सजीवों के लक्षण एवं वर्गीकरण
यह अध्याय सजीवों और निर्जीवों के बीच के मूलभूत अंतरों को समझाता है। इसमें सजीवों के प्रमुख लक्षण जैसे श्वसन, पोषण, उत्सर्जन, गति, संवेदनशीलता, वृद्धि, प्रजनन और निश्चित जीवनकाल का विस्तृत विवरण दिया गया है। इसके अतिरिक्त, पौधों और जंतुओं के वर्गीकरण के विभिन्न आधारों, जैसे आकार, तने की प्रकृति, जीवन अवधि और मेरुदंड की उपस्थिति पर भी चर्चा की गई है। यह अध्याय जीवधारियों के वैज्ञानिक नामकरण और पौधों तथा जंतुओं के महत्व को भी उजागर करता है, जो छात्रों को अपने आसपास की दुनिया को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है।
सजीवों के लक्षण एवं वर्गीकरण
हमारे आस-पास की दुनिया में अनेक प्रकार की वस्तुएँ पाई जाती हैं। इन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- सजीव (Living Organisms): वे वस्तुएँ जिनमें जीवन के लक्षण पाए जाते हैं, जैसे पेड़-पौधे, जानवर, मनुष्य।
- निर्जीव (Non-living Organisms): वे वस्तुएँ जिनमें जीवन के लक्षण नहीं पाए जाते, जैसे कुर्सी, टेबल, पत्थर, घर।
इन दोनों के बीच का अंतर कुछ विशिष्ट लक्षणों के आधार पर किया जाता है। इन लक्षणों को समझना ही सजीव और निर्जीव में भेद करने का आधार है।
सजीवों के प्रमुख लक्षण:
- श्वसन (Respiration): ऊर्जा प्राप्त करने के लिए गैसों का आदान-प्रदान।
- पोषण (Nutrition): भोजन ग्रहण करना और उसका उपयोग करना।
- उत्सर्जन (Excretion): शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना।
- गति (Movement): एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना या शरीर के अंगों का हिलना।
- संवेदनशीलता (Sensitivity): बाहरी उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया देना।
- वृद्धि (Growth): आकार और द्रव्यमान में वृद्धि।
- प्रजनन (Reproduction): अपने समान नए जीव उत्पन्न करना।
- निश्चित जीवनकाल (Definite Lifespan): जन्म से मृत्यु तक का एक निश्चित समय।
- कोशिकीय संरचना (Cellular Structure): सभी सजीव कोशिकाओं से बने होते हैं।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_chapter_hero] यह चित्र सजीवों के प्रमुख लक्षणों और वर्गीकरण के आधार को दर्शाता है।
सजीवों और निर्जीवों में मुख्य अंतर जीवन प्रक्रियाओं की उपस्थिति और अनुपस्थिति है।
सजीवों में श्वसन होता है
श्वसन वह प्रक्रिया है जिसमें सजीव ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। यह केवल साँस लेना नहीं, बल्कि कोशिकाओं के अंदर होने वाली एक जटिल रासायनिक प्रक्रिया है।
- जन्तुओं में श्वसन: फेफड़े (मनुष्य, स्तनधारी), गलफड़े (मछली), त्वचा (केंचुआ, मेंढक)।
- पौधों में श्वसन: पत्तियों की निचली सतह पर स्थित छोटे छिद्रों (रंध्र) के माध्यम से गैसों का आदान-प्रदान।
श्वसन का महत्व:
- शरीर की सभी जैविक प्रक्रियाओं (वृद्धि, विकास, मरम्मत, गति) के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है।
- भोजन से प्राप्त पोषक तत्वों को ऊर्जा में बदलता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड जैसे अपशिष्ट उत्पादों को शरीर से बाहर निकालता है।
- पौधों में श्वसन दिन-रात होता है, जबकि प्रकाश संश्लेषण केवल दिन में होता है।
क्रियाकलाप-1: बीजों में श्वसन का प्रदर्शन
- उद्देश्य: अंकुरित बीजों में श्वसन दर सूखे बीजों की तुलना में अधिक होती है, यह सिद्ध करना।
- सामग्री: ढक्कन सहित तीन बोतलें (अ, ब, स), रुई, धागा, चने के सूखे बीज, चने के अंकुरित बीज, फिनॉलफ्थेलीन का घोल, कास्टिक सोडा।
- विधि:
- फिनॉलफ्थेलीन के गुलाबी घोल को कास्टिक सोडा मिलाकर तैयार करें (यह घोल कार्बन डाइऑक्साइड के संपर्क में रंगहीन हो जाता है)।
- बोतल 'अ' में सूखे चने के बीज, बोतल 'ब' में अंकुरित चने के बीज और बोतल 'स' खाली रखें।
- गुलाबी घोल में भीगी रुई को धागे से बांधकर तीनों बोतलों में इस तरह लटकाएँ कि धागे का एक सिरा अंदर और दूसरा बाहर रहे।
- बोतलों के ढक्कन कसकर बंद कर दें।
- अवलोकन:
- लगभग 30 मिनट बाद, बोतल 'ब' में लटकी रुई बोतल 'अ' की तुलना में जल्दी रंगहीन हो जाती है।
- बोतल 'अ' और 'स' के अंदर की रुई में रंग परिवर्तन बहुत कम या नहीं होता।
- निष्कर्ष:
- अंकुरित बीज सक्रिय रूप से श्वसन करते हैं, जिससे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है और रुई का रंग जल्दी बदल जाता है।
- सूखे बीजों में श्वसन दर कम होती है।
- यह प्रयोग दर्शाता है कि सजीवों में श्वसन होता है।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t2_scene2] यह चित्र क्रियाकलाप-1 को दर्शाता है।
फिनॉलफ्थेलीन-कास्टिक सोडा घोल: गुलाबी रंग का होता है और कार्बन डाइऑक्साइड के संपर्क में आने पर रंगहीन हो जाता है। यह CO₂ की उपस्थिति का सूचक है।
पौधों में श्वसन दिन और रात दोनों समय होता है, जबकि प्रकाश संश्लेषण केवल दिन के समय होता है।
सजीवों में पोषण, उत्सर्जन और गति
1. पोषण (Nutrition):
- सभी सजीवों को जीवित रहने, बढ़ने और कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा भोजन से मिलती है।
- भोजन ग्रहण करने और उसका उपयोग करने की प्रक्रिया को पोषण कहते हैं।
- पौधे: हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (स्वपोषी)।
- जन्तु: जन्तु अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते। वे भोजन के लिए पौधों या अन्य जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं (परपोषी)।
2. उत्सर्जन (Excretion):
- सजीवों के शरीर में उपापचयी क्रियाओं (मेटाबॉलिक एक्टिविटीज) के परिणामस्वरूप हानिकारक अपशिष्ट पदार्थ बनते हैं।
- इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।
- जन्तुओं में उत्सर्जन: मल, मूत्र, पसीना और कार्बन डाइऑक्साइड।
- पौधों में उत्सर्जन: जलवाष्प (वाष्पोत्सर्जन), कार्बन डाइऑक्साइड, और कुछ विशेष पदार्थ जैसे गोंद।
3. गति (Movement):
- सजीवों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना या शरीर के अंगों का हिलना गति कहलाता है।
- जन्तुओं में गति: चलकर, उड़कर, तैरकर (प्रचलन)।
- पौधों में गति: पौधे एक स्थान पर स्थिर रहते हैं, लेकिन उनके अंग गति करते हैं।
- तना प्रकाश की ओर बढ़ता है।
- जड़ें प्रकाश से दूर और पानी की ओर बढ़ती हैं।
क्रियाकलाप-2: पौधों में गति का प्रदर्शन
- उद्देश्य: पौधे प्रकाश की ओर गति करते हैं, यह सिद्ध करना।
- सामग्री: गमले में लगा पौधा, छेद वाला गत्ते का डिब्बा।
- विधि:
- गमले में लगे पौधे को छेद वाले डिब्बे से ढककर सूर्य के प्रकाश में रखें।
- अवलोकन:
- तीन-चार दिनों के पश्चात् पौधे का तना सूर्य के प्रकाश (छेद) की ओर मुड़ जाता है।
- निष्कर्ष:
- यह दर्शाता है कि पौधों में प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता होती है और वे प्रकाश की ओर गति करते हैं।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t2_scene3] यह चित्र श्वसन के महत्व को दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t3_scene1] यह चित्र पोषण की प्रक्रिया को दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t3_scene2] यह चित्र उत्सर्जन की प्रक्रिया को दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t4_scene2] यह चित्र पौधों में संवेदनशीलता को दर्शाता है।
पौधों में गोंद एक प्रकार का उत्सर्जित पदार्थ है।
जन्तुओं में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को प्रचलन कहते हैं।
सजीवों में संवेदनशीलता और वृद्धि
1. संवेदनशीलता (Sensitivity):
- सजीव अपने आस-पास के वातावरण में होने वाले परिवर्तनों (उद्दीपन) के प्रति प्रतिक्रिया देते हैं। इसे संवेदनशीलता कहते हैं।
- जन्तुओं में संवेदनशीलता:
- गाय का रोटी या घास देखकर पास आना।
- मनपसंद पकवान देखकर मुँह में पानी आना।
- गर्म वस्तु छूने पर हाथ हटा लेना।
- केंचुआ प्रकाश से दूर अंधेरे की ओर जाता है।
- पौधों में संवेदनशीलता:
- कमल का फूल सूर्योदय पर खिलना और सूर्यास्त पर बंद होना (प्रकाश के प्रति)।
- कचनार, इमली की पत्तियों का रात में बंद होना (प्रकाश के प्रति)।
- छुई-मुई (Mimosa pudica) के पौधे की पत्तियों का छूने पर सिकुड़ जाना (स्पर्श के प्रति)।
- तने का प्रकाश की ओर बढ़ना, जड़ों का पानी की ओर बढ़ना (प्रकाश, गुरुत्वाकर्षण, जल के प्रति)।
क्रियाकलाप-3: केंचुए में संवेदनशीलता का प्रदर्शन
- उद्देश्य: केंचुआ प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है, यह सिद्ध करना।
- सामग्री: समव्यास वाली बोतल, रुई, काला कागज, केंचुआ।
- विधि:
- बोतल के आधे भाग पर काला कागज लपेटें (जो खिसक सके)।
- बोतल में एक केंचुआ रखें और मुँह को रुई से बंद कर दें।
- बोतल को सूर्य के प्रकाश में रखें।
- अवलोकन:
- कुछ समय पश्चात् केंचुआ उस हिस्से की ओर जाता है जिस हिस्से में काला कागज लगा है (अंधेरे की ओर)।
- निष्कर्ष:
- केंचुआ प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है और अंधकार की ओर गति करता है।
2. वृद्धि (Growth):
- वृद्धि सजीवों का एक महत्वपूर्ण लक्षण है, जिसमें उनके आकार और द्रव्यमान में वृद्धि होती है।
- यह कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि और उनके आकार में वृद्धि के कारण होती है।
- जन्तुओं में वृद्धि: एक निश्चित आयु तक ही होती है, जिसके बाद रुक जाती है।
- पौधों में वृद्धि: अपने पूरे जीवनकाल में होती रहती है, हालांकि दर भिन्न हो सकती है।
[IMAGE: sensitivity_of_touch_me_not_plant_fig112] यह चित्र छुई-मुई के पौधे में संवेदनशीलता को दर्शाता है। [IMAGE: sensitivity_in_an_earthworm_fig812] यह चित्र केंचुए में संवेदनशीलता को दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t4_scene3] यह चित्र सजीवों में वृद्धि को दर्शाता है।
छुई-मुई का पौधा (Mimosa pudica) स्पर्श के प्रति संवेदनशीलता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
जन्तुओं में वृद्धि एक निश्चित आयु तक होती है, जबकि पौधों में वृद्धि जीवन भर होती रहती है।
सजीवों की कोशिकीय संरचना, प्रजनन और निश्चित जीवनकाल
1. कोशिकीय संरचना (Cellular Structure):
- सभी सजीवों का शरीर छोटी-छोटी इकाइयों से बना होता है जिन्हें कोशिकाएँ कहते हैं।
- कोशिकाएँ जीवन की मूलभूत संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई हैं।
- कुछ जीव केवल एक कोशिका से बने होते हैं (एककोशिकीय), जैसे अमीबा, पैरामीशियम।
- कुछ जीव अरबों कोशिकाओं से बने होते हैं (बहुकोशिकीय), जैसे मनुष्य, पेड़-पौधे।
- कोशिकाएँ इतनी सूक्ष्म होती हैं कि इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) की आवश्यकता होती है।
2. प्रजनन (Reproduction):
- प्रजनन वह प्रक्रिया है जिसमें सजीव अपने समान नए जीव उत्पन्न करते हैं।
- यह प्रजाति के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
- जन्तुओं में प्रजनन:
- बिल्ली के बच्चे होना।
- मुर्गी के अंडों से चूजे निकलना।
- पौधों में प्रजनन:
- बीज उत्पन्न करना, जिनसे नए पौधे उगते हैं।
- कुछ पौधे तने, पत्ती या जड़ से भी प्रजनन करते हैं।
3. निश्चित जीवनकाल (Definite Lifespan):
- प्रत्येक सजीव का जन्म होता है, वह वृद्धि करता है, प्रजनन करता है और अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है।
- जन्म से लेकर मृत्यु तक की इस अवधि को जीवनकाल कहते हैं।
- विभिन्न सजीवों का जीवनकाल भिन्न-भिन्न होता है:
- कुछ कीटों का जीवनकाल कुछ दिनों का।
- कछुए या बरगद के पेड़ का जीवनकाल कई सौ वर्षों का।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t5_scene1] यह चित्र सजीवों की कोशिकीय संरचना को दर्शाता है। [IMAGE: binary_fission_in_amoeba_fig101] यह चित्र अमीबा में प्रजनन (द्विविभाजन) को दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t5_scene3] यह चित्र सजीवों के निश्चित जीवनकाल को दर्शाता है।
कोशिका: जीवन की मूलभूत संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई।
प्रजनन सजीवों का वह लक्षण है जो प्रजाति की निरंतरता सुनिश्चित करता है।
सजीवों में समानताएँ और विविधताएँ
1. सजीवों में समानताएँ:
- सभी सजीवों में कुछ मूलभूत समानताएँ पाई जाती हैं, चाहे वे पौधे हों या जन्तु।
- कोशिकीय संरचना: सभी का शरीर कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।
- जैविक क्रियाएँ: गति, प्रचलन, वृद्धि, पोषण, श्वसन, परिसंचरण, प्रजनन आदि क्रियाएँ समान रूप से चलती हैं।
- जीवन चक्र: सभी का एक निश्चित जीवन चक्र होता है (जन्म, वृद्धि, प्रजनन, मृत्यु)।
2. सजीवों में विविधताएँ:
- इन समानताओं के बावजूद, सजीवों में उनके वातावरण के कारण कुछ विभिन्नताएँ भी दिखाई देती हैं।
- प्रचलन में विविधता:
- स्थलीय जन्तुओं में प्रचलन पैरों द्वारा।
- जलीय जन्तुओं (जैसे मछली) में फिन्स द्वारा।
- पक्षियों में पंखों द्वारा।
- आकार में विविधता:
- कुछ जीव बहुत सूक्ष्म होते हैं (जैसे सूक्ष्म जीव - स्पाइरोगायरा, पैरामीशियम, यूग्लीना)।
- कुछ बहुत बड़े होते हैं (जैसे हाथी, ब्लू व्हेल)।
- पौधों के फूल और बीज भी आकार में बहुत भिन्न होते हैं।
क्रियाकलाप-4: सूक्ष्म जीवों का अवलोकन
- उद्देश्य: तालाब के पानी में सूक्ष्म जीवों का अवलोकन करना।
- सामग्री: तालाब या पोखर का पानी, काँच की स्लाइड, सूक्ष्मदर्शी यंत्र।
- विधि:
- तालाब के पानी की एक बूँद काँच की स्लाइड पर रखें।
- इसे सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से देखें।
- अवलोकन:
- कुछ हिलती-डुलती आकृतियाँ दिखाई देती हैं।
- निष्कर्ष:
- ये जल में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव हैं जैसे स्पाइरोगायरा, पैरामीशियम, यूग्लीना।
[IMAGE: some_common_protozoa_fig122] यह चित्र कुछ सामान्य प्रोटोजोआ (सूक्ष्म जीव) को दर्शाता है। [IMAGE: chlamydomonas_fig714] यह चित्र क्लैमाइडोमोनस (एककोशिकीय शैवाल) को दर्शाता है।
ब्लू व्हेल पृथ्वी पर पाया जाने वाला सबसे बड़ा जन्तु है, जिसका भार तीस वयस्क हाथियों के बराबर हो सकता है।
भोजन और आवास के आधार पर विविधता
1. भोजन में विविधता:
- सजीवों को उनके भोजन प्राप्त करने के तरीके के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
- पौधों में:
- स्वपोषी (Autotrophs): जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं (जैसे हरे पौधे)।
- परजीवी (Parasites): जो दूसरे जीवित पौधों से भोजन प्राप्त करते हैं (जैसे अमरबेल)। [IMAGE: cuscuta_amarbel_on_a_host_plant_fig113a]
- मृतोपजीवी (Saprophytes): जो मृत एवं सड़े-गले पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं (जैसे कुकुरमुत्ता, फफूंद)। [IMAGE: mushroom_saprophyte_figp8], [IMAGE: types_of_fungi_rhizopus_penicillium_and_aspergillus_fig106b]
- कीटभक्षी (Insectivorous): जो स्वपोषी होते हुए भी कीटों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं (जैसे कलश पादप (Pitcher Plant))। [IMAGE: pitcher_plant_fig131]
- जन्तुओं में:
- शाकाहारी (Herbivores): जो केवल पौधे या पौधों के उत्पाद खाते हैं (जैसे गाय, बकरी, हिरण)।
- मांसाहारी (Carnivores): जो अन्य जन्तुओं का मांस खाते हैं (जैसे शेर, बाघ, बाज)।
- सर्वाहारी (Omnivores): जो पौधे और जन्तु दोनों खाते हैं (जैसे मनुष्य, भालू, कौआ)।
2. आवास के आधार पर विविधता:
- सजीवों को उनके रहने के स्थान (आवास) के आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है।
- स्थलीय जन्तु एवं पौधे (Terrestrial): जो भूमि पर पाए जाते हैं (जैसे गुलाब, मनुष्य, घोड़ा, नीम)।
- जलीय जन्तु एवं पौधे (Aquatic): जो जल में पाए जाते हैं (जैसे मछली, कमल, जलकुम्भी)।
- जलीय जन्तुओं का आकार नौकाकार हो सकता है (जैसे मछली)।
- कुछ के पैरों में पाद जाल होता है (जैसे मेंढक, बत्तख)। [IMAGE: floating_brahminy_duck_fig517]
- जलीय पौधों की जड़ों एवं तनों में हवा से भरी विशेष संरचनाएँ होती हैं जो उन्हें तैरने में मदद करती हैं (जैसे जलकुम्भी)।
- मरुस्थलीय जन्तु एवं पौधे (Xerophytic): जो रेगिस्तान जैसे शुष्क और गर्म वातावरण में पाए जाते हैं (जैसे ऊँट, नागफनी)।
- ऊँट के पैर के तलवे गद्दीदार होते हैं।
- नागफनी का तना मांसल होता है और पत्तियाँ काँटों में बदल जाती हैं।
- उभयचर (Amphibious): ऐसे जन्तु जो जल एवं स्थल दोनों में पाए जाते हैं (जैसे मेंढक, मगर, कछुआ)।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t7_scene2] यह चित्र भोजन के आधार पर वर्गीकरण को दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t7_scene3] यह चित्र आवास के आधार पर विविधता को दर्शाता है।
परजीवी: वे जीव जो भोजन के लिए दूसरे जीवित जीवों पर निर्भर रहते हैं। मृतोपजीवी: वे जीव जो मृत और सड़े-गले पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं।
मरुस्थलीय पौधों में पत्तियाँ काँटों में रूपांतरित हो जाती हैं ताकि पानी का नुकसान कम हो।
वर्गीकरण की आवश्यकता और पौधों का वर्गीकरण
1. वर्गीकरण की आवश्यकता:
- पृथ्वी पर असंख्य प्रकार के जीव पाए जाते हैं, जिनकी संरचना, आकार, रंग और जीवनशैली में बहुत भिन्नता होती है।
- इन सभी जीवों का अलग-अलग अध्ययन करना बहुत कठिन और समय लेने वाला कार्य है।
- अध्ययन को सरल बनाने के लिए, जीवों को उनके समान गुणों के आधार पर अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है। इस प्रक्रिया को वर्गीकरण कहते हैं।
- वर्गीकरण से किसी एक समूह के जीव का अध्ययन करने पर उस समूह के अन्य जीवों की भी सामान्य जानकारी मिल जाती है।
2. पौधों का वर्गीकरण:
- पौधों को उनके आकार, तने की प्रकृति और जीवन अवधि के आधार पर चार मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
- शाक (Herb):
- छोटे आकार के पौधे।
- तना मुलायम, हरा और कमजोर।
- जीवनकाल एक वर्ष से अधिक नहीं (एकवर्षीय)।
- उदाहरण: धनिया, गेहूँ, धान, सरसों।
- झाड़ी (Shrub):
- मध्यम ऊँचाई के पौधे।
- तना शाक की तुलना में अधिक कड़ा, आधार से अनेक शाखाएँ निकलती हैं।
- जीवनकाल एक से अधिक वर्षों का (बहुवर्षीय)।
- उदाहरण: गुलाब, बेशरम, बेर।
- वृक्ष (Tree):
- ऊँचे और बड़े आकार के पौधे।
- तना मोटा, बहुत कड़ा (काष्ठीय) और स्पष्ट मुख्य तना।
- बहुवर्षीय पौधे।
- उदाहरण: आम, इमली, बरगद, पीपल, नीम।
- आरोही (Climber/लता):
- तना लम्बा किन्तु कमजोर होता है।
- किसी आधार के सहारे ऊपर चढ़ते हैं।
- जीवनकाल एकवर्षीय, द्विवर्षीय या बहुवर्षीय हो सकता है।
- उदाहरण: मटर, लौकी, तुरई, कुम्हड़ा, बोगनविलिया।
पौधों के वर्गीकरण का एक अन्य आधार: पोषण
- पौधों को उनके पोषण के तरीके के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है (जैसा कि t7 में पढ़ा):
- स्वपोषी (अपना भोजन स्वयं बनाते हैं)।
- परजीवी (दूसरे पौधों से भोजन लेते हैं, जैसे अमरबेल)।
- मृतोपजीवी (मृत और सड़े-गले पदार्थों से भोजन लेते हैं, जैसे कुकुरमुत्ता)।
- कीटभक्षी (कीटों को खाते हैं, जैसे कलश पादप)।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t8_scene1] यह चित्र वर्गीकरण की आवश्यकता को दर्शाता है। [IMAGE: types_of_plants_fig1011] यह चित्र पौधों के विभिन्न प्रकारों को दर्शाता है। [IMAGE: sugarcane_plant_fig97] यह चित्र गन्ने के पौधे को दर्शाता है, जिसमें तने की विशेषताएँ दिखती हैं।
पौधों के वर्गीकरण के आधार और उनके उदाहरण अक्सर पूछे जाते हैं। शाक, झाड़ी, वृक्ष और आरोही के बीच के अंतर को याद रखें।
जन्तुओं का वर्गीकरण: कशेरुकी और अकशेरुकी
जन्तुओं का वर्गीकरण:
- जन्तुओं का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जा सकता है, जिनमें से एक महत्वपूर्ण आधार है मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) की उपस्थिति या अनुपस्थिति।
मेरुदण्ड को पहचानना:
- मेरुदण्ड, जिसे रीढ़ की हड्डी या कशेरुकदण्ड भी कहते हैं, सिर के नीचे से शुरू होकर कमर के नीचे तक जाने वाली एक लंबी हड्डी होती है।
- यह अनेक छोटी-छोटी हड्डियों (कशेरुकाओं) से मिलकर बनी होती है।
- यह शरीर को सहारा प्रदान करती है और उसे सीधा रखने में मदद करती है।
कशेरुकी और अकशेरुकी जन्तु:
- कशेरुकी जन्तु (Vertebrates):
- वे जन्तु जिनमें मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) पाई जाती है।
- पहचान के लक्षण:
- शरीर में अगली व पिछली टाँगें या पंख होते हैं।
- पूँछ भी हो सकती है।
- पीठ पर हाथ फेर कर रीढ़ की हड्डी का अनुभव किया जा सकता है।
- शरीर के किसी भी भाग में हड्डी होने पर कशेरुकदण्ड अवश्य होता है।
- उदाहरण: मछली, छिपकली, पक्षी, मेंढक, मनुष्य, गाय, शेर, साँप, कछुआ।
- उप-वर्गीकरण (कशेरुकी जन्तुओं के):
- मछली: जलीय, अण्डे देने वाले।
- मेंढक के समान (उभयचर): स्थल व जल दोनों पर, अण्डे देने वाले, शरीर पर शल्क नहीं।
- सर्प के समान (सरीसृप): शरीर शल्कों से ढका, अण्डे देने वाले।
- पक्षी: शरीर पंखों से ढका, अण्डे देने वाले।
- स्तनधारी: शरीर बालों से ढका, बच्चों को जन्म देने वाले।
- अकशेरुकी जन्तु (Invertebrates):
- वे जन्तु जिनमें मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) नहीं पाई जाती।
- पहचान के लक्षण:
- इनका शरीर प्रायः नरम होता है।
- कुछ का शरीर गोल खंडों में बंटा होता है (जैसे केंचुआ)।
- उदाहरण: कनखजूरा, केंचुआ, सीप, जोंक, बिच्छू, केंकड़ा, घोंघा, मधुमक्खी, तितली, काकरोच, मकड़ी।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t9_scene1] यह चित्र मेरुदण्ड को पहचानना दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t9_scene2] यह चित्र कशेरुकी और अकशेरुकी जन्तुओं को दर्शाता है। [IMAGE: different_shapes_of_bacteria_fig107] यह चित्र बैक्टीरिया के विभिन्न आकारों को दर्शाता है।
कशेरुका छोटी-छोटी हड्डियाँ होती हैं जिनसे मेरुदण्ड बना होता है।
याद रखें, सभी जन्तु जिनमें हड्डी होती है, वे कशेरुकी होते हैं, लेकिन जिनके शरीर में कोई हड्डी नहीं होती, वे अकशेरुकी होते हैं।
जीवधारियों के वैज्ञानिक नाम
1. नामों की विविधता की समस्या:
- दुनिया भर में एक ही जीवधारी के लिए अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम होते हैं।
- उदाहरण: आम को अंग्रेजी में 'मैंगो', तमिल में 'मंगस', छत्तीसगढ़ी में 'आमा' कहते हैं।
- यह विविधता वैज्ञानिक अध्ययन और संचार में भ्रम पैदा करती है।
2. वैज्ञानिक नामकरण की आवश्यकता:
- वैज्ञानिक अध्ययन के लिए यह आवश्यक है कि पूरे संसार में किसी एक जीवधारी के लिए एक ही सार्वभौमिक नाम हो।
3. द्विपद नामकरण पद्धति (Binomial Nomenclature):
- स्वीडन के वैज्ञानिक केरोलस लिनियस (1707-1778) ने यह पद्धति विकसित की।
- इस पद्धति के अनुसार, प्रत्येक जीवधारी को एक वैज्ञानिक नाम दिया जाता है जिसके दो भाग होते हैं:
- पहला भाग: वंश (Genus) का नाम।
- दूसरा भाग: जाति (Species) का नाम।
- यह प्रणाली जीवधारियों की पहचान को सार्वभौमिक और सटीक बनाती है।
4. वैज्ञानिक नामों के उदाहरण:
- आम: मेंगीफेरा इण्डिका (Mangifera indica)
- मेंगीफेरा = वंश का नाम
- इण्डिका = जाति का नाम
- तेंदुआ: पेंथरा पारडस (Panthera pardus)
- बाघ: पेंथरा टाइग्रिस (Panthera tigris)
- सिंह: पेंथरा लियो (Panthera leo)
- ये उदाहरण दर्शाते हैं कि तेंदुआ, बाघ और सिंह एक ही वंश 'पेंथरा' के सदस्य होने के कारण आपस में मिलते-जुलते और संबंधित जन्तु हैं।
- मनुष्य: होमो सेपियