अपवर्तन गोलीय सतह से
यह अध्याय गोलीय दर्पणों और लेंसों द्वारा प्रकाश के अपवर्तन और परावर्तन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का परिचय देता है। छात्र गोलीय दर्पणों के प्रकार (अवतल और उत्तल), उनसे संबंधित प्रमुख परिभाषाएँ (ध्रुव, वक्रता केंद्र, फोकस, वक्रता त्रिज्या, द्वारक), प्रतिबिंब निर्माण के नियम और नई कार्तीय चिह्न परिपाटी के बारे में सीखते हैं। इसमें दर्पण सूत्र और आवर्धन की अवधारणा भी शामिल है। लेंसों के संदर्भ में, अध्याय लेंसों के प्रकार (उत्तल और अवतल), उनसे संबंधित परिभाषाएँ, प्रतिबिंब निर्माण के नियम, लेंस सूत्र, आवर्धन और लेंस की क्षमता पर विस्तार से चर्चा करता है। यह अध्याय फोटोग्राफिक कैमरा, सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी जैसे विभिन्न प्रकाशिक यंत्रों में लेंसों के उपयोग को भी समझाता है, जो छात्रों को प्रकाशिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोगों को समझने में मदद करता है।
गोलीय दर्पण का परिचय और प्रकार
गोलीय दर्पण वे दर्पण होते हैं जिनकी परावर्तक सतह किसी खोखले गोले का एक भाग होती है। ये दो प्रकार के होते हैं:
- अवतल दर्पण (Concave Mirror):
- भीतरी सतह परावर्तक होती है।
- बाहरी सतह पॉलिश की हुई होती है।
- प्रकाश किरणों को एक बिंदु पर अभिसरित (converge) करता है, इसलिए इसे अभिसारी दर्पण (Converging Mirror) भी कहते हैं।
- उत्तल दर्पण (Convex Mirror):
- बाहरी सतह परावर्तक होती है।
- भीतरी सतह पॉलिश की हुई होती है।
- प्रकाश किरणों को फैलाता (diverge) है, इसलिए इसे अपसारी दर्पण (Diverging Mirror) भी कहते हैं।
याद रखें: समतल दर्पण के विपरीत, गोलीय दर्पणों में प्रतिबिंब की प्रकृति, स्थिति और आकार वस्तु की स्थिति पर निर्भर करते हैं।
चमकदार करछुल का भीतरी पृष्ठ अवतल दर्पण की तरह और बाहरी पृष्ठ उत्तल दर्पण की तरह कार्य करता है।
गोलीय दर्पण से संबंधित मुख्य पद
गोलीय दर्पणों के अध्ययन के लिए कुछ महत्वपूर्ण पद:
- ध्रुव (Pole, P):
- गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ का केंद्र बिंदु।
- यह दर्पण की सतह पर स्थित होता है।
- वक्रता केंद्र (Centre of Curvature, C):
- गोलीय दर्पण जिस खोखले गोले का भाग होता है, उस गोले का केंद्र।
- यह दर्पण का भाग नहीं होता, बल्कि दर्पण के बाहर स्थित होता है।
- अवतल दर्पण के लिए यह दर्पण के सामने होता है, जबकि उत्तल दर्पण के लिए यह दर्पण के पीछे होता है।
- वक्रता त्रिज्या (Radius of Curvature, R):
- गोलीय दर्पण जिस खोखले गोले का भाग होता है, उस गोले की त्रिज्या।
- यह ध्रुव (P) और वक्रता केंद्र (C) के बीच की दूरी होती है।
- मुख्य अक्ष (Principal Axis):
- ध्रुव (P) और वक्रता केंद्र (C) से होकर गुजरने वाली सीधी काल्पनिक रेखा।
- यह ध्रुव पर दर्पण के पृष्ठ के अभिलंब (normal) होती है।
- मुख्य फोकस (Principal Focus, F):
- मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली प्रकाश किरणें परावर्तन के पश्चात् अवतल दर्पण में जिस बिंदु पर वास्तव में मिलती हैं, या उत्तल दर्पण में जिस बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं, वह बिंदु मुख्य फोकस कहलाता है।
- यह ध्रुव (P) और वक्रता केंद्र (C) के ठीक मध्य में स्थित होता है।
वास्तविक प्रतिबिंब को पर्दे पर प्राप्त किया जा सकता है, जबकि आभासी प्रतिबिंब को नहीं।
गोलीय दर्पण की फोकस दूरी और द्वारक
- फोकस दूरी (Focal Length, f):
- गोलीय दर्पण के ध्रुव (P) और मुख्य फोकस (F) के बीच की दूरी।
- इसे 'f' से दर्शाया जाता है।
- द्वारक (Aperture):
- गोलीय दर्पण के परावर्तक पृष्ठ की वृत्ताकार सीमा रेखा का प्रभावी व्यास।
- यह दर्पण के आकार को दर्शाता है।
- फोकस दूरी (f) और वक्रता त्रिज्या (R) में संबंध:
- छोटे द्वारक वाले गोलीय दर्पणों के लिए, फोकस दूरी वक्रता त्रिज्या की आधी होती है।
- सूत्र: \(f = R/2\) या \(R = 2f\)
