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आनुवंशिकीः जनकों से संतानों तक
Chhattisgarh · Class 10 · 🔬 Science · Chapter 15

आनुवंशिकीः जनकों से संतानों तक

आनुवंशिकीमेण्डल के नियमप्रभावी और अप्रभावी लक्षणपृथक्करण का नियमलिंग निर्धारण

यह अध्याय आनुवंशिकी के मूल सिद्धांतों की पड़ताल करता है, जिसमें बताया गया है कि लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में कैसे जाते हैं। इसमें मेण्डल के मटर के पौधों पर किए गए प्रयोगों, प्रभावी और अप्रभावी लक्षणों, पृथक्करण के नियम और स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम पर चर्चा की गई है। छात्र मानव में सिकल सेल एनीमिया की आनुवंशिकी और लिंग निर्धारण की प्रक्रिया के बारे में भी जानेंगे। यह अध्याय आनुवंशिकी के महत्व और दैनिक जीवन में इसके अनुप्रयोगों पर प्रकाश डालता है।

जीवों में समानता एवं विभिन्नता

जीवों में प्रजनन द्वारा अपने ही जैसे जीव उत्पन्न होते हैं, लेकिन उनमें कुछ समानताएँ और कुछ विभिन्नताएँ होती हैं।

  • समानताएँ:
  • प्रत्येक जीव अपनी प्रजाति के समान ही संतान उत्पन्न करता है (जैसे बबूल से बबूल, मनुष्य से मनुष्य)।
  • संतानों में अपने माता-पिता के कई लक्षण समान होते हैं।
  • विभिन्नताएँ:
  • संतानों में अपने माता-पिता से कुछ लक्षण भिन्न भी हो सकते हैं।
  • एक ही प्रजाति के सदस्यों में भी विविधता पाई जाती है (जैसे एक ही पौधे की दो पत्तियाँ समान नहीं होतीं)।
  • आनुवंशिकी (Heredity):
  • लक्षणों का पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित होना आनुवंशिकी कहलाता है।
  • विभिन्नता (Variation):
  • एक ही जाति के जनकों की संतानों में समानताओं के बावजूद जो अंतर पाया जाता है, उसे विभिन्नता कहते हैं।
  • उदाहरण: आँख की पुतली का रंग, ठुड्डी में गड्ढा, जीभ का गोल मुड़ना, पैर की दूसरी अँगुली का आकार, कर्ण/पाली का जुड़ा या स्वतंत्र होना।
  • विभिन्नताओं के प्रकार:
  • वंशागत विभिन्नताएँ: वे विभिन्नताएँ जिनके लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं (जैसे ठुड्डी में गड्ढा, बालों का रंग)।
  • उपार्जित विभिन्नताएँ: वे विभिन्नताएँ जिनके लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में नहीं जाते हैं (जैसे मोटापा, चोट का निशान)।
  • पौधों में विभिन्नताएँ:
  • एक ही जाति के पौधों में भी पत्तियों का आकार, फूलों की संरचना आदि में समानता के बावजूद कई भिन्नताएँ होती हैं।
  • उदाहरण: मटर या सेम की फली के बीज एक समान नहीं होते, उनमें आकार, रंग आदि की भिन्नताएँ हो सकती हैं।
  • ऐतिहासिक संदर्भ:
  • हजारों वर्षों से लोगों ने इन विभिन्नताओं का अध्ययन किया और अलग-अलग गुणों वाले कई किस्म के पौधों को विकसित किया।
  • यह जिज्ञासा हमेशा रही कि ये गुण कैसे उत्पन्न होते हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में कैसे पहुँचते हैं।
📖परिभाषा

आनुवंशिकी (Heredity): लक्षणों का पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित होना आनुवंशिकी कहलाता है।

📖परिभाषा

विभिन्नता (Variation): एक ही जाति के जनकों की संतानों में समानताओं के बावजूद जो अंतर पाया जाता है, उसे विभिन्नता कहते हैं।

आनुवंशिकी का परिचय और मेण्डल का योगदान

19वीं शताब्दी में गुणों के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुँचने की प्रक्रिया को समझने के लिए व्यापक अध्ययन हुए।

  • डार्विन का योगदान:
  • डार्विन ने विभिन्न लक्षणों का अध्ययन किया और विकास का सिद्धांत दिया।
  • हालांकि, वे लक्षणों के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचने की प्रक्रिया को स्पष्ट नहीं कर पाए।
  • ग्रेगर जोहान्न मेण्डल (Gregor Johann Mendel):
  • इन्हें "आनुवंशिकी का जन्मदाता" कहा जाता है।
  • ऑस्ट्रिया के एक मठ में पादरी थे, जिन्हें बागवानी में रुचि थी।
  • सन् 1856 से 12 साल तक मटर के पौधों पर लगभग 10,000 प्रयोग किए।
  • अपने प्रयोगों में गणितीय गणनाओं का समावेश किया।

मेण्डल के प्रयोग और उनका उद्देश्य

  • मेण्डल का उद्देश्य विषम लक्षणों (जैसे मटर के पीले और हरे बीज, बैंगनी और सफेद फूल) की आनुवंशिकी के लिए सामान्य नियम खोजना था।
  • यह अनुमान लगाना था कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लक्षणों में कितनी भिन्नताएँ होती हैं।
  • मटर के पौधे का चुनाव: मेण्डल ने अपने प्रयोगों के लिए मटर के पौधे का चुनाव निम्न कारणों से किया:
  1. एकवर्षीय पौधा: जीवन चक्र छोटा होने के कारण अनेक पीढ़ियों का अध्ययन सरलता से किया जा सकता है।
  2. पर-परागण संभव: इनमें पर-परागण करवाया जा सकता है, जिससे संकरण होता है।
  3. स्व-परागण: सामान्यतः मटर में स्व-परागण एवं निषेचन होता है, जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी इसके लक्षण शुद्ध बने रहते हैं।
  4. द्विलिंगी: इसका पौधा द्विलिंगी होता है, पुमंग हटाने पर एकलिंगी के समान व्यवहार करता है।
  5. जनन योग्य संकर: संकरण से प्राप्त संकर पौधे पूर्णतः जनन योग्य होते हैं।
  6. स्पष्ट विपरीत लक्षण: मटर में काफी स्पष्ट विपरीत लक्षण (contrasting characters) होते हैं।
  • मेण्डल द्वारा चुने गए मटर के विपरीत लक्षण (सारणी-2):

| क्र. | लक्षण | स्पष्ट विपरीत लक्षण (प्रभावी) | स्पष्ट विपरीत लक्षण (अप्रभावी) | |----|--------------|--------------------------|----------------------------| | 1. | बीज का आकार | गोल (round) | झुर्रीदार (wrinkled) | | 2. | बीज का रंग | पीला (yellow) | हरा (green) | | 3. | पुष्प का रंग | बैंगनी (violet) | सफेद (white) | | 4. | फली का आकार | फूली (swollen) | संकीर्णित (constricted) | | 5. | फली का रंग | हरी (green) | पीली (yellow) | | 6. | पुष्प की स्थिति | कक्षस्थ (axial) | अग्रस्थ (terminal) | | 7. | पौधे की लम्बाई | लम्बा (tall) | छोटा (dwarf) |

  • प्रयोग विधि:
  • मेण्डल ने स्व-परागण करवाकर शुद्ध बैंगनी और शुद्ध सफेद फूल वाले पौधे तैयार किए।
  • इन शुद्ध किस्मों में पर-परागण करवाया।
  • प्रत्येक पीढ़ी के पौधों और उनके गुणों का लेखा-जोखा रखा।

मेण्डल के प्रयोगों के परिणाम (बैंगनी व सफेद फूल वाले पौधों के संदर्भ में)

  • प्रथम पीढ़ी (F₁ generation):
  • शुद्ध बैंगनी और शुद्ध सफेद फूल वाले पौधों में पर-परागण कराने पर सभी पौधे बैंगनी फूल वाले मिले।
  • बैंगनी और सफेद के बीच का कोई रंग नहीं बना।
  • यह दर्शाता है कि एक लक्षण दूसरे पर प्रभावी होता है।
  • द्वितीय पीढ़ी (F₂ generation):
  • F₁ पीढ़ी के बैंगनी फूलों वाले पौधों में स्व-परागण कराने पर F₂ पीढ़ी में बैंगनी और सफेद दोनों फूल वाले पौधे मिले।
  • अनुपात लगभग 3:1 था (जैसे 705 बैंगनी और 224 सफेद, जो लगभग 3.15:1 है)।
  • मेण्डल ने अन्य गुणों के साथ भी यही 3:1 का अनुपात पाया।
  • मेण्डल के निष्कर्ष:
  • दो विपरीत गुणों में से एक प्रभावी (dominant) और दूसरा अप्रभावी (recessive) होता है।
  • प्रभावी गुण की उपस्थिति में अप्रभावी गुण का प्रभाव दिखाई नहीं देता।
  • फूल के रंग के मामले में बैंगनी रंग प्रभावी और सफेद अप्रभावी होता है।
  • सफेद फूल आने के लिए कारक का शुद्ध सफेद होना आवश्यक है।

परिणाम के आधार पर अनुमान

मेण्डल ने अपने प्रयोगों से निम्न अनुमान लगाए:

  1. प्रत्येक लक्षण को दर्शाने के लिए दो कारक (Factor) होते हैं।
  2. प्रजनन के दौरान हर जनक के दो कारकों में से एक कारक संतान को मिलता है। इस प्रकार संतान में कारकों का एक नया जोड़ा बनता है।
  3. विपरीत गुणों के दो जोड़ी कारकों में से एक प्रभावी और दूसरा अप्रभावी होता है।

संभाविता और अनुमान की जाँच

  • मेण्डल ने अपने अनुमानों की पुष्टि के लिए संभाविता (probability) का उपयोग किया।
  • सिक्के का खेल: दो सिक्कों को उछालने पर HH, HT, TH, TT की संभावनाएँ 1:1:1:1 होती हैं (प्रत्येक 25%)।
  • मेण्डल के प्रयोग में बैंगनी (HH, HT, TH) का प्रतिशत 75% और सफेद (TT) का प्रतिशत 25% था।
  • यह तभी संभव है जब बैंगनी कारक सफेद को दबा रहा हो (प्रभावी हो)।

अनुमान और भी (कारकों का निरूपण)

  • शुद्ध जनक:
  • शुद्ध बैंगनी फूल: VV (समरूपी प्रभावी)
  • शुद्ध सफेद फूल: vv (समरूपी अप्रभावी)
  • युग्मक (Gametes):
  • बैंगनी जनक से: V, V
  • सफेद जनक से: v, v
  • प्रथम पीढ़ी (F₁):
  • पर-परागण (VV x vv) से सभी पौधे Vv कारक वाले होंगे।
  • सभी फूल बैंगनी होंगे क्योंकि V प्रभावी है।
  • द्वितीय पीढ़ी (F₂):
  • F₁ पौधों (Vv) में स्व-परागण (Vv x Vv) से:
  • पुनेट वर्ग (Punnett Square):

| | V | v | |-----|-----|-----| | V | VV | Vv | | v | Vv | vv |

  • कारकों के जोड़े:
  • VV (शुद्ध बैंगनी): 25%
  • Vv (संकर बैंगनी): 50%
  • vv (शुद्ध सफेद): 25%
  • परिणाम:
  • बैंगनी फूल (VV + Vv): 75%
  • सफेद फूल (vv): 25%
  • अनुपात: 3:1 (बैंगनी:सफेद)
  • समरूपी (Homozygous) कारक: जब दोनों कारक समान हों (जैसे VV या vv)।
  • विषमरूपी (Heterozygous) कारक: जब दोनों कारक भिन्न हों (जैसे Vv)।

मेण्डल के नियम

  • पृथक्करण का नियम (Law of Segregation):
  • मेण्डल को पता चला कि परागकण व बीजाण्ड बनते समय एक जोड़े कारक में से दोनों कारक अलग-अलग हो जाते हैं
  • अर्थात्, युग्मक में केवल एक कारक पहुँचता है (जैसे V या v)।
  • यह नियम बताता है कि युग्मक निर्माण के दौरान प्रत्येक जीन के दो युग्मविकल्पी (alleles) एक-दूसरे से पृथक हो जाते हैं, ताकि प्रत्येक युग्मक में प्रत्येक जीन का केवल एक युग्मविकल्पी हो।
  • स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): (परिशिष्ट में वर्णित)
  • मेण्डल ने यह भी देखा कि अलग-अलग गुण एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप में अगली पीढ़ी तक (युग्मकों द्वारा) पहुँचते हैं।
  • यह नियम तब लागू होता है जब दो या दो से अधिक लक्षणों का अध्ययन एक साथ किया जाता है।
  • उदाहरण: द्विसंकर क्रॉस में (गोल-पीले और झुर्रीदार-हरे बीज) F₂ पीढ़ी में 9:3:3:1 का अनुपात मिलता है।
  • मेण्डल के नियमों की सीमाएँ:
  • मेण्डलीय नियम हमेशा हू-ब-हू लागू नहीं होते, जैसे अलैंगिक प्रजनन करने वाले जीवों में, या जिनमें गुणसूत्र जोड़े में नहीं होते (जैसे सरसों में चतुर्गुणित, गेहूँ में बहुगुणित), या जिनमें एक ही गुण के एक से ज्यादा प्रभावी कारक हैं (जैसे मानव रक्त समूह)।
महत्त्वपूर्ण

