पूर्ण संख्या एवं पूर्ण संख्या पर संक्रियाएँ
यह अध्याय छात्रों को पूर्ण संख्याओं की अवधारणा से परिचित कराता है, जिसमें शून्य का महत्व भी शामिल है। यह संख्या रेखा पर पूर्ण संख्याओं को दर्शाना सिखाता है और योग, घटाव, गुणा और भाग जैसी बुनियादी अंकगणितीय संक्रियाओं को संख्या रेखा पर कैसे किया जाता है, यह भी बताता है। इसके अतिरिक्त, अध्याय में स्थानीय मान, साहचर्य नियम, क्रम विनिमय नियम और शून्य के गुणों जैसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं को शामिल किया गया है। यह छात्रों को संख्याओं के साथ काम करने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।
पूर्ण संख्या
पूर्ण संख्याएँ क्या हैं?
- प्राकृत संख्याएँ: गिनती की संख्याएँ (1, 2, 3, ...)। ये अनंत होती हैं और सबसे छोटी प्राकृत संख्या 1 है।
- शून्य की आवश्यकता: जब किसी प्राकृत संख्या में से उसी प्राकृत संख्या को घटाया जाता है (जैसे 5 - 5), तो परिणाम 0 आता है। 0 प्राकृत संख्या नहीं है, लेकिन यह 'कुछ नहीं' या 'खाली' स्थिति को दर्शाने के लिए आवश्यक है।
- पूर्ण संख्याएँ: प्राकृत संख्याओं के समूह में शून्य (0) को शामिल करने पर प्राप्त संख्याएँ पूर्ण संख्याएँ कहलाती हैं।
- पूर्ण संख्याओं का समुच्चय: \(W = \{0, 1, 2, 3, 4, 5, ...\}\)
- सबसे छोटी पूर्ण संख्या 0 है।
- सभी प्राकृत संख्याएँ पूर्ण संख्याएँ होती हैं, लेकिन सभी पूर्ण संख्याएँ प्राकृत संख्याएँ नहीं होतीं (क्योंकि 0 एक पूर्ण संख्या है पर प्राकृत संख्या नहीं)।
प्राकृत और पूर्ण संख्याओं में अंतर
| विशेषता | प्राकृत संख्याएँ (N) | पूर्ण संख्याएँ (W) | |---------------|-------------------|------------------| | शुरुआत | 1 से शुरू होती हैं | 0 से शुरू होती हैं | | शून्य | शामिल नहीं | शामिल है | | सबसे छोटी | 1 | 0 | | सबसे बड़ी | अपरिभाषित | अपरिभाषित | | उदाहरण | 1, 2, 3, ... | 0, 1, 2, 3, ... |
शून्य (0) की खोज भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने की थी।
परवर्ती संख्या: किसी संख्या में 1 जोड़ने पर उसकी परवर्ती संख्या प्राप्त होती है। (जैसे 5 की परवर्ती 6 है।) पूर्ववर्ती संख्या: किसी संख्या में से 1 घटाने पर उसकी पूर्ववर्ती संख्या प्राप्त होती है। (जैसे 5 की पूर्ववर्ती 4 है।)
पूर्ण संख्याओं को संख्या रेखा पर दर्शाना
संख्या रेखा क्या है?