- इसका अर्थ है कि मुख्य फोकस (F) ध्रुव (P) और वक्रता केंद्र (C) के ठीक मध्य में स्थित होता है।
- परावर्तन के नियम:
- परावर्तन के नियम (आपतन कोण = परावर्तन कोण) समतल सतहों के साथ-साथ सभी प्रकार की वक्रीय सतहों पर भी लागू होते हैं।
- वक्रीय सतह पर अभिलंब हमेशा वक्रता केंद्र (C) से उस बिंदु तक खींची गई रेखा होती है जहाँ प्रकाश किरण आपतित होती है।
गोलीय दर्पण के लिए: \(f = R/2\)
गोलीय दर्पणों के लिए चिह्न परिपाटी
प्रतिबिंब निर्माण और आंकिक प्रश्नों को हल करने के लिए नई कार्तीय चिह्न परिपाटी का उपयोग किया जाता है।
- मूल बिंदु: दर्पण का ध्रुव (P) मूल बिंदु माना जाता है।
- X-अक्ष: दर्पण का मुख्य अक्ष X-अक्ष के रूप में लिया जाता है।
- वस्तु की स्थिति: वस्तु हमेशा दर्पण के बाईं ओर रखी जाती है। इसका अर्थ है कि प्रकाश किरणें हमेशा बाईं ओर से दाईं ओर आपतित होती हैं।
- दूरियों का मापन: सभी दूरियाँ ध्रुव (P) से मापी जाती हैं।
- धनात्मक दूरियाँ: ध्रुव के दाईं ओर (+X अक्ष के अनुदिश) मापी गई दूरियाँ।
- ऋणात्मक दूरियाँ: ध्रुव के बाईं ओर (-X अक्ष के अनुदिश) मापी गई दूरियाँ।
- ऊँचाई का मापन:
- मुख्य अक्ष के लंबवत तथा ऊपर की ओर (+Y अक्ष के अनुदिश) मापी गई ऊँचाइयाँ धनात्मक।
- मुख्य अक्ष के लंबवत तथा नीचे की ओर (-Y अक्ष के अनुदिश) मापी गई ऊँचाइयाँ ऋणात्मक।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- अवतल दर्पण: फोकस दूरी (f) और वक्रता त्रिज्या (R) ऋणात्मक होती हैं।
- उत्तल दर्पण: फोकस दूरी (f) और वक्रता त्रिज्या (R) धनात्मक होती हैं।
- वस्तु दूरी (u): हमेशा ऋणात्मक (क्योंकि वस्तु हमेशा बाईं ओर होती है)।
- वास्तविक प्रतिबिंब (v): ऋणात्मक (दर्पण के सामने)।
- आभासी प्रतिबिंब (v): धनात्मक (दर्पण के पीछे)।
आंकिक प्रश्नों में चिह्न परिपाटी का सही उपयोग करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक भी गलत चिह्न उत्तर को गलत कर सकता है।
गोलीय दर्पण से प्रतिबिंब रचना के नियम
किरण आरेख बनाने और प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार निर्धारित करने के लिए चार मुख्य नियम हैं:
- मुख्य अक्ष के समांतर किरण:
- अवतल दर्पण में: परावर्तन के पश्चात् मुख्य फोकस (F) से होकर गुजरती है।
- उत्तल दर्पण में: परावर्तन के पश्चात् मुख्य फोकस (F) से आती हुई प्रतीत होती है।
- मुख्य फोकस (F) से होकर गुजरने वाली/की ओर निर्देशित किरण:
- अवतल दर्पण में: परावर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है।
- उत्तल दर्पण में: मुख्य फोकस (F) की ओर निर्देशित किरण परावर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है।
- वक्रता केंद्र (C) से होकर गुजरने वाली/की ओर निर्देशित किरण:
- अवतल दर्पण में: परावर्तन के पश्चात् उसी मार्ग पर वापस लौट आती है।
- उत्तल दर्पण में: वक्रता केंद्र (C) की ओर निर्देशित किरण परावर्तन के पश्चात् उसी मार्ग पर वापस लौट आती है। (क्योंकि यह दर्पण की सतह पर अभिलंबवत आपतित होती है)
- ध्रुव (P) पर आपतित किरण:
- ध्रुव (P) पर आपतित किरण मुख्य अक्ष के साथ समान कोण बनाते हुए परावर्तित होती है। (परावर्तन के नियम का पालन करती है, जहाँ मुख्य अक्ष अभिलंब का कार्य करता है)।
नोट: प्रतिबिंब बनाने के लिए इनमें से कम से कम दो किरणों का उपयोग किया जाता है।
अवतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब रचना (क्रियाकलाप)
क्रियाकलाप-4 में अवतल दर्पण का उपयोग करके मोमबत्ती के प्रतिबिंब का अवलोकन किया गया। यह दर्शाता है कि वस्तु की स्थिति बदलने पर प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार कैसे बदलते हैं।
- उद्देश्य: अवतल दर्पण द्वारा विभिन्न स्थितियों में बनने वाले प्रतिबिंबों की विशेषताओं का प्रायोगिक अध्ययन करना।
- विधि:
- अवतल दर्पण को V-स्टैंड पर रखें।
- मीटर स्केल और मोमबत्ती को दर्पण के सामने विभिन्न दूरियों पर रखें।
- कागज के पर्दे को आगे-पीछे खिसकाकर मोमबत्ती की लौ का तीक्ष्ण प्रतिबिंब प्राप्त करें।
- प्रत्येक स्थिति के लिए प्रतिबिंब की दूरी (v), आकार, प्रकृति (सीधा/उल्टा) और प्रकार (वास्तविक/आभासी) को सारणीबद्ध करें।
- अवलोकन:
- वास्तविक प्रतिबिंब हमेशा उल्टा बनता है और इसे पर्दे पर प्राप्त किया जा सकता है।
- आभासी प्रतिबिंब हमेशा सीधा बनता है और इसे पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता, केवल दर्पण में देखा जा सकता है।
- वस्तु की स्थिति के अनुसार प्रतिबिंब का आकार बड़ा, छोटा या समान हो सकता है।
- निष्कर्ष: गोलीय दर्पण द्वारा बनने वाले प्रतिबिंब की विशेषताएँ वस्तु की दर्पण के सापेक्ष स्थिति पर निर्भर करती हैं।
वास्तविक प्रतिबिंब को देखने के लिए आँखें ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ प्रतिबिंब से प्रकाश किरणें आँखों में पड़ें, जबकि आभासी प्रतिबिंब को सीधे दर्पण में देखा जा सकता है।
अवतल दर्पण द्वारा विभिन्न स्थितियों में प्रतिबिंब
अवतल दर्पण द्वारा वस्तु की विभिन्न स्थितियों के लिए प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार का सारांश:
| क्र.सं. | वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---|---| | 1. | अनंत पर | फोकस (F) पर | अत्यधिक छोटा, बिंदु आकार का | वास्तविक तथा उल्टा | | 2. | C से परे | F तथा C के बीच | छोटा | वास्तविक तथा उल्टा | | 3. | C पर | C पर | समान आकार का | वास्तविक तथा उल्टा | | 4. | C तथा F के बीच | C से परे | बड़ा | वास्तविक तथा उल्टा | | 5. | F पर | अनंत पर | अत्यधिक बड़ा | वास्तविक तथा उल्टा | | 6. | ध्रुव (P) तथा F के बीच | दर्पण के पीछे | बड़ा | आभासी तथा सीधा |
उत्तल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब रचना: उत्तल दर्पण हमेशा वस्तु का आभासी, सीधा और छोटा प्रतिबिंब बनाता है, चाहे वस्तु कहीं भी रखी हो।
| क्र.सं. | वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---|---| | 1. | अनंत पर | फोकस (F) पर (दर्पण के पीछे) | अत्यधिक छोटा, बिंदु आकार का | आभासी तथा सीधा | | 2. | अनंत तथा ध्रुव (P) के बीच कहीं भी | P तथा F के बीच (दर्पण के पीछे) | छोटा | आभासी तथा सीधा |
मुख्य अवलोकन:
- वास्तविक प्रतिबिंब सदैव उल्टा होता है।
- आभासी प्रतिबिंब सदैव सीधा होता है।
छात्र अक्सर वास्तविक और आभासी प्रतिबिंबों की प्रकृति (उल्टा/सीधा) को लेकर भ्रमित होते हैं। याद रखें: वास्तविक हमेशा उल्टा, आभासी हमेशा सीधा।
गोलीय दर्पण से संबंधित राशियाँ
गोलीय दर्पण से संबंधित राशियों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- अचर राशियाँ (Constant Quantities): ये राशियाँ एक दिए गए दर्पण के लिए निश्चित होती हैं।
- दर्पण की फोकस दूरी (f)
- दर्पण की वक्रता त्रिज्या (R)
- वस्तु की लंबाई (h) (यदि वस्तु का आकार निश्चित हो)
- चर राशियाँ (Variable Quantities): ये राशियाँ वस्तु की स्थिति बदलने पर बदलती रहती हैं।
- वस्तु की दर्पण से दूरी (u)
- प्रतिबिंब की दर्पण से दूरी (v)
- प्रतिबिंब की लंबाई (I)
- दर्पण की आवर्धन क्षमता (m)
इन राशियों के बीच संबंध को समझने के लिए दर्पण सूत्र और आवर्धन सूत्र का उपयोग किया जाता है।
फोकस दूरी और वक्रता त्रिज्या में संबंध
गोलीय दर्पण की फोकस दूरी (f) और वक्रता त्रिज्या (R) के बीच संबंध को गणितीय रूप से स्थापित किया जा सकता है।
व्युत्पत्ति (Derivation):
- एक अवतल दर्पण लें जिसका ध्रुव P, मुख्य फोकस F और वक्रता केंद्र C है।
- मुख्य अक्ष CP के समांतर एक प्रकाश किरण AB दर्पण पर बिंदु B पर आपतित होती है।
- परावर्तन के नियम के अनुसार, यह किरण परावर्तन के पश्चात् मुख्य फोकस F से होकर गुजरती है।
- वक्रता केंद्र C से बिंदु B को मिलाने वाली रेखा CB, दर्पण की सतह पर अभिलंब होती है।
- परावर्तन के नियम से, आपतन कोण \(\angle ABC\) = परावर्तन कोण \(\angle CBF\) (समीकरण 1)
- चूंकि किरण AB मुख्य अक्ष CP के समांतर है, इसलिए \(\angle ABC\) = \(\angle BCF\) (एकांतर कोण) (समीकरण 2)
- समीकरण 1 और 2 से, \(\angle CBF\) = \(\angle BCF\) ।