मेण्डल को "आनुवंशिकी का जन्मदाता" कहा जाता है।

📖परिभाषा

प्रभावी (Dominant) लक्षण: वह लक्षण जो विषमयुग्मजी अवस्था में स्वयं को व्यक्त करता है और अप्रभावी लक्षण को दबा देता है।

📖परिभाषा

अप्रभावी (Recessive) लक्षण: वह लक्षण जो विषमयुग्मजी अवस्था में स्वयं को व्यक्त नहीं कर पाता और प्रभावी लक्षण द्वारा दबा दिया जाता है। यह केवल समयुग्मजी अवस्था में ही व्यक्त होता है।

📖परिभाषा

पृथक्करण का नियम (Law of Segregation): युग्मक निर्माण के दौरान प्रत्येक जीन के दो युग्मविकल्पी एक-दूसरे से पृथक हो जाते हैं, ताकि प्रत्येक युग्मक में प्रत्येक जीन का केवल एक युग्मविकल्पी हो।

📖परिभाषा

स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): जब दो या दो से अधिक लक्षणों का अध्ययन एक साथ किया जाता है, तो प्रत्येक लक्षण के युग्मविकल्पी का पृथक्करण दूसरे लक्षण के युग्मविकल्पी के पृथक्करण से स्वतंत्र होता है।

महत्त्वपूर्ण

जीनोटाइप (Genotype): किसी जीव के आनुवंशिक संघटन (कारकों का समूह) को जीनोटाइप कहते हैं।

फिनोटाइप (Phenotype): किसी जीव के बाह्य रूप से दिखाई देने वाले लक्षणों को फिनोटाइप कहते हैं।

मानव में मेण्डलीय आनुवंशिकी

मनुष्य में भी कई लक्षण मेण्डल के नियमों के अनुसार ही पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित होते हैं, जैसे ठुड्डी में गड्ढा, सिकल सेल एनीमिया और लिंग निर्धारण।

सिकल सेल कारक और आनुवंशिकी

  • सिकल सेल एनीमिया: एक आनुवंशिक रोग है जिसमें लाल रक्त कोशिकाएँ हँसियाकार हो जाती हैं।
  • कारक:
  • मनुष्य में 11वें अलिंग गुणसूत्र पर हीमोग्लोबिन प्रोटीन बनाने का कारक पाया जाता है।
  • सामान्य हीमोग्लोबिन बनाने वाले कारक को RR से दर्शाया जाता है (गोल लाल रक्त कोशिकाएँ)।
  • बदलाव वाले कारक को rr से दर्शाया जाता है (हँसियाकार रक्त कोशिकाएँ)।
  • प्रभावी-अप्रभावी: सामान्य हीमोग्लोबिन कारक (R) हँसियाकार हीमोग्लोबिन कारक (r) पर प्रभावी होता है।
  • प्रभाव:
  • हँसियाकार कोशिकाओं में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता बहुत कम होती है।
  • सामान्य रक्त कोशिका का जीवनकाल 100-120 दिन, हँसियाकार का 15-20 दिन।
  • रोगी जल्दी थक जाता है।
  • यह तब घातक होता है जब कारक समरूपी अप्रभावी (rr) अवस्था में हों।
  • वाहक (Carrier):
  • विषमरूपी (Rr) व्यक्ति रोग से प्रभावित नहीं होता, लेकिन रोग के कारक का वाहक होता है।
  • ऐसे व्यक्ति में सामान्य और हँसियाकार दोनों प्रकार की रक्त कोशिकाएँ बनती हैं, लेकिन सामान्य कोशिकाएँ अधिक होती हैं।
  • महत्व: सिकल सेल वाहकों में मलेरिया के प्रति प्रतिरोधक क्षमता होती है, क्योंकि मलेरिया के परजीवी हँसियाकार कोशिकाओं में जीवित नहीं रह पाते।
  • सिकल सेल लक्षण की आनुवंशिकी (पुनेट वर्ग):
  • यदि दो अप्रभावित वाहक माता-पिता (Rr) हों, तो उनकी संतानों में:

| | R | r | |-----|-----|-----| | R | RR | Rr | | r | Rr | rr |

  • परिणाम:
  • सामान्य (RR): 1/4 (25%)
  • वाहक (Rr): 2/4 (50%)
  • रोगी (rr): 1/4 (25%)

मनुष्य में लिंग निर्धारण

  • मनुष्य में लिंग निर्धारण 23वीं जोड़ी गुणसूत्रों द्वारा होता है।
  • मादा: XX गुणसूत्र।
  • नर: XY गुणसूत्र (Y गुणसूत्र X से छोटा होता है)।
  • युग्मक निर्माण:
  • मादा (XX) केवल X युग्मक (अंडाणु) उत्पन्न करती है।
  • नर (XY) दो प्रकार के युग्मक (शुक्राणु) उत्पन्न करता है: X और Y।
  • निषेचन:
  • जब X अंडाणु X शुक्राणु से मिलता है, तो XX युग्मनज बनता है (मादा संतान)।
  • जब X अंडाणु Y शुक्राणु से मिलता है, तो XY युग्मनज बनता है (नर संतान)।
  • संभावना: नर या मादा संतान होने की संभावना प्रत्येक बार 50% होती है।
  • निष्कर्ष: व्यक्ति का लिंग नर या मादा होना पूर्णतः एक संयोग की बात है, इसके लिए न तो माँ और न ही पिता जिम्मेदार हैं।
  • लिंग निर्धारण का पुनेट वर्ग:

| | X (शुक्राणु) | Y (शुक्राणु) | |-----|--------------|--------------| | X (अंडाणु) | XX (मादा) | XY (नर) |

  • परिणाम: 50% मादा (XX) और 50% नर (XY) संतान।
महत्त्वपूर्ण

सिकल सेल एनीमिया के वाहकों (Rr) में मलेरिया के प्रति प्रतिरोधक क्षमता होती है।

याद रखें

मनुष्य में नर या मादा संतान होने की संभावना हमेशा 50% होती है।

जनकों से सन्तान : कारक से जीन तक

मेण्डल ने आनुवंशिकी के क्षेत्र में प्रथम महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसके लिए उन्हें "आनुवंशिकी का जन्मदाता" कहा गया।

  • मेण्डल के कारक से जीन तक:
  • मेण्डल ने परिकल्पना की कि प्रत्येक लक्षण एक जोड़ी कारक के द्वारा प्रकट होता है।
  • लगभग 60 साल बाद (1920 में), सटन (Sutton) ने टिड्डे के गुणसूत्रों पर प्रयोग कर बताया कि मेण्डलीय कारक गुणसूत्रों पर मौजूद होते हैं।
  • किसी एक जनक के एक जोड़ी गुणसूत्र में से एक गुणसूत्र ही संतान को मिलता है
  • मेण्डल के कारक को बाद में जीन (Gene) कहा गया।
  • यह स्वीकार किया गया कि जीन ही वंशागति के लिए उत्तरदायी इकाइयाँ हैं।
  • जीन और डीएनए (DNA):
  • शोध आगे बढ़ा और आनुवंशिक पदार्थ डी.एन.ए. (DNA) की खोज हुई।
  • जीन को डी.एन.ए. का वह हिस्सा माना गया जिससे प्रोटीन बनने की सूचना मिलती है
  • प्रोटीन ही जीवों के लक्षणों को निर्धारित करते हैं।
  • नए जीन समूह और प्रजाति निर्माण:
  • किसी जीन समूह में एक भी जीन में फेरबदल से नए जीन समूह बनते हैं।
  • ऐसे जीन समूह वाली संतान नए जीन समूह की होती है।
  • नए जीन समूह से नई प्रजाति निर्मित होती है।
  • प्रजातियों की परिभाषा अब आनुवंशिक प्रजातियों की अवधारणा (genetic species concept) के अंतर्गत दी जाती है।
  • आनुवंशिकी के अनुप्रयोग:
  • मनुष्य के गुणसूत्रों पर पाए जाने वाले जीन का पूरा लेखा-जोखा तैयार हो चुका है (मानव जीनोम परियोजना)।
  • इसका उपयोग आनुवंशिक रोगों की पहचान और उनके इलाज में होता है।
  • कृषि में उन्नत किस्मों के विकास में भी आनुवंशिकी का महत्वपूर्ण योगदान है।
महत्त्वपूर्ण

मेण्डल के 'कारक' को बाद में जीन (Gene) कहा गया। जीन डी.एन.ए. का वह हिस्सा है जिससे प्रोटीन बनने की सूचना मिलती है।

📖परिभाषा

जीन (Gene): आनुवंशिकता की मूल भौतिक और कार्यात्मक इकाई। यह डी.एन.ए. का एक विशिष्ट खंड है जो एक विशेष प्रोटीन या आर.एन.ए. अणु के संश्लेषण के लिए आनुवंशिक जानकारी रखता है।

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