियाँ (horizontal rows)।
  • उन्होंने 63 ज्ञात तत्वों को व्यवस्थित किया।
  • ऑक्साइड और हाइड्राइड के सूत्र शीर्ष पर दिए गए (जैसे RH, RO₂)। 'R' समूह के किसी तत्व को दर्शाता है।
  • किसी वर्ग की क्रम संख्या उस वर्ग के तत्वों की ऑक्सीजन के सापेक्ष संयोजकता दर्शाती है।
  • जैसे, R₂O वाले प्रथम समूह में (संयोजकता 1)।
  • RO वाले द्वितीय समूह में (संयोजकता 2)।
  • तृतीय समूह के ऑक्साइड का सूत्र R₂O₃ होगा (संयोजकता 3)।

मेन्डेलीफ आवर्त सारणी की उपलब्धियाँ

  1. तत्वों के अध्ययन में सहायक:
  • एक वर्ग के तत्वों के गुणों में समानता पाई जाती है।
  • किसी वर्ग के एक तत्व के गुणों की जानकारी होने पर अन्य तत्वों के गुणों का अनुमान लगाया जा सकता है।
  1. नए तत्वों की खोज में सहायक:
  • मेन्डेलीफ ने अपनी सारणी में कुछ रिक्त स्थान छोड़े थे।
  • उन्होंने इन रिक्त स्थानों के लिए अज्ञात तत्वों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी।
  • उन्होंने इन तत्वों का नामकरण 'एका' उपसर्ग लगाकर किया (जैसे एका-बोरॉन, एका-ऐलुमिनियम, एका-सिलिकन)।
  • बाद में खोजे गए स्कैंडियम, गैलियम, जर्मेनियम के गुणधर्म क्रमशः एका-बोरॉन, एका-ऐलुमिनियम और एका-सिलिकन के समान पाए गए।
  1. संदिग्ध परमाणु भार में सुधार:
  • मेन्डेलीफ ने बेरिलियम के परमाणु भार को 13.5 से 9 में संशोधित किया, जिससे उसे लिथियम और बोरॉन के बीच सही स्थान मिला।
  • इंडियम, यूरेनियम आदि तत्वों के परमाणु भारों में भी सुधार किया गया।
  1. अक्रिय गैसों का स्थान:
  • मेन्डेलीफ के समय अक्रिय गैसें (He, Ne, Ar) ज्ञात नहीं थीं।
  • जब इनकी खोज हुई, तो इन्हें आवर्त सारणी की मूल संरचना को बिगाड़े बिना एक अलग 'शून्य समूह' में रखा गया।

मेन्डेलीफ आवर्त सारणी की सीमाएँ

  1. हाइड्रोजन का स्थान अनिश्चित:
  • हाइड्रोजन क्षार धातुओं (Na⁺, K⁺) की तरह धन आयन (H⁺) बनाता है।
  • यह हैलोजन (Cl⁻, Br⁻) की तरह ऋण आयन (H⁻) भी बनाता है।
  • इसलिए, इसे किस वर्ग में रखा जाए, यह निश्चित नहीं हो सका।
  1. भारी तत्वों को हल्के तत्वों से पहले रखा जाना:
  • कुछ स्थानों पर, अधिक परमाणु भार वाले तत्वों को कम परमाणु भार वाले तत्वों से पहले रखा गया।
  • उदाहरण: कोबाल्ट (परमाणु भार 58.9) को निकेल (परमाणु भार 58.7) से पहले रखा गया। (टेल्यूरियम को आयोडीन से पहले)।
  • यह उनके अपने नियम (बढ़ते परमाणु भार) का उल्लंघन था।
  1. समस्थानिकों को अलग-अलग स्थान नहीं दिया जाना:
  • समस्थानिकों के रासायनिक गुण समान होते हैं, लेकिन परमाणु भार अलग-अलग होते हैं।
  • परमाणु भार के आधार पर, उन्हें अलग-अलग स्थान मिलना चाहिए था, लेकिन मेन्डेलीफ की सारणी में उनके लिए कोई स्थान नहीं था।
  1. परमाणु भार में अनियमित वृद्धि:
  • एक तत्व से दूसरे तत्व की ओर बढ़ने पर परमाणु भार में नियमित वृद्धि नहीं होती थी।
  • इससे यह अनुमान लगाना कठिन हो गया कि दो तत्वों के मध्य कितने नए तत्व खोजे जा सकते हैं, खासकर भारी तत्वों के मामले में।
💡सुझाव

मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी की उपलब्धियाँ और सीमाएँ बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछी जाती हैं। इन्हें बिंदुओं में याद रखना महत्वपूर्ण है।

मोसले का आधुनिक आवर्त नियम

  • वैज्ञानिक: हेनरी मोसले (ब्रिटिश वैज्ञानिक)।
  • समय: 20वीं सदी की शुरुआत (1913)।
  • आधार: तत्वों के एक्स-किरण स्पेक्ट्रम का अध्ययन।
  • अवलोकन: मोसले ने पाया कि तत्वों की एक्स-किरण तरंग दैर्ध्य और मेन्डेलीफ आवर्त सारणी में तत्वों के क्रमांक के बीच एक संबंध है।
  • परमाणु संख्या की पहचान:
  • मोसले के कार्य से परमाणु के एक नए गुण की पहचान हुई जिसे परमाणु संख्या (Atomic Number) कहा गया।
  • परमाणु संख्या किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को दर्शाती है।
  • यह किसी तत्व की विशिष्ट पहचान है।
  • आधुनिक आवर्त नियम:
  • तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुण उनकी परमाणु संख्या के आवर्ती फलन होते हैं।
  • यह नियम मेन्डेलीफ के नियम (परमाणु भार पर आधारित) का संशोधन था।
  • महत्व: परमाणु संख्या को वर्गीकरण का आधार बनाने से मेन्डेलीफ की आवर्त सारणी की कई कमियाँ दूर हो गईं।
📖परिभाषा

परमाणु संख्या (Atomic Number): किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की कुल संख्या। इसे 'Z' से दर्शाया जाता है।

आधुनिक आवर्त सारणी की संरचना

  • वैज्ञानिक: नील्स बोर (मोसले के नियम के अनुसार)।
  • आधार: बढ़ती हुई परमाणु संख्या
  • अन्य नाम: आवर्त सारणी का दीर्घ रूप (Long Form of Periodic Table)।
  • संरचना:
  • समूह/वर्ग (Groups): 18 उर्ध्व खाने (vertical columns)।
  • एक ही समूह के तत्वों के बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है, जिसके कारण उनके रासायनिक गुणधर्म समान होते हैं।
  • सामान्य तत्व: समूह 1, 2, 13, 14, 15, 16, 17 और 18 के तत्व।
  • संक्रमण तत्व: समूह 3 से 12 तक के तत्व।
  • लैंथेनाइड और एक्टिनाइड: समूह 3 में लैंथेनम (La, परमाणु संख्या 57) और एक्टिनियम (Ac, परमाणु संख्या 89) के बाद के 14-14 तत्व, जिन्हें मुख्य सारणी के नीचे अलग से दर्शाया जाता है ताकि सारणी का स्वरूप सुविधाजनक रहे।
  • आवर्त (Periods): 7 क्षैतिज पंक्तियाँ (horizontal rows)।
  • एक ही आवर्त में स्थित सभी तत्वों में कोशों की संख्या समान होती है।
  • आवर्त में बाईं से दाईं ओर जाने पर परमाणु संख्या में एक की वृद्धि होती है, और संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या में भी एक की वृद्धि होती है।
  • कोशों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या: किसी कोश में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या सूत्र \(2n^2\) द्वारा ज्ञात की जाती है, जहाँ n = कोश की संख्या।
  • K कोश (n=1): \(2 \times 1^2 = 2\) → प्रथम आवर्त में 2 तत्व।
  • L कोश (n=2): \(2 \times 2^2 = 8\) → द्वितीय आवर्त में 8 तत्व।
  • M कोश (n=3): \(2 \times 3^2 = 18\) → तृतीय आवर्त में 8 तत्व (बोर-बरी नियम के अनुसार बाह्यतम कोश में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन नहीं हो सकते)।
  • आवर्तों में तत्वों की संख्या:
  • प्रथम आवर्त (लघु आवर्त): 2 तत्व।
  • द्वितीय आवर्त (लघु आवर्त): 8 तत्व।
  • तृतीय आवर्त (लघु आवर्त): 8 तत्व।
  • चतुर्थ आवर्त (दीर्घ आवर्त): 18 तत्व।
  • पंचम आवर्त (दीर्घ आवर्त): 18 तत्व।
  • षष्ठ आवर्त: 32 तत्व।
  • सप्तम आवर्त: 32 तत्व (अपूर्ण)।

आधुनिक आवर्त सारणी की विशेषताएँ

  • यह परमाणु संख्या पर आधारित है, जो तत्वों की पहचान का अधिक मौलिक गुण है।
  • प्रत्येक तत्व की स्थिति उसके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर निश्चित की गई है।
  • यह विभिन्न तत्वों के गुणों में क्रमिक परिवर्तन को अधिक स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
  • हाइड्रोजन का स्थान: आधुनिक आवर्त सारणी में भी हाइड्रोजन का स्थान अनिश्चित है, क्योंकि यह क्षार धातुओं और हैलोजन दोनों के समान गुण प्रदर्शित करता है। इसे आमतौर पर समूह 1 के शीर्ष पर दर्शाया जाता है।
  • समस्थानिकों का स्थान: चूंकि समस्थानिकों की परमाणु संख्या समान होती है, इसलिए उन्हें आधुनिक आवर्त सारणी में एक ही स्थान पर रखा गया है, जो मेन्डेलीफ की सारणी की एक सीमा को दूर करता है।
महत्त्वपूर्ण

आधुनिक आवर्त सारणी में तत्वों के गुणों में आवर्तिता का मूल कारण उनके बाह्यतम कोश के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की पुनरावृत्ति है।

आधुनिक आवर्त सारणी में तत्वों के गुणों में आवर्तिता

आधुनिक आवर्त सारणी में समूह में नीचे की ओर बढ़ने पर और आवर्त में बाईं से दाईं ओर बढ़ने पर तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुणों में नियमित परिवर्तन होते हैं।

1. संयोजकता (Valency)

  • परिभाषा: किसी तत्व के बाह्यतम कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या या अष्टक पूर्ण करने के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉनों की संख्या।
  • आवर्त में (बाईं से दाईं ओर):
  • पहले 1 से 4 तक बढ़ती है, फिर 0 तक घटती है।
  • उदाहरण (द्वितीय आवर्त): Li (1), Be (2), B (3), C (4), N (3), O (2), F (1), Ne (0)।
  • समूह में (ऊपर से नीचे की ओर):
  • समान रहती है, क्योंकि बाह्यतम कोश में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान रहती है।

2. परमाणु आकार (Atomic size / Atomic radius)

  • परिभाषा: परमाणु के नाभिक के केंद्र से उसके बाह्यतम इलेक्ट्रॉनिक कोश के बीच की दूरी।
  • आवर्त में (बाईं से दाईं ओर):
  • घटता है
  • कारण: नाभिक में धनावेश (प्रोटॉन की संख्या) बढ़ता है, जिससे नाभिक इलेक्ट्रॉनों को अधिक मजबूती से आकर्षित करता है, और परमाणु का आकार सिकुड़ जाता है। कोशों की संख्या समान रहती है।
  • समूह में (ऊपर से नीचे की ओर):
  • बढ़ता है
  • कारण: प्रत्येक नए तत्व के साथ एक नया इलेक्ट्रॉनिक कोश जुड़ जाता है, जिससे नाभिक और बाह्यतम कोश के बीच की दूरी बढ़ जाती है।

3. धात्विक एवं अधात्विक गुणधर्म (Metallic and non-metallic properties)

  • धातुएँ: वे तत्व जो इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाते हैं (जैसे Na, Mg, Fe)। ये आवर्त सारणी में बाईं ओर स्थित होते हैं।
  • अधातुएँ: वे तत्व जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन बनाते हैं (जैसे O, Cl)। ये आवर्त सारणी में दाईं ओर स्थित होते हैं।
  • उपधातुएँ (Metalloids): वे तत्व जो धातुओं और अधातुओं दोनों के गुणधर्म प्रदर्शित करते हैं (जैसे B, Si, Ge, As, Sb, Te, Po)। ये आवर्त सारणी में धातुओं और अधातुओं को अलग करने वाली टेढ़ी-मेढ़ी रेखा पर स्थित होते हैं।
  • आवर्त में (बाईं से दाईं ओर):
  • धात्विक गुण घटते हैं और अधात्विक गुण बढ़ते हैं
  • कारण: नाभिकीय आवेश बढ़ने से इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति घटती है और इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
  • समूह में (ऊपर से नीचे की ओर):
  • धात्विक गुण बढ़ते हैं और अधात्विक गुण घटते हैं
  • कारण: परमाणु आकार बढ़ने और नाभिकीय आकर्षण घटने से बाह्यतम इलेक्ट्रॉन को त्यागना आसान हो जाता है।

4. आयनन ऊर्जा/आयनन विभव (Ionisation energy / Ionisation potential)

  • परिभाषा: गैसीय अवस्था में किसी विलगित परमाणु के सबसे दुर्बलता से बंधे इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा।
  • इकाई: इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV)।
  • आवर्त में (बाईं से दाईं ओर):
  • बढ़ती है
  • कारण: परमाणु आकार घटता है और नाभिकीय आवेश बढ़ता है, जिससे बाह्यतम इलेक्ट्रॉनों पर नाभिकीय आकर्षण बढ़ जाता है। इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
  • समूह में (ऊपर से नीचे की ओर):
  • घटती है
  • कारण: परमाणु आकार बढ़ता है और नए कोश जुड़ते हैं, जिससे बाह्यतम इलेक्ट्रॉन नाभिक से दूर हो जाता है। नाभिकीय आकर्षण कम होने से इलेक्ट्रॉन को निकालना आसान हो जाता है।

5. इलेक्ट्रॉन बंधुता (Electron affinity)

  • परिभाषा: गैसीय अवस्था में किसी विलगित परमाणु द्वारा एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने पर मुक्त होने वाली ऊर्जा।
  • आवर्त में (बाईं से दाईं ओर):
  • सामान्यतः बढ़ती है
  • कारण: परमाणु आकार घटता है और नाभिकीय आवेश बढ़ता है, जिससे इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
  • समूह में (ऊपर से नीचे की ओर):
  • सामान्यतः घटती है
  • कारण: परमाणु आकार बढ़ने से आने वाले इलेक्ट्रॉन पर नाभिकीय आकर्षण कम हो जाता है।

6. विद्युत ऋणता (Electronegativity)

  • परिभाषा: किसी यौगिक के अणु में किसी परमाणु द्वारा साझे के इलेक्ट्रॉन युग्म को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रवृत्ति।
  • इकाई: यह एक सापेक्ष संख्या है, इसकी कोई इकाई नहीं होती।
  • आवर्त में (बाईं से दाईं ओर):
  • बढ़ती है
  • कारण: नाभिकीय आवेश बढ़ने और परमाणु आकार घटने से साझे के इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करने की क्षमता बढ़ती है।
  • समूह में (ऊपर से नीचे की ओर):
  • घटती है
  • कारण: परमाणु आकार बढ़ने और नाभिकीय आकर्षण घटने से साझे के इलेक्ट्रॉनों को आकर्षित करने की क्षमता कम हो जाती है।
  • इलेक्ट्रॉन बंधुता और विद्युत ऋणता में अंतर:
  • इलेक्ट्रॉन बंधुता: स्वतंत्र गैसीय परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ने पर मुक्त ऊर्जा।
  • विद्युत ऋणता: सहसंयोजक बंध से जुड़े दो परमाणुओं के बीच साझे के इलेक्ट्रॉन युग्म को आकर्षित करने की प्रवृत्ति।
याद रखें

आवर्त सारणी में गुणों की आवर्तिता को समझने के लिए परमाणु आकार, नाभिकीय आवेश और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हैं।

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