- त्रिभुज CBF में, यदि दो कोण बराबर हैं, तो उनकी सम्मुख भुजाएँ भी बराबर होंगी। अतः, CF = BF (समीकरण 3)
- यदि बिंदु B ध्रुव P के बहुत करीब है (छोटे द्वारक के दर्पण के लिए), तो BF लगभग PF के बराबर होगा। अतः, BF \(\approx\) PF (समीकरण 4)
- समीकरण 3 और 4 से, CF = PF।
- हम जानते हैं कि PC = PF + CF।
- CF को PF से प्रतिस्थापित करने पर, PC = PF + PF = 2PF।
- अतः, PF = PC/2।
- चूंकि PF फोकस दूरी (f) है और PC वक्रता त्रिज्या (R) है, इसलिए \(f = R/2\) ।
यह संबंध अवतल और उत्तल दोनों प्रकार के गोलीय दर्पणों के लिए सत्य है, बशर्ते दर्पण का द्वारक छोटा हो।
यह व्युत्पत्ति बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछी जाती है। इसके चरणों को ध्यान से समझें।
दर्पण सूत्र और चिह्न परिपाटी का अनुप्रयोग
दर्पण सूत्र गोलीय दर्पण के लिए वस्तु की दूरी (u), प्रतिबिंब की दूरी (v) और फोकस दूरी (f) के बीच संबंध स्थापित करता है।
- दर्पण सूत्र: \(\frac{1}{v} + \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\)
- यह सूत्र सभी प्रकार के गोलीय दर्पणों (अवतल और उत्तल) और वस्तु की सभी स्थितियों के लिए मान्य है।
- आंकिक प्रश्नों को हल करते समय नई कार्तीय चिह्न परिपाटी का सही-सही उपयोग करना अनिवार्य है।
- चिह्न परिपाटी का अनुप्रयोग (संक्षेप में):
- वस्तु दूरी (u): हमेशा ऋणात्मक (वस्तु हमेशा बाईं ओर)।
- अवतल दर्पण: फोकस दूरी (f) ऋणात्मक।
- उत्तल दर्पण: फोकस दूरी (f) धनात्मक।
- वास्तविक प्रतिबिंब (v): ऋणात्मक (दर्पण के सामने)।
- आभासी प्रतिबिंब (v): धनात्मक (दर्पण के पीछे)।
उदाहरण: यदि अवतल दर्पण की फोकस दूरी 15 cm है, तो f = -15 cm। यदि उत्तल दर्पण की फोकस दूरी 15 cm है, तो f = +15 cm।
दर्पण सूत्र: \(\frac{1}{v} + \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\)
दर्पण सूत्र और चिह्न परिपाटी पर आधारित आंकिक प्रश्न बोर्ड परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं। अभ्यास बहुत महत्वपूर्ण है।
गोलीय दर्पण द्वारा आवर्धन
आवर्धन (Magnification, m) यह बताता है कि प्रतिबिंब वस्तु की तुलना में कितना गुना बड़ा या छोटा है।
- परिभाषा: प्रतिबिंब की ऊँचाई (h') और वस्तु की ऊँचाई (h) का अनुपात।
- \(m = \frac{\text{प्रतिबिंब की ऊँचाई (h')}}{\text{वस्तु की ऊँचाई (h)}}\)
- वस्तु दूरी (u) और प्रतिबिंब दूरी (v) के पदों में आवर्धन:
- \(m = -\frac{v}{u}\)
- आवर्धन के मान का अर्थ:
- \(|m| > 1\): प्रतिबिंब वस्तु से बड़ा है (आवर्धित)।
- \(|m| = 1\): प्रतिबिंब वस्तु के समान आकार का है।
- \(|m| < 1\): प्रतिबिंब वस्तु से छोटा है (घटा हुआ)।
- आवर्धन के चिह्न का अर्थ:
- m धनात्मक (+): प्रतिबिंब आभासी और सीधा है।
- m ऋणात्मक (-): प्रतिबिंब वास्तविक और उल्टा है।
- ऊँचाई के चिह्न:
- वस्तु की ऊँचाई (h): हमेशा धनात्मक (मुख्य अक्ष के ऊपर)।
- सीधे प्रतिबिंब की ऊँचाई (h'): धनात्मक।
- उल्टे प्रतिबिंब की ऊँचाई (h'): ऋणात्मक।
आवर्धन सूत्र: \(m = \frac{h'}{h} = -\frac{v}{u}\)
चिह्न का महत्व:
- m (+) → आभासी, सीधा
- m (-) → वास्तविक, उल्टा
गोलीय दर्पणों के उपयोग
- अवतल दर्पण के उपयोग:
- टॉर्च, सर्चलाइट और वाहनों के अग्रदीप (headlights): प्रकाश का शक्तिशाली समांतर किरण पुंज प्राप्त करने के लिए।
- शेविंग दर्पण: चेहरे का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए।
- दंत चिकित्सक: मरीजों के दांतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने के लिए।
- सौर भट्ठियाँ: सूर्य के प्रकाश को एक बिंदु पर केंद्रित करने के लिए।
- उत्तल दर्पण के उपयोग:
- वाहनों के पश्च-दृश्य (rear-view) दर्पण (साइड मिरर):
- ये सदैव सीधा प्रतिबिंब बनाते हैं।
- ये वस्तु से छोटा प्रतिबिंब बनाते हैं, जिससे दृष्टि-क्षेत्र (field of view) बहुत अधिक होता है।
- ड्राइवर को अपने पीछे के बहुत बड़े क्षेत्र को देखने में सक्षम बनाते हैं, जिससे सुरक्षित ड्राइविंग में मदद मिलती है।