- एक सीधी रेखा जिस पर संख्याओं को समान दूरी पर चिह्नित किया जाता है।
- यह संख्याओं के क्रम और उनके मान को समझने में मदद करती है।
पूर्ण संख्याओं को संख्या रेखा पर दर्शाने के चरण:
- एक सीधी रेखा खींचें।
- रेखा पर एक बिंदु को प्रारंभिक बिंदु के रूप में चिह्नित करें और उसे '0' (शून्य) का मान दें।
- शून्य के ठीक दाईं ओर समान दूरी पर क्रमशः 1, 2, 3, 4, ... संख्याएँ लिखें।
- यह क्रम अनंत तक चलता है, क्योंकि पूर्ण संख्याएँ अनंत होती हैं।
संख्याओं की तुलना:
- संख्या रेखा पर, जो संख्या किसी दूसरी संख्या के दाईं ओर होती है, वह हमेशा उस संख्या से बड़ी होती है।
- उदाहरण: 5, 3 के दाईं ओर है, इसलिए \(5 > 3\)।
- जो संख्या किसी दूसरी संख्या के बाईं ओर होती है, वह हमेशा उस संख्या से छोटी होती है।
- उदाहरण: 2, 4 के बाईं ओर है, इसलिए \(2 < 4\)।
संख्या रेखा के लाभ:
- संख्याओं के बीच के संबंध को दृश्य रूप से समझने में सहायक।
- योग, घटाना, गुणा और भाग जैसी संक्रियाओं को समझने का आधार।
संख्या रेखा पर, दाईं ओर जाने पर संख्या का मान बढ़ता है और बाईं ओर जाने पर घटता है।
पूर्ण संख्याओं के गुण
पूर्ण संख्याएँ कुछ महत्वपूर्ण गुणधर्मों का पालन करती हैं जो गणितीय संक्रियाओं को समझने और हल करने में सहायक होते हैं।
1. संवरक गुण (Closure Property)
- योग के लिए: यदि \(a\) और \(b\) कोई दो पूर्ण संख्याएँ हैं, तो उनका योग \(a + b\) भी एक पूर्ण संख्या होगी।
- उदाहरण: \(3 + 5 = 8\) (8 एक पूर्ण संख्या है)।
- घटाने के लिए: पूर्ण संख्याएँ घटाने के लिए संवरक गुण का पालन नहीं करतीं।
- उदाहरण: \(3 - 5 = -2\) (-2 एक पूर्ण संख्या नहीं है)।
- गुणा के लिए: यदि \(a\) और \(b\) कोई दो पूर्ण संख्याएँ हैं, तो उनका गुणनफल \(a \times b\) भी एक पूर्ण संख्या होगी।
- उदाहरण: \(3 \times 5 = 15\) (15 एक पूर्ण संख्या है)।
- भाग के लिए: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए संवरक गुण का पालन नहीं करतीं।
- उदाहरण: \(3 \div 5 = 0.6\) (0.6 एक पूर्ण संख्या नहीं है)।
2. क्रमविनिमय गुण (Commutative Property)
- योग के लिए: यदि \(a\) और \(b\) कोई दो पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \(a + b = b + a\)।
- उदाहरण: \(3 + 5 = 8\) और \(5 + 3 = 8\)।
- घटाने के लिए: पूर्ण संख्याएँ घटाने के लिए क्रमविनिमय गुण का पालन नहीं करतीं।
- उदाहरण: \(5 - 3 = 2\) लेकिन \(3 - 5 = -2\)।
- गुणा के लिए: यदि \(a\) और \(b\) कोई दो पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \(a \times b = b \times a\)।
- उदाहरण: \(3 \times 5 = 15\) और \(5 \times 3 = 15\)।
- भाग के लिए: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए क्रमविनिमय गुण का पालन नहीं करतीं।
- उदाहरण: \(6 \div 3 = 2\) लेकिन \(3 \div 6 = 0.5\)।
3. साहचर्य गुण (Associative Property)
- योग के लिए: यदि \(a, b, c\) कोई तीन पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \((a + b) + c = a + (b + c)\)।
- उदाहरण: \((2 + 3) + 4 = 5 + 4 = 9\) और \(2 + (3 + 4) = 2 + 7 = 9\)।
- घटाने के लिए: पूर्ण संख्याएँ घटाने के लिए साहचर्य गुण का पालन नहीं करतीं।
- उदाहरण: \((5 - 3) - 1 = 2 - 1 = 1\) लेकिन \(5 - (3 - 1) = 5 - 2 = 3\)।
- गुणा के लिए: यदि \(a, b, c\) कोई तीन पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \((a \times b) \times c = a \times (b \times c)\)।
- उदाहरण: \((2 \times 3) \times 4 = 6 \times 4 = 24\) और \(2 \times (3 \times 4) = 2 \times 12 = 24\)।
- भाग के लिए: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए साहचर्य गुण का पालन नहीं करतीं।
4. वितरण गुण (Distributive Property) (गुणा का योग पर वितरण)
- यदि \(a, b, c\) कोई तीन पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \(a \times (b + c) = (a \times b) + (a \times c)\)।
- उदाहरण: \(2 \times (3 + 4) = 2 \times 7 = 14\) और \((2 \times 3) + (2 \times 4) = 6 + 8 = 14\)।
5. तत्समक अवयव (Identity Element)
- योज्य तत्समक: शून्य (0) योज्य तत्समक है, क्योंकि किसी भी पूर्ण संख्या में 0 जोड़ने पर संख्या का मान नहीं बदलता। \(a + 0 = a\)।
- गुणन तत्समक: एक (1) गुणन तत्समक है, क्योंकि किसी भी पूर्ण संख्या को 1 से गुणा करने पर संख्या का मान नहीं बदलता। \(a \times 1 = a\)।
परीक्षा में अक्सर पूर्ण संख्याओं के गुणों से संबंधित सत्य/असत्य प्रश्न पूछे जाते हैं।
पूर्ण संख्याओं का योग
संख्या रेखा पर योग की प्रक्रिया:
- एक संख्या रेखा बनाएँ और उस पर 0 से शुरू करके पूर्ण संख्याओं को समान दूरी पर चिह्नित करें।
- पहली संख्या पर एक बिंदु लगाएँ। यह आपका प्रारंभिक बिंदु होगा।
- दूसरी संख्या के मान के बराबर इकाइयाँ दाईं ओर चलें। प्रत्येक इकाई एक कदम को दर्शाती है।
- जिस संख्या पर आप रुकते हैं, वही दोनों संख्याओं का योगफल होता है।
उदाहरण: \(3 + 2 = 5\)
- 0 से 3 पर जाएँ।
- 3 से 2 इकाई दाईं ओर चलें (यानी 4 और 5 पर)।
- आप 5 पर पहुँचेंगे। अतः \(3 + 2 = 5\)।
योग के गुणधर्म (पुनरावलोकन):
- संवरक गुण: दो पूर्ण संख्याओं का योग हमेशा एक पूर्ण संख्या होता है।
- क्रमविनिमय गुण: \(a + b = b + a\) (संख्याओं का क्रम बदलने पर भी योगफल समान रहता है)।
- साहचर्य गुण: \((a + b) + c = a + (b + c)\) (समूह बनाने का क्रम बदलने पर भी योगफल समान रहता है)।
- योज्य तत्समक: 0 (किसी भी संख्या में 0 जोड़ने पर वही संख्या मिलती है)।
संख्या रेखा पर योग हमेशा दाईं ओर बढ़ने से होता है।
पूर्ण संख्याओं का घटाना
संख्या रेखा पर घटाने की प्रक्रिया:
- एक संख्या रेखा बनाएँ।
- पहली संख्या पर एक बिंदु लगाएँ।
- घटाने के लिए, दूसरी संख्या के मान के बराबर इकाइयाँ बाईं ओर चलें।
- जिस संख्या पर आप रुकते हैं, वही घटाने का परिणाम होता है।
उदाहरण: \(8 - 5 = 3\)
- 0 से 8 पर जाएँ।
- 8 से 5 इकाई बाईं ओर चलें (यानी 7, 6, 5, 4, 3 पर)।
- आप 3 पर पहुँचेंगे। अतः \(8 - 5 = 3\)।
घटाने के गुणधर्म (पुनरावलोकन):
- संवरक गुण: पूर्ण संख्याएँ घटाने के लिए संवरक गुण का पालन नहीं करतीं (जैसे \(3 - 5 = -2\), जो पूर्ण संख्या नहीं है)।
- क्रमविनिमय गुण: पूर्ण संख्याएँ घटाने के लिए क्रमविनिमय गुण का पालन नहीं करतीं (जैसे \(5 - 3 \neq 3 - 5\))।
- साहचर्य गुण: पूर्ण संख्याएँ घटाने के लिए साहचर्य गुण का पालन नहीं करतीं (जैसे \((5 - 3) - 1 \neq 5 - (3 - 1)\))।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- छोटी संख्या से बड़ी संख्या घटाने पर पूर्ण संख्या प्राप्त नहीं होती।
- किसी संख्या में से 0 घटाने पर वही संख्या प्राप्त होती है (जैसे \(5 - 0 = 5\))।
याद रखें, घटाने की संक्रिया में संख्याओं का क्रम महत्वपूर्ण होता है।
पूर्ण संख्याओं का गुणा
गुणा क्या है?
- गुणा बार-बार जोड़ने की संक्षिप्त प्रक्रिया है।
- उदाहरण: \(3 \times 4\) का अर्थ है 3 को 4 बार जोड़ना (\(3 + 3 + 3 + 3 = 12\))।
संख्या रेखा पर गुणा की प्रक्रिया:
- एक संख्या रेखा खींचें।
- 0 से शुरू करें।
- पहली संख्या के बराबर 'कूद' (जंप) लगाएँ।
- यह 'कूद' उतनी बार दोहराई जाती है जितनी बार दूसरे अंक का मान होता है।
- अंतिम 'कूद' का अंतिम बिंदु ही गुणनफल होता है।
उदाहरण: \(3 \times 4 = 12\)
- 0 से शुरू करें।
- 3 इकाई की पहली कूद लगाएँ (0 से 3 पर)।
- 3 इकाई की दूसरी कूद लगाएँ (3 से 6 पर)।
- 3 इकाई की तीसरी कूद लगाएँ (6 से 9 पर)।
- 3 इकाई की चौथी कूद लगाएँ (9 से 12 पर)।
- आप 12 पर पहुँचेंगे। अतः \(3 \times 4 = 12\)。
गुणा के गुणधर्म (पुनरावलोकन):
- संवरक गुण: दो पूर्ण संख्याओं का गुणनफल हमेशा एक पूर्ण संख्या होता है।
- क्रमविनिमय गुण: \(a \times b = b \times a\) (संख्याओं का क्रम बदलने पर भी गुणनफल समान रहता है)।
- साहचर्य गुण: \((a \times b) \times c = a \times (b \times c)\) (समूह बनाने का क्रम बदलने पर भी गुणनफल समान रहता है)।
- गुणन तत्समक: 1 (किसी भी संख्या को 1 से गुणा करने पर वही संख्या मिलती है)।
- शून्य का गुण: किसी भी पूर्ण संख्या को 0 से गुणा करने पर गुणनफल हमेशा 0 होता है (\(a \times 0 = 0\))।
गुणा को बार-बार योग के रूप में देखा जा सकता है।
पूर्ण संख्याओं का भाग
भाग क्या है?
- भाग बार-बार घटाने की प्रक्रिया है।
- उदाहरण: \(12 \div 3\) का अर्थ है 12 में से 3 को कितनी बार घटाया जा सकता है जब तक 0 न आ जाए।
संख्या रेखा पर भाग की प्रक्रिया:
- एक संख्या रेखा खींचें।
- भाज्य (जिस संख्या को भाग देना है) से शुरू करें।
- भाजक (जिस संख्या से भाग देना है) के बराबर दूरी के कदम बाईं ओर बार-बार चलें।
- यह प्रक्रिया तब तक दोहराएँ जब तक आप 0 पर न पहुँच जाएँ।
- जितने कदम आप चलते हैं, वही आपका भागफल होता है।
उदाहरण: \(12 \div 3 = 4\)
- 12 से शुरू करें।
- 3 इकाई बाईं ओर चलें (12 से 9 पर)।
- 3 इकाई बाईं ओर चलें (9 से 6 पर)।
- 3 इकाई बाईं ओर चलें (6 से 3 पर)।
- 3 इकाई बाईं ओर चलें (3 से 0 पर)।
- आपने कुल 4 कदम चले। अतः \(12 \div 3 = 4\)。
भाग के गुणधर्म (पुनरावलोकन):
- संवरक गुण: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए संवरक गुण का पालन नहीं करतीं (जैसे \(5 \div 2 = 2.5\), जो पूर्ण संख्या नहीं है)।
- क्रमविनिमय गुण: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए क्रमविनिमय गुण का पालन नहीं करतीं (जैसे \(6 \div 3 \neq 3 \div 6\))।
- साहचर्य गुण: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए साहचर्य गुण का पालन नहीं करतीं।
- शून्य का गुण:
- 0 को किसी भी गैर-शून्य पूर्ण संख्या से भाग देने पर भागफल 0 होता है (\(0 \div a = 0\), जहाँ \(a \neq 0\))।
- किसी भी पूर्ण संख्या को 0 से भाग देना अपरिभाषित है (\(a \div 0\) अपरिभाषित है)।
किसी भी संख्या को शून्य से भाग देना अपरिभाषित है।
स्थानीय मान
स्थानीय मान क्या है?
- किसी संख्या में किसी अंक का स्थानीय मान उस अंक की स्थिति (स्थान) पर निर्भर करता है।
- यह दाशमिक प्रणाली (दशमलव प्रणाली) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ प्रत्येक स्थान का मान उसके दाईं ओर के स्थान के मान का 10 गुना होता है।
दाशमिक प्रणाली:
- इसमें 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 दस अंकों का प्रयोग किया जाता है।
- इकाई: \(10^0 = 1\)
- दहाई: \(10^1 = 10\)
- सैकड़ा: \(10^2 = 100\)
- हजार: \(10^3 = 1000\)
- और इसी प्रकार आगे।
संख्या का विस्तारित रूप:
- किसी संख्या को उसके प्रत्येक अंक के स्थानीय मानों के योग के रूप में व्यक्त करना उसका विस्तारित रूप कहलाता है।
- उदाहरण: संख्या 769
- 9 इकाई के स्थान पर है, स्थानीय मान \(9 \times 1 = 9\)
- 6 दहाई के स्थान पर है, स्थानीय मान \(6 \times 10 = 60\)
- 7 सैकड़ा के स्थान पर है, स्थानीय मान \(7 \times 100 = 700\)
- अतः, \(769 = 700 + 60 + 9\)
अंकित मान (Face Value):
- किसी अंक का अंकित मान उसका अपना मान होता है, चाहे वह किसी भी स्थान पर हो।
- उदाहरण: संख्या 769 में 7 का अंकित मान 7 है, 6 का अंकित मान 6 है, और 9 का अंकित मान 9 है।
स्थानीय मान किसी अंक की स्थिति पर निर्भर करता है, जबकि अंकित मान अंक का अपना मान होता है।
योग संक्रिया की अन्य विशेषता (साहचर्य नियम)
साहचर्य नियम (Associative Property) - योग के लिए:
- यह नियम बताता है कि जब हम तीन या अधिक संख्याओं को जोड़ते हैं, तो संख्याओं के समूह बनाने का तरीका बदलने से योगफल पर कोई असर नहीं पड़ता है।
- गणितीय रूप से, यदि \(a, b, c\) कोई तीन पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \((a + b) + c = a + (b + c)\)।
उदाहरण:
- मान लीजिए संख्याएँ 3, 4, 5 हैं।
- पहला तरीका: \((3 + 4) + 5 = 7 + 5 = 12\)
- दूसरा तरीका: \(3 + (4 + 5) = 3 + 9 = 12\)
- दोनों स्थितियों में योगफल समान (12) है।
साहचर्य नियम का महत्व:
- यह हमें बड़ी संख्याओं को जोड़ने में सुविधा प्रदान करता है, क्योंकि हम अपनी सुविधा के अनुसार संख्याओं का समूह बना सकते हैं।
घटाने में साहचर्य नियम की जाँच:
- घटाने की संक्रिया साहचर्य नियम का पालन नहीं करती।
- उदाहरण: \((13 - 6) - 5 = 7 - 5 = 2\)
- लेकिन \(13 - (6 - 5) = 13 - 1 = 12\)
- चूंकि \(2 \neq 12\), अतः घटाने में साहचर्य नियम लागू नहीं होता।
साहचर्य नियम केवल योग और गुणा पर लागू होता है, घटाने और भाग पर नहीं।
गुणन क्रिया का अध्ययन (संवरक, क्रमविनिमय)
गुणन संक्रिया का संवरक गुण:
- दो पूर्ण संख्याओं का गुणनफल हमेशा एक पूर्ण संख्या होती है।
- उदाहरण: \(5 \times 7 = 35\) (35 एक पूर्ण संख्या है)।
- यह गुण सुनिश्चित करता है कि पूर्ण संख्याओं के समूह में गुणा करने पर हमें हमेशा उसी समूह की संख्या मिलेगी।
गुणन संक्रिया का क्रमविनिमय गुण:
- यह नियम बताता है कि दो संख्याओं को गुणा करते समय उनके क्रम को बदलने पर भी गुणनफल समान रहता है।
- गणितीय रूप से, यदि \(a\) और \(b\) कोई दो पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \(a \times b = b \times a\)।
उदाहरण:
- \(12 \times 5 = 60\)
- क्रम बदलने पर: \(5 \times 12 = 60\)
- दोनों स्थितियों में गुणनफल समान है।
क्रमविनिमय नियम का महत्व:
- यह नियम बड़ी संख्याओं के लिए भी लागू होता है, जिससे गणनाएँ आसान हो जाती हैं। यदि हमें एक क्रम में गुणनफल पता है, तो हमें दूसरे क्रम में फिर से गुणा करने की आवश्यकता नहीं होती।
- यह मानसिक गणना और अनुमान लगाने में भी सहायक होता है।
गुणा और योग दोनों क्रमविनिमय नियम का पालन करते हैं।
गुणन क्रिया का अध्ययन (साहचर्य नियम)
गुणन संक्रिया का साहचर्य नियम:
- यह नियम बताता है कि जब तीन या अधिक संख्याओं को गुणा किया जाता है, तो संख्याओं के समूह बनाने का तरीका बदलने पर भी गुणनफल समान रहता है।
- गणितीय रूप से, यदि \(a, b, c\) कोई तीन पूर्ण संख्याएँ हैं, तो \((a \times b) \times c = a \times (b \times c)\)।
उदाहरण: संख्याएँ 2, 5, 6
- पहला तरीका: \(2 \times (5 \times 6) = 2 \times 30 = 60\)
- दूसरा तरीका: \((2 \times 5) \times 6 = 10 \times 6 = 60\)
- दोनों स्थितियों में गुणनफल समान (60) है।
साहचर्य नियम का महत्व:
- यह नियम बड़ी संख्याओं को गुणा करते समय बहुत उपयोगी होता है। हम अपनी सुविधा के अनुसार उन दो संख्याओं को पहले गुणा कर सकते हैं जिनका गुणनफल आसान हो।
- उदाहरण: \(25 \times 7 \times 4\) को \((25 \times 4) \times 7 = 100 \times 7 = 700\) के रूप में हल करना आसान है।
साहचर्य नियम का उपयोग करके गणनाओं को सरल बनाने के तरीके अक्सर पूछे जाते हैं।
पूर्ण संख्याओं का भाग (भाज्य, भाजक, भागफल, शेषफल)
भाग के घटक:
- भाज्य (Dividend): वह संख्या जिसे विभाजित किया जाता है।
- भाजक (Divisor): वह संख्या जिससे विभाजित किया जाता है।
- भागफल (Quotient): विभाजन का परिणाम।
- शेषफल (Remainder): वह संख्या जो विभाजन के बाद बच जाती है यदि विभाजन पूर्ण न हो।
विभाज्यता का संबंध:
- यह भाग की प्रक्रिया का एक मौलिक सिद्धांत है।
- सूत्र: भाज्य = (भाजक \(\times\) भागफल) + शेषफल
- यह सूत्र हमें यह जांचने में मदद करता है कि हमारा विभाजन सही है या नहीं।
उदाहरण: \(21 \div 5\)
- \(21 = 5 \times 4 + 1\)
- यहाँ, भाज्य = 21, भाजक = 5, भागफल = 4, शेषफल = 1।
शेषफल और भाजक का संबंध:
- शेषफल हमेशा भाजक से छोटा होना चाहिए (\(शेषफल < भाजक\))।
- यदि शेषफल भाजक से बड़ा या उसके बराबर होता है, तो इसका मतलब है कि विभाजन की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है और भागफल को एक और बार बढ़ाया जा सकता है।
- यदि शेषफल शून्य हो, तो भाज्य भाजक से पूर्णतः विभाज्य होता है।
भाग के गुणधर्म (पुनरावलोकन):
- संवरक गुण: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए संवरक गुण का पालन नहीं करतीं।
- क्रमविनिमय गुण: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए क्रमविनिमय गुण का पालन नहीं करतीं।
- साहचर्य गुण: पूर्ण संख्याएँ भाग के लिए साहचर्य गुण का पालन नहीं करतीं।
- शून्य का गुण: \(0 \div a = 0\) (जहाँ \(a \neq 0\)), \(a \div 0\) अपरिभाषित है।
विभाज्यता का संबंध: \(भाज्य = (भाजक \times भागफल) + शेषफल\)
पूर्ण संख्या (शून्य के गुण)
शून्य (0) के मुख्य गुणधर्म:
- योज्य तत्समक (Additive Identity):
- किसी भी पूर्ण संख्या में 0 जोड़ने पर संख्या का मान नहीं बदलता।
- \(a + 0 = a\)
- उदाहरण: \(5 + 0 = 5\), \(0 + 7 = 7\)
- घटाव का गुण (Subtraction Property):
- किसी भी पूर्ण संख्या में से 0 घटाने पर संख्या का मान नहीं बदलता।
- \(a - 0 = a\)
- उदाहरण: \(3 - 0 = 3\)
- गुणा का गुण (Multiplication Property):
- किसी भी पूर्ण संख्या को 0 से गुणा करने पर परिणाम हमेशा 0 होता है।
- \(a \times 0 = 0\)
- उदाहरण: \(5 \times 0 = 0\), \(0 \times 10 = 0\)
- भाग का गुण (Division Property):
- 0 को किसी भी गैर-शून्य संख्या से भाग देने पर परिणाम 0 होता है।
- \(0 \div a = 0\) (जहाँ \(a \neq 0\))
- उदाहरण: \(0 \div 5 = 0\)
- किसी भी संख्या को 0 से भाग देना अपरिभाषित है। (\(a \div 0\) अपरिभाषित है)।
- \(0 \div 0\) भी अपरिभाषित है।
शून्य (0) योज्य तत्समक है, जबकि एक (1) गुणन तत्समक है।
किसी भी संख्या को शून्य से भाग देना अपरिभाषित है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम है।