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विद्युत के चुंबकीय प्रभाव
Chhattisgarh · Class 10 · 🔬 Science · Chapter 12

विद्युत के चुंबकीय प्रभाव

चुंबकीय क्षेत्र और बल रेखाएँधारावाही चालक का चुंबकीय क्षेत्रदाहिने हाथ का नियमविद्युत मोटरविद्युत चुंबकीय प्रेरणविद्युत जनित्र

यह अध्याय विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभावों की गहन पड़ताल करता है। छात्र चुंबकीय क्षेत्र और चुंबकीय बल रेखाओं के गुणों को समझते हैं, जिसमें सीधे चालक तार, वृत्ताकार लूप और परिनालिका के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र शामिल हैं। दाहिने हाथ के अंगूठे का नियम, फ्लेमिंग के बाएं और दाहिने हाथ के नियम जैसे महत्वपूर्ण नियमों का अध्ययन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, विद्युत मोटर और विद्युत जनित्र की कार्यप्रणाली और सिद्धांत को विस्तार से समझाया गया है, जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलने और इसके विपरीत की अवधारणाओं को स्पष्ट करता है। यह अध्याय छात्रों को दैनिक जीवन में विद्युत और चुंबकत्व के अनुप्रयोगों को समझने में मदद करता है।

चुंबकीय क्षेत्र और चुंबकीय बल रेखाएँ

विद्युत और चुंबकत्व एक ही घटना के दो पहलू हैं। जब विद्युत आवेश गतिशील होते हैं, तो चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।

चुंबकीय क्षेत्र

  • चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ उसके बल का अनुभव किया जा सकता है, चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है।
  • यह एक सदिश राशि है, जिसकी दिशा वह मानी जाती है जिसके अनुदिश एकांक उत्तरी ध्रुव उस क्षेत्र के भीतर गमन करता है।

चुंबकीय बल रेखाएँ

  • ये वे काल्पनिक रेखाएँ हैं जो चुंबकीय क्षेत्र की दिशा और प्रबलता को दर्शाती हैं।
  • लोहे के बुरादे या चुंबकीय सुई की मदद से इन्हें देखा जा सकता है।

चुंबकीय बल रेखाओं के गुण:

  1. उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक: बाह्य मार्ग में ये चुंबक के उत्तरी ध्रुव (N) से प्रारंभ होकर दक्षिणी ध्रुव (S) पर समाप्त होती हैं।
  2. बंद वक्र: चुंबक के भीतर ये दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर होती हैं, इस प्रकार ये बंद वक्र बनाती हैं।
  3. कभी नहीं काटतीं: दो चुंबकीय बल रेखाएँ एक-दूसरे को कभी नहीं काटती हैं। यदि वे काटतीं, तो कटान बिंदु पर चुंबकीय सुई दो दिशाओं की ओर संकेत करती, जो असंभव है।
  4. प्रबलता का संकेत: जहाँ बल रेखाएँ पास-पास होती हैं (जैसे ध्रुवों पर), वहाँ चुंबकीय क्षेत्र प्रबल होता है। जहाँ ये दूर-दूर होती हैं, वहाँ क्षेत्र दुर्बल होता है।

उदासीन बिंदु (Neutral Point)

  • यह वह बिंदु है जहाँ चुंबक के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र परिमाण में समान और दिशा में विपरीत होते हैं, जिससे परिणामी चुंबकीय क्षेत्र शून्य हो जाता है।
  • इस बिंदु पर चुंबकीय सुई किसी भी दिशा में विक्षेपित नहीं होती।
महत्त्वपूर्ण

दिक्सूचक सुई एक छोटा चुंबक होता है जिसका उत्तरी ध्रुव सदैव भौगोलिक उत्तर दिशा की ओर संकेत करता है।

💡सुझाव

चुंबकीय बल रेखाओं के गुण अक्सर बोर्ड परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। इन्हें अच्छी तरह याद करें।

धारावाही चालक के कारण चुंबकीय क्षेत्र का उत्पादन

ओरस्टेड का अवलोकन

  • 1810 में डेनमार्क के वैज्ञानिक एच.सी. ओरस्टेड ने सर्वप्रथम यह देखा कि जब किसी चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।
  • उन्होंने पाया कि एक धारावाही तार के समीप रखी चुंबकीय सुई में विक्षेप उत्पन्न होता है।

प्रमुख अवलोकन:

  1. धारा प्रवाह पर विक्षेप: जब तार में धारा प्रवाहित होती है, तो चुंबकीय सुई विक्षेपित होती है, जो चुंबकीय क्षेत्र की उपस्थिति दर्शाती है।
  2. धारा की प्रबलता: तार में धारा बढ़ाने पर विक्षेप बढ़ जाता है, जिसका अर्थ है कि चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता धारा के समानुपाती होती है।
  3. धारा की दिशा: धारा की दिशा बदलने पर विक्षेप की दिशा भी बदल जाती है, जिससे पता चलता है कि चुंबकीय क्षेत्र की दिशा धारा की दिशा पर निर्भर करती है।
  4. धारा बंद करने पर: धारा बंद करने पर विक्षेप शून्य हो जाता है, जिसका अर्थ है कि चुंबकीय क्षेत्र केवल धारा प्रवाह के दौरान ही मौजूद रहता है।

यह अवलोकन विद्युत और चुंबकत्व के बीच संबंध का आधार बना।

महत्त्वपूर्ण

ओरस्टेड का प्रयोग विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव का पहला प्रायोगिक प्रमाण था।

सीधे धारावाही चालक का चुंबकीय क्षेत्र

जब किसी सीधे चालक तार से विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उसके चारों ओर संकेन्द्री वृत्ताकार चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्पन्न होती हैं।

चुंबकीय क्षेत्र की आकृति

  • संकेन्द्री वृत्त: लोहे के बुरादे या चुंबकीय सुई के प्रयोग से देखा जा सकता है कि चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ तार के चारों ओर संकेन्द्री वृत्तों के रूप में होती हैं।
  • दूरी पर निर्भरता: तार से दूर जाने पर ये वृत्त बड़े होते जाते हैं और क्षेत्र की प्रबलता कम होती जाती है।

चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता

  • धारा के समानुपाती: चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता (B) तार में प्रवाहित विद्युत धारा (I) के समानुपाती होती है। \(B \propto I\)
  • दूरी के व्युत्क्रमानुपाती: चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता तार से दूरी (r) के व्युत्क्रमानुपाती होती है। \(B \propto \frac{1}{r}\)

निष्कर्ष:

  • तार के जितना करीब होंगे, चुंबकीय क्षेत्र उतना ही प्रबल होगा।
  • धारा का जितना अधिक परिमाण होगा, चुंबकीय क्षेत्र उतना ही प्रबल होगा।
याद रखें

सीधे तार के लिए चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ संकेन्द्री वृत्त होती हैं।

दाहिने हाथ का अंगूठा नियम (मैक्सवेल का कॉर्कस्क्रू नियम)

यह नियम सीधे धारावाही चालक तार के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात करने के लिए उपयोग किया जाता है।

नियम का कथन

  • कल्पना कीजिए कि आप अपने दाहिने हाथ में धारावाही चालक तार को इस प्रकार पकड़े हुए हैं कि आपका अंगूठा विद्युत धारा की दिशा में है।
  • तब आपकी मुड़ी हुई उँगलियाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं की दिशा को प्रदर्शित करेंगी।

अनुप्रयोग:

  • यदि धारा ऊपर की ओर बह रही है, तो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ वामावर्त दिशा में होंगी।
  • यदि धारा नीचे की ओर बह रही है, तो चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ दक्षिणावर्त दिशा में होंगी।

यह नियम चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को आसानी से निर्धारित करने में मदद करता है।

💡सुझाव

दाहिने हाथ का अंगूठा नियम अक्सर एक या दो अंक के प्रश्न के रूप में पूछा जाता है। इसकी परिभाषा और चित्र का अभ्यास करें।

वृत्तीय धारावाही चालक का चुंबकीय क्षेत्र

जब किसी तार को मोड़कर एक वृत्ताकार लूप बनाया जाता है और उसमें विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो भी चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।

चुंबकीय क्षेत्र की आकृति

  • लूप के चारों ओर: लूप के प्रत्येक छोटे खंड को एक सीधे चालक तार की तरह माना जा सकता है। अतः, लूप के चारों ओर संकेन्द्री वृत्ताकार चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्पन्न होती हैं।
  • केंद्र पर: जैसे-जैसे हम लूप के केंद्र की ओर बढ़ते हैं, वृत्त बड़े होते जाते हैं और केंद्र पर ये रेखाएँ लगभग सीधी प्रतीत होती हैं।
  • एक ही दिशा: लूप के केंद्र पर सभी चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ एक ही दिशा में होती हैं, जिससे केंद्र पर एक प्रबल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।

चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता

  • धारा के समानुपाती: लूप में प्रवाहित धारा (I) के समानुपाती।
  • फेरों की संख्या के समानुपाती: यदि कुंडली में 'n' फेरे हैं, तो चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता 'n' गुना बढ़ जाती है। \(B \propto n\)
  • त्रिज्या के व्युत्क्रमानुपाती: लूप की त्रिज्या (r) के व्युत्क्रमानुपाती। \(B \propto \frac{1}{r}\)

दिशा निर्धारण

  • दाहिने हाथ के अंगूठे के नियम का उपयोग करके लूप के प्रत्येक खंड के लिए चुंबकीय क्षेत्र की दिशा ज्ञात की जा सकती है।
  • लूप के केंद्र पर, सभी खंडों के कारण उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र की दिशा एक ही होती है
महत्त्वपूर्ण

वृत्ताकार लूप का प्रत्येक फेरा चुंबकीय क्षेत्र में योगदान करता है, जिससे कुल क्षेत्र बढ़ जाता है

परिनालिका और उसका चुंबकीय क्षेत्र

परिनालिका (Solenoid)

  • एक विद्युतरोधी तांबे के तार की अनेक फेरों वाली बेलनाकार कुंडली को परिनालिका कहते हैं।

परिनालिका का चुंबकीय क्षेत्र

  • जब परिनालिका में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह एक छड़ चुंबक की तरह व्यवहार करती है।
  • क्षेत्र रेखाएँ: इसके भीतर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ समांतर और सीधी होती हैं, जो दर्शाती हैं कि भीतर चुंबकीय क्षेत्र एकसमान और प्रबल होता है।
  • ध्रुव: परिनालिका का एक सिरा उत्तरी ध्रुव (N) और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव (S) की तरह व्यवहार करता है।
  • जिस सिरे पर धारा दक्षिणावर्त (clockwise) होती है, वह दक्षिणी ध्रुव (S) होता है।
  • जिस सिरे पर धारा वामावर्त (anti-clockwise) होती है, वह उत्तरी ध्रुव (N) होता है।

विद्युत चुंबक (Electromagnet)

  • जब एक परिनालिका के भीतर नरम लोहे का क्रोड रखा जाता है और उसमें धारा प्रवाहित की जाती है, तो यह एक विद्युत चुंबक बन जाता है।
  • विद्युत चुंबक की प्रबलता को धारा के परिमाण, फेरों की संख्या और क्रोड के पदार्थ को बदलकर नियंत्रित किया जा सकता है।
  • यह अस्थायी चुंबक होता है, जो धारा बंद करने पर अपना चुंबकत्व खो देता है।

परिनालिका के चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित करने वाले कारक:

  1. धारा की प्रबलता: धारा बढ़ाने पर चुंबकीय क्षेत्र प्रबल होता है।
  2. फेरों की संख्या: फेरों की संख्या बढ़ाने पर चुंबकीय क्षेत्र प्रबल होता है।
  3. क्रोड का पदार्थ: नरम लोहे का क्रोड रखने पर चुंबकीय क्षेत्र कई गुना बढ़ जाता है।
📖परिभाषा

परिनालिका: विद्युतरोधी तांबे के तार की अनेक फेरों वाली बेलनाकार कुंडली।

महत्त्वपूर्ण

परिनालिका के भीतर चुंबकीय क्षेत्र एकसमान होता है, जो छड़ चुंबक के भीतर के क्षेत्र के समान है।

चुंबकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर बल

जब किसी धारावाही चालक को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो चालक पर एक बल आरोपित होता है। यह बल चालक को गति प्रदान कर सकता है।

बल की दिशा और परिमाण

  • दिशा: बल की दिशा विद्युत धारा की दिशा और चुंबकीय क्षेत्र की दिशा दोनों पर निर्भर करती है। इसे फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम से ज्ञात किया जाता है।
  • परिमाण: बल का परिमाण निम्न कारकों पर निर्भर करता है:
  1. धारा की प्रबलता (I): धारा बढ़ाने पर बल बढ़ता है।
  2. चुंबकीय क्षेत्र की प्रबलता (B): प्रबल चुंबकीय क्षेत्र में बल अधिक होता है।
  3. चालक की लंबाई (L): चुंबकीय क्षेत्र में चालक की लंबाई बढ़ाने पर बल बढ़ता है।
  4. कोण (θ): बल अधिकतम होता है जब धारा की दिशा चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत होती है (\(\theta = 90^\circ\))। जब ये समांतर होते हैं (\(\theta = 0^\circ\)), तो बल शून्य होता है।

क्रियाकलाप का अवलोकन

  • एक एल्युमिनियम की छड़ को नाल चुंबक के ध्रुवों के बीच लटकाने पर, जब उसमें धारा प्रवाहित की जाती है, तो छड़ विस्थापित होती है।
  • धारा की दिशा बदलने पर विस्थापन की दिशा बदल जाती है।
  • चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बदलने पर भी विस्थापन की दिशा बदल जाती है।

यह घटना विद्युत मोटर के कार्य करने का आधार है।

महत्त्वपूर्ण

यह बल विद्युत मोटर के कार्य करने का मूल सिद्धांत है।

फ्लेमिंग का बायें हाथ का नियम

यह नियम चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल की दिशा ज्ञात करने के लिए उपयोग किया जाता है।

नियम का कथन

  • अपने बायें हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अंगूठा को इस प्रकार फैलाइए कि ये तीनों एक-दूसरे के परस्पर लंबवत हों।
  • यदि:
  • तर्जनीचुंबकीय क्षेत्र की दिशा (B)
  • मध्यमाविद्युत धारा की दिशा (I)
  • तो अंगूठाचालक पर लगने वाले बल की दिशा (F) को प्रदर्शित करेगा।

याद रखने का तरीका (FBI):

  • F (अंगूठा) → Force (बल)
  • B (तर्जनी) → B-field (चुंबकीय क्षेत्र)
  • I (मध्यमा) → I-current (धारा)

यह नियम विद्युत मोटर, गैल्वेनोमीटर आदि में बल की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है।

💡सुझाव

फ्लेमिंग के बायें हाथ का नियम विद्युत मोटर के सिद्धांत को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इसे चित्र सहित याद करें।

विद्युत मोटर: सिद्धांत और कार्यविधि

सिद्धांत

  • विद्युत मोटर चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर लगने वाले बल के सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • जब एक आयताकार कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है और उसमें धारा प्रवाहित की जाती है, तो कुंडली पर एक बल युग्म कार्य करता है जो उसे लगातार घुमाता है।
  • यह विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

संरचना

  1. आर्मेचर कुंडली (ABCD): विद्युतरोधी तांबे के तार की एक आयताकार कुंडली, जिसे प्रबल चुंबकीय ध्रुवों के बीच रखा जाता है।
  2. क्षेत्र चुंबक: प्रबल नाल चुंबक जो चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है।
  3. विभक्त वलय (Split Ring Commutator) (X, Y): ये दो अर्ध-वलय होते हैं जो कुंडली के सिरों से जुड़े होते हैं। ये दिक्परिवर्तक का कार्य करते हैं, अर्थात परिपथ में धारा की दिशा को उत्क्रमित करते हैं।
  4. कार्बन ब्रश (P, Q): ये स्थिर चालक होते हैं जो विभक्त वलय को स्पर्श करते हैं और बाह्य परिपथ से धारा कुंडली तक पहुँचाते हैं।
  5. धुरी: कुंडली से जुड़ी होती है और उसके घूमने पर घूमती है।
  6. क्रोड: नरम लोहे का टुकड़ा जिस पर कुंडली लपेटी जाती है (आर्मेचर)। क्रोड और कुंडली मिलकर आर्मेचर कहलाते हैं, जो मोटर की शक्ति बढ़ाता है।

कार्यविधि

  1. बैटरी से धारा ब्रश Q से कुंडली ABCD में प्रवेश करती है।
  2. भुजा AB में धारा A से B की ओर और भुजा CD में धारा C से D की ओर बहती है।
  3. फ्लेमिंग के बायें हाथ के नियम के अनुसार:
  • भुजा AB पर नीचे की ओर बल लगता है।
  • भुजा CD पर ऊपर की ओर बल लगता है।
  1. ये बल एक बल युग्म बनाते हैं, जिससे कुंडली वामावर्त दिशा में घूर्णन करती है।
  2. आधे घूर्णन के बाद: विभक्त वलय के अर्धभागों (X और Y) का संपर्क ब्रशों से बदल जाता है।
  • ब्रश P का संपर्क Y से और ब्रश Q का संपर्क X से हो जाता है।
  • इससे कुंडली में धारा की दिशा उत्क्रमित (DCBA) हो जाती है।
  1. धारा की दिशा बदलने से भुजाओं पर लगने वाले बल की दिशा भी बदल जाती है, जिससे कुंडली का घूर्णन निरंतर एक ही दिशा में होता रहता है।

उपयोग

  • विद्युत पंखे, रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन, कंप्यूटर, मिक्सर आदि में।
📖परिभाषा

दिक्परिवर्तक (Commutator): वह युक्ति जो विद्युत मोटर में कुंडली में प्रवाहित धारा की दिशा को उत्क्रमित करती है, जिससे कुंडली का घूर्णन निरंतर एक ही दिशा में होता रहे।

महत्त्वपूर्ण

व्यावसायिक मोटरों में स्थायी चुंबक के स्थान पर विद्युत चुंबक और अधिक फेरों वाली कुंडली का उपयोग किया जाता है, जिससे मोटर की शक्ति बढ़ जाती है।

विद्युत चुंबकीय प्रेरण

माइकल फैराडे का अवलोकन

  • माइकल फैराडे ने 1831 में देखा कि जब किसी चालक को चुंबकीय क्षेत्र में इस प्रकार गति कराया जाता है कि चालक से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन हो, तो चालक में विद्युत धारा प्रेरित होती है। इस घटना को विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहते हैं।

प्रेरण की शर्तें

  • प्रेरित धारा तभी उत्पन्न होती है जब चुंबक और कुंडली के बीच सापेक्ष गति हो।
  • गतिमान चुंबक: जब चुंबक को कुंडली की ओर या उससे दूर ले जाया जाता है, तो धारामापी में विक्षेप होता है।
  • स्थिर चुंबक: जब चुंबक कुंडली के भीतर स्थिर रखा जाता है, तो कोई विक्षेप नहीं होता।
  • गति की दिशा: चुंबक की गति की दिशा बदलने पर प्रेरित धारा की दिशा भी बदल जाती है।
  • ध्रुव की दिशा: चुंबक के ध्रुव (उत्तरी या दक्षिणी) बदलने पर भी प्रेरित धारा की दिशा बदल जाती है।

प्रेरित धारा (Induced Current)

  • प्रेरित धारा वह विद्युत धारा है जो चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होती है।
  • इसकी दिशा फ्लेमिंग के दाहिने हाथ के नियम से ज्ञात की जाती है।

अनुप्रयोग

  • विद्युत जनित्र (डायनेमो) इसी सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • ट्रांसफार्मर भी विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत का उपयोग करते हैं।
📖परिभाषा

विद्युत चुंबकीय प्रेरण: वह घटना जिसमें किसी चालक में चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन के कारण विद्युत धारा प्रेरित होती है।

महत्त्वपूर्ण

माइकल फैराडे को विद्युत चुंबकीय प्रेरण के नियमों के लिए जाना जाता है।

फ्लेमिंग का दाहिने हाथ का नियम

यह नियम चुंबकीय क्षेत्र में चालक की गति के कारण प्रेरित विद्युत धारा की दिशा ज्ञात करने के लिए उपयोग किया जाता है।

नियम का कथन

  • अपने दाहिने हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अंगूठा को इस प्रकार फैलाइए कि ये तीनों एक-दूसरे के परस्पर लंबवत हों।
  • यदि:
  • अंगूठाचालक की गति की दिशा (Motion)
  • तर्जनीचुंबकीय क्षेत्र की दिशा (B)
  • तो मध्यमाप्रेरित विद्युत धारा की दिशा (I) को प्रदर्शित करेगी।

याद रखने का तरीका (FBI):

  • F (अंगूठा) → Force/Motion (गति)
  • B (तर्जनी) → B-field (चुंबकीय क्षेत्र)
  • I (मध्यमा) → I-current (प्रेरित धारा)

यह नियम विद्युत जनित्र के सिद्धांत को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

💡सुझाव

फ्लेमिंग के बायें और दाहिने हाथ के नियमों में अंतर को स्पष्ट रूप से समझें। बायाँ हाथ बल की दिशा के लिए, दायाँ हाथ प्रेरित धारा की दिशा के लिए।

विद्युत जनित्र: सिद्धांत और कार्यविधि

सिद्धांत

  • विद्युत जनित्र (डायनेमो) विद्युत चुंबकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • जब एक कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो कुंडली से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, जिससे उसमें प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
  • यह यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

संरचना

  1. आर्मेचर कुंडली (ABCD): विद्युतरोधी तांबे के तार की एक आयताकार कुंडली, जिसे प्रबल चुंबकीय ध्रुवों के बीच रखा जाता है।
  2. क्षेत्र चुंबक: प्रबल नाल चुंबक जो चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है।
  3. सर्पी वलय (Slip Rings) (R1, R2) (प्रत्यावर्ती धारा जनित्र में): ये दो पूर्ण वलय होते हैं जो कुंडली के सिरों से जुड़े होते हैं और कुंडली के साथ घूमते हैं।
  4. विभक्त वलय (Split Rings) (दिष्ट धारा जनित्र में): ये दो अर्ध-वलय होते हैं जो कुंडली के सिरों से जुड़े होते हैं और दिक्परिवर्तक का कार्य करते हैं।
  5. कार्बन ब्रश (B1, B2): ये स्थिर चालक होते हैं जो सर्पी वलय/विभक्त वलय को स्पर्श करते हैं और प्रेरित धारा को बाह्य परिपथ तक पहुँचाते हैं।
  6. धुरी: कुंडली से जुड़ी होती है और उसे घुमाने के लिए उपयोग की जाती है।

कार्यविधि

  1. जब आर्मेचर कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है (उदाहरण के लिए, भुजा AB ऊपर और CD नीचे की ओर गति करती है)।
  2. कुंडली से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या में परिवर्तन होता है।
  3. फ्लेमिंग के दाहिने हाथ के नियम के अनुसार, भुजा AB और CD में प्रेरित विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
  4. यह प्रेरित धारा ब्रशों (B1, B2) के माध्यम से बाह्य परिपथ में प्रवाहित होती है।

दिष्ट धारा (DC) जनित्र

  • इसमें विभक्त वलय (split rings) का उपयोग दिक्परिवर्तक के रूप में किया जाता है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि बाह्य परिपथ में धारा हमेशा एक ही दिशा में बहती है।

प्रत्यावर्ती धारा (AC) जनित्र

  • इसमें सर्पी वलय (slip rings) का उपयोग किया जाता है।
  • प्रत्येक अर्ध-घूर्णन के बाद कुंडली में प्रेरित धारा की दिशा बदल जाती है, जिससे बाह्य परिपथ में धारा की दिशा भी बदल जाती है।
  • ऐसी धारा जो समान समय अंतराल के बाद अपनी दिशा बदलती है, प्रत्यावर्ती धारा (AC) कहलाती है।

उपयोग

  • बिजली उत्पादन संयंत्रों (थर्मल, हाइड्रो, न्यूक्लियर) में विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए।
📖परिभाषा

प्रत्यावर्ती धारा (AC): वह विद्युत धारा जो समान समय अंतराल के बाद अपनी दिशा में बदलाव करती है।

महत्त्वपूर्ण

भारत में घरों में उपयोग होने वाली विद्युत धारा प्रत्यावर्ती धारा (AC) है, जिसकी आवृत्ति 50 Hz होती है।

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