- दुकानों में सुरक्षा दर्पण: दुकानों में सुरक्षा के लिए बड़े उत्तल दर्पण लगाए जाते हैं ताकि दुकान के बड़े क्षेत्र पर नजर रखी जा सके।
उत्तल दर्पण का उपयोग वाहनों के साइड मिरर के रूप में क्यों किया जाता है? यह बोर्ड परीक्षा का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
गोलीय सतहों द्वारा अपवर्तन का परिचय
पिछले अध्यायों में हमने समतल सतहों से प्रकाश के अपवर्तन का अध्ययन किया था। इस अध्याय में हम वक्रीय या गोलीय सतहों से प्रकाश के अपवर्तन पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
- अपवर्तन (Refraction): जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करता है, तो वह अपने पथ से विचलित हो जाता है। इस घटना को अपवर्तन कहते हैं।
- गोलीय सतहें: ये वे सतहें होती हैं जो किसी गोले का भाग होती हैं, जैसे लेंस।
- दैनिक जीवन में उदाहरण:
- चश्मे (लेंस)
- पानी की बूँदें (उत्तल लेंस की तरह व्यवहार करती हैं)
- पानी से भरी बोतलें या बर्तन (लेंस की तरह कार्य कर सकते हैं)
गोलीय सतहों से अपवर्तन के कारण ही हम विभिन्न प्रकार के लेंसों का उपयोग कर पाते हैं, जैसे चश्मे, कैमरे, सूक्ष्मदर्शी आदि।
अपवर्तन की घटना प्रकाश की चाल में परिवर्तन के कारण होती है जब वह एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करता है।
लेंस का परिचय और प्रकार
लेंस एक पारदर्शी माध्यम होता है जो दो पृष्ठों से घिरा होता है, जिनमें से कम से कम एक पृष्ठ वक्रीय होता है। लेंस प्रकाश किरणों को या तो अभिसरित (एकत्रित) करते हैं या अपसरित (फैलाते) हैं।
- उत्तल लेंस (Convex Lens):
- किनारों की अपेक्षा बीच में मोटा होता है।
- प्रकाश किरणों को एक बिंदु पर अभिसरित (converge) करता है, इसलिए इसे अभिसारी लेंस (Converging Lens) कहते हैं।
- सामान्यतः दो उभरे हुए गोलीय पृष्ठ होते हैं (द्वि-उत्तल लेंस)।
- अवतल लेंस (Concave Lens):
- बीच की अपेक्षा किनारों पर मोटा होता है।
- प्रकाश किरणों को फैलाता (diverge) है, इसलिए इसे अपसारी लेंस (Diverging Lens) कहते हैं।
- सामान्यतः दो अंदर की ओर वक्रित गोलीय पृष्ठ होते हैं (द्वि-अवतल लेंस)।
पतले लेंस: इस अध्याय में हम मुख्य रूप से पतले लेंसों का अध्ययन करेंगे, जिनकी मोटाई नगण्य मानी जाती है।
उत्तल लेंस को अभिसारी लेंस और अवतल लेंस को अपसारी लेंस क्यों कहते हैं, यह समझना महत्वपूर्ण है।
गोलीय लेंस से संबंधित मुख्य पद
गोलीय लेंसों के अध्ययन के लिए कुछ महत्वपूर्ण पद:
- वक्रता केंद्र (Centre of Curvature, C1, C2):
- लेंस के प्रत्येक वक्रीय पृष्ठ जिस खोखले गोले का भाग होता है, उस गोले का केंद्र।
- एक लेंस में दो वक्रता केंद्र होते हैं (C1 और C2)।
- वक्रता त्रिज्या (Radius of Curvature, R1, R2):
- प्रत्येक वक्रीय पृष्ठ की त्रिज्या।
- लेंस में दो वक्रता त्रिज्याएँ होती हैं (R1 और R2)।
- मुख्य अक्ष (Principal Axis):
- दोनों वक्रता केंद्रों (C1 और C2) को जोड़ने वाली काल्पनिक सीधी रेखा।
- प्रकाशिक केंद्र (Optical Centre, O):
- लेंस का केंद्रीय बिंदु।
- प्रकाश किरणें जो प्रकाशिक केंद्र से होकर गुजरती हैं, वे बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती हैं।
- द्वारक (Aperture):
- लेंस की वृत्ताकार रूपरेखा का प्रभावी व्यास।
- मुख्य फोकस (Principal Focus, F1, F2):
- लेंस में दो मुख्य फोकस होते हैं।
- उत्तल लेंस: मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली किरणें अपवर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु पर अभिसरित होती हैं, वह मुख्य फोकस (F2) कहलाता है।
- अवतल लेंस: मुख्य अक्ष के समांतर आने वाली किरणें अपवर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष पर जिस बिंदु से अपसरित होती हुई प्रतीत होती हैं, वह मुख्य फोकस (F1) कहलाता है।
- फोकस दूरी (Focal Length, f):
- प्रकाशिक केंद्र (O) और मुख्य फोकस (F) के बीच की दूरी।
- लेंस के दोनों ओर फोकस दूरियाँ समान होती हैं (पतले लेंस के लिए)।
- फोकस तल (Focal Plane):
- मुख्य अक्ष के अभिलंब वह तल जो फोकस बिंदु पर बनता है।
गोलीय लेंसों के लिए चिह्न परिपाटी
गोलीय लेंसों के लिए भी नई कार्तीय चिह्न परिपाटी का उपयोग किया जाता है, जो दर्पणों के समान ही है, लेकिन कुछ अंतर हैं:
- मूल बिंदु: लेंस का प्रकाशिक केंद्र (O) मूल बिंदु माना जाता है।
- X-अक्ष: लेंस का मुख्य अक्ष X-अक्ष के रूप में लिया जाता है।
- वस्तु की स्थिति: वस्तु हमेशा लेंस के बाईं ओर रखी जाती है। प्रकाश किरणें हमेशा बाईं ओर से दाईं ओर आपतित होती हैं।
- दूरियों का मापन: सभी दूरियाँ प्रकाशिक केंद्र (O) से मापी जाती हैं।
- धनात्मक दूरियाँ: प्रकाशिक केंद्र के दाईं ओर (+X अक्ष के अनुदिश) मापी गई दूरियाँ।
- ऋणात्मक दूरियाँ: प्रकाशिक केंद्र के बाईं ओर (-X अक्ष के अनुदिश) मापी गई दूरियाँ।
- ऊँचाई का मापन:
- मुख्य अक्ष के लंबवत तथा ऊपर की ओर (+Y अक्ष के अनुदिश) मापी गई ऊँचाइयाँ धनात्मक।
- मुख्य अक्ष के लंबवत तथा नीचे की ओर (-Y अक्ष के अनुदिश) मापी गई ऊँचाइयाँ ऋणात्मक।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- उत्तल लेंस: फोकस दूरी (f) धनात्मक होती है।
- अवतल लेंस: फोकस दूरी (f) ऋणात्मक होती है।
- वस्तु दूरी (u): हमेशा ऋणात्मक।
- वास्तविक प्रतिबिंब (v): धनात्मक (लेंस के दाईं ओर)।
- आभासी प्रतिबिंब (v): ऋणात्मक (लेंस के बाईं ओर)।
दर्पण और लेंस दोनों के लिए चिह्न परिपाटी में अंतर को ध्यान से समझें, विशेषकर प्रतिबिंब दूरी (v) के चिह्न में।
गोलीय लेंस से प्रतिबिंब रचना के नियम
किरण आरेख बनाने और लेंस द्वारा प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार निर्धारित करने के लिए तीन मुख्य नियम हैं:
- मुख्य अक्ष के समांतर किरण:
- उत्तल लेंस में: अपवर्तन के पश्चात् मुख्य फोकस (F2) से होकर गुजरती है।
- अवतल लेंस में: अपवर्तन के पश्चात् मुख्य फोकस (F1) से अपसरित होती हुई प्रतीत होती है।
- मुख्य फोकस (F1) से होकर गुजरने वाली/की ओर निर्देशित किरण:
- उत्तल लेंस में: मुख्य फोकस (F1) से होकर गुजरने वाली किरण अपवर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है।
- अवतल लेंस में: मुख्य फोकस (F2) की ओर निर्देशित किरण अपवर्तन के पश्चात् मुख्य अक्ष के समांतर हो जाती है।
- प्रकाशिक केंद्र (O) से होकर गुजरने वाली किरण:
- प्रकाशिक केंद्र (O) से होकर गुजरने वाली किरण बिना किसी विचलन के सीधी निकल जाती है।
नोट: प्रतिबिंब बनाने के लिए इनमें से कम से कम दो किरणों का उपयोग किया जाता है।
विशेष स्थिति: यदि प्रकाश की कुछ समांतर किरणें मुख्य अक्ष से किसी कोण पर लेंस पर पड़ें, तो अपवर्तन के पश्चात् वे फोकस तल पर किसी बिंदु से गुजरती हुई (उत्तल लेंस के लिए) या अपसरित होती हुई (अवतल लेंस के लिए) प्रतीत होंगी।
उत्तल लेंस द्वारा प्रतिबिंब रचना (क्रियाकलाप)
क्रियाकलाप-5 में उत्तल लेंस का उपयोग करके मोमबत्ती के प्रतिबिंब का अवलोकन किया गया। यह दर्शाता है कि वस्तु की स्थिति बदलने पर प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार कैसे बदलते हैं।
- उद्देश्य: उत्तल लेंस द्वारा विभिन्न स्थितियों में बनने वाले प्रतिबिंबों की विशेषताओं का प्रायोगिक अध्ययन करना।
- विधि:
- उत्तल लेंस को V-स्टैंड पर रखें और उसकी फोकस दूरी ज्ञात करें।
- लेंस के दोनों ओर F1, F2, 2F1 और 2F2 को चिह्नित करें।
- एक जलती हुई मोमबत्ती को लेंस के बाईं ओर विभिन्न दूरियों पर रखें।
- लेंस के विपरीत दिशा में रखे पर्दे पर मोमबत्ती की लौ का स्पष्ट व तीक्ष्ण प्रतिबिंब प्राप्त करें।
- प्रत्येक स्थिति के लिए प्रतिबिंब की दूरी (v), आकार, प्रकृति (सीधा/उल्टा) और प्रकार (वास्तविक/आभासी) को सारणीबद्ध करें।
- अवलोकन:
- उत्तल लेंस वास्तविक और आभासी दोनों प्रकार के प्रतिबिंब बना सकता है।
- जब वस्तु F1 और प्रकाशिक केंद्र O के बीच होती है, तो आभासी, सीधा और आवर्धित प्रतिबिंब बनता है।
- अन्य स्थितियों में, वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनता है।
- निष्कर्ष: उत्तल लेंस की प्रतिबिंब बनाने की क्षमता वस्तु की स्थिति पर अत्यधिक निर्भर करती है।
गोलीय लेंसों द्वारा विभिन्न स्थितियों में प्रतिबिंब
उत्तल लेंस द्वारा प्रतिबिंब रचना का सारांश:
| क्र.सं. | वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---|---| | 1. | अनंत पर | F2 पर | अत्यधिक छोटा, बिंदु आकार का | वास्तविक तथा उल्टा | | 2. | 2F1 से परे | F2 तथा 2F2 के बीच | छोटा | वास्तविक तथा उल्टा | | 3. | 2F1 पर | 2F2 पर | समान आकार का | वास्तविक तथा उल्टा | | 4. | F1 तथा 2F1 के बीच | 2F2 से परे | बड़ा | वास्तविक तथा उल्टा | | 5. | F1 पर | अनंत पर | अत्यधिक बड़ा | वास्तविक तथा उल्टा | | 6. | F1 तथा प्रकाशिक केंद्र O के बीच | लेंस के उसी ओर, वस्तु की ओर | बड़ा | आभासी तथा सीधा |
अवतल लेंस द्वारा प्रतिबिंब रचना का सारांश: अवतल लेंस हमेशा वस्तु का आभासी, सीधा और छोटा प्रतिबिंब बनाता है, चाहे वस्तु कहीं भी रखी हो।
| क्र.सं. | वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | प्रतिबिंब का आकार | प्रतिबिंब की प्रकृति | |---|---|---|---|---| | 1. | अनंत पर | F1 पर (लेंस के बाईं ओर) | अत्यधिक छोटा, बिंदु आकार का | आभासी तथा सीधा | | 2. | अनंत तथा प्रकाशिक केंद्र O के बीच कहीं भी | F1 तथा O के बीच (लेंस के बाईं ओर) | छोटा | आभासी तथा सीधा |
महत्वपूर्ण उपयोग:
- उत्तल लेंस की F1 और O के बीच वस्तु रखने पर बनने वाले आवर्धित और सीधे आभासी प्रतिबिंब का उपयोग सरल सूक्ष्मदर्शी में किया जाता है।
लेंस से संबंधित राशियाँ
लेंस से संबंधित राशियों को भी अचर और चर श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- अचर राशियाँ (Constant Quantities):
- लेंस की फोकस दूरी (f)
- लेंस की वक्रता त्रिज्या (2f, यदि दोनों पृष्ठों की वक्रता समान हो)
- वस्तु की लंबाई (h)
- लेंस की क्षमता (P)
- चर राशियाँ (Variable Quantities):
- वस्तु की लेंस से दूरी (u)
- प्रतिबिंब की लेंस से दूरी (v)
- प्रतिबिंब की लंबाई (I)
- लेंस की आवर्धन क्षमता (m)
इन राशियों के बीच संबंधों को लेंस सूत्र, आवर्धन सूत्र और लेंस की क्षमता के सूत्र द्वारा समझाया जाता है।
लेंस सूत्र और चिह्न परिपाटी का अनुप्रयोग
लेंस सूत्र गोलीय लेंस के लिए वस्तु की दूरी (u), प्रतिबिंब की दूरी (v) और फोकस दूरी (f) के बीच संबंध स्थापित करता है।
- लेंस सूत्र: \(\frac{1}{v} - \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\)
- यह सूत्र सभी प्रकार के गोलीय लेंसों (उत्तल और अवतल) और वस्तु की सभी स्थितियों के लिए मान्य है।
- आंकिक प्रश्नों को हल करते समय नई कार्तीय चिह्न परिपाटी का सही-सही उपयोग करना अनिवार्य है।
- चिह्न परिपाटी का अनुप्रयोग (संक्षेप में):
- वस्तु दूरी (u): हमेशा ऋणात्मक (वस्तु हमेशा बाईं ओर)।
- उत्तल लेंस: फोकस दूरी (f) धनात्मक।
- अवतल लेंस: फोकस दूरी (f) ऋणात्मक।
- वास्तविक प्रतिबिंब (v): धनात्मक (लेंस के दाईं ओर)।
- आभासी प्रतिबिंब (v): ऋणात्मक (लेंस के बाईं ओर)।
महत्वपूर्ण अंतर (दर्पण सूत्र से): लेंस सूत्र में \(1/u\) पद के पहले ऋणात्मक चिह्न होता है, जबकि दर्पण सूत्र में धनात्मक होता है।
लेंस सूत्र: \(\frac{1}{v} - \frac{1}{u} = \frac{1}{f}\)
दर्पण सूत्र और लेंस सूत्र के बीच के चिह्न अंतर को अक्सर छात्र भूल जाते हैं। ध्यान दें कि लेंस सूत्र में \(1/u\) के पहले ऋणात्मक चिह्न है।
गोलीय लेंस द्वारा आवर्धन
लेंस द्वारा उत्पन्न आवर्धन (Magnification, m) भी प्रतिबिंब की ऊँचाई और वस्तु की ऊँचाई के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है।
- परिभाषा: प्रतिबिंब की ऊँचाई (h') और वस्तु की ऊँचाई (h) का अनुपात।
- \(m = \frac{\text{प्रतिबिंब की ऊँचाई (h')}}{\text{वस्तु की ऊँचाई (h)}}\)
- वस्तु दूरी (u) और प्रतिबिंब दूरी (v) के पदों में आवर्धन:
- \(m = \frac{v}{u}\)
- ध्यान दें: दर्पण के आवर्धन सूत्र \(m = -v/u\) से यह भिन्न है।
- आवर्धन के मान और चिह्न का अर्थ:
- \(|m| > 1\): प्रतिबिंब वस्तु से बड़ा है।
- \(|m| = 1\): प्रतिबिंब वस्तु के समान आकार का है।
- \(|m| < 1\): प्रतिबिंब वस्तु से छोटा है।
- m धनात्मक (+): प्रतिबिंब आभासी और सीधा है।
- m ऋणात्मक (-): प्रतिबिंब वास्तविक और उल्टा है।
- ऊँचाई के चिह्न:
- वस्तु की ऊँचाई (h): हमेशा धनात्मक।
- सीधे प्रतिबिंब की ऊँचाई (h'): धनात्मक।
- उल्टे प्रतिबिंब की ऊँचाई (h'): ऋणात्मक।
लेंस का आवर्धन सूत्र: \(m = \frac{h'}{h} = \frac{v}{u}\)
चिह्न का महत्व:
- m (+) → आभासी, सीधा
- m (-) → वास्तविक, उल्टा
लेंस और दर्पण के आवर्धन सूत्र में \(v/u\) के चिह्न का अंतर याद रखें। लेंस के लिए \(m = v/u\), दर्पण के लिए \(m = -v/u\)।
लेंस की क्षमता (Power of lens)
लेंस की क्षमता (P) उसकी प्रकाश किरणों को अभिसरित या अपसरित करने की क्षमता का माप है। यह लेंस की फोकस दूरी पर निर्भर करती है।
- परिभाषा: लेंस की क्षमता उसकी फोकस दूरी (f) का व्युत्क्रम होती है।
- \(P = \frac{1}{f}\)
- यहाँ, फोकस दूरी (f) हमेशा मीटर (m) में होनी चाहिए।
- SI मात्रक: लेंस की क्षमता का SI मात्रक डाइऑप्टर (Dioptre, D) है।
- 1 डाइऑप्टर उस लेंस की क्षमता है जिसकी फोकस दूरी 1 मीटर हो।
- \(1 D = 1 m^{-1}\)
- क्षमता का चिह्न:
- उत्तल लेंस: फोकस दूरी (f) धनात्मक होती है, इसलिए क्षमता (P) भी धनात्मक होती है।
- अवतल लेंस: फोकस दूरी (f) ऋणात्मक होती है, इसलिए क्षमता (P) भी ऋणात्मक होती है।
- महत्व:
- कम फोकस दूरी वाले लेंसों की क्षमता अधिक होती है, क्योंकि वे प्रकाश किरणों को अधिक मोड़ते हैं।
- चश्मा बनाने वाले (ऑप्टिशियन) लेंसों की फोकस दूरी के बजाय उनकी क्षमता का उपयोग करते हैं।
उदाहरण: यदि किसी लेंस की क्षमता +2.5 D है, तो वह उत्तल लेंस है और उसकी फोकस दूरी \(f = 1/2.5 = 0.4 m = 40 cm\) होगी।
लेंस की क्षमता: \(P = \frac{1}{f}\)
इकाई: डाइऑप्टर (D)
महत्वपूर्ण: f हमेशा मीटर में।
लेंस की क्षमता पर आधारित आंकिक प्रश्न और उसके चिह्न का अर्थ बोर्ड परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है।
लेंसों के उपयोग
लेंसों का उपयोग दैनिक जीवन और विभिन्न प्रकाशिक उपकरणों में व्यापक रूप से होता है:
- चश्मे: दृष्टि दोषों (जैसे निकट दृष्टिदोष, दूर दृष्टिदोष) को ठीक करने के लिए उत्तल, अवतल या मिश्रित लेंसों का उपयोग।
- फोटोग्राफिक कैमरा:
- वस्तु का स्थायी प्रतिबिंब प्राप्त करने के लिए।
- इसमें एक उत्तल लेंस (अभिदृश्यक लेंस) होता है जिसकी फोकस दूरी कम होती है।
- लेंस के पीछे डायफ्राम और शटर होते हैं जो प्रकाश की मात्रा और एक्सपोजर समय को नियंत्रित करते हैं।
- फिल्म पर वस्तु का छोटा, उल्टा एवं वास्तविक प्रतिबिंब बनता है।
- सूक्ष्मदर्शी (Microscope):
- सरल सूक्ष्मदर्शी (Simple Microscope): कम फोकस दूरी वाला एक उत्तल लेंस। यह सूक्ष्म वस्तुओं का बड़ा, सीधा और आभासी प्रतिबिंब बनाता है। (वस्तु F और O के बीच)
- संयुक्त सूक्ष्मदर्शी (Compound Microscope): दो लेंसों (अभिदृश्यक लेंस L1 और नेत्रिका लेंस L2) का उपयोग करता है। यह वस्तु का अत्यधिक आवर्धित प्रतिबिंब बनाता है।
- दूरदर्शी (Telescope):
- दूर स्थित वस्तुओं का आवर्धित प्रतिबिंब देखने के लिए।
- इसमें भी दो उत्तल लेंस (अभिदृश्यक लेंस L0 और नेत्रिका लेंस Le) होते हैं।
- खगोलीय दूरदर्शी में दूर की वस्तु का बड़ा, वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनता है।
- अन्य उपयोग:
- प्रोजेक्टर
- दूरबीन
- पानी की बूँदें और पारदर्शी द्रव भी लेंस की तरह व्यवहार कर सकते हैं।
- मानव और जन्तुओं के नेत्रों में भी बाहरी वस्तुओं का प्रतिबिंब उत्तल लेंस द्वारा बनता है।
फोटोग्राफिक कैमरा, सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी जैसे प्रकाशिक यंत्रों की कार्यप्रणाली और उनमें उपयोग होने वाले लेंसों के प्रकार बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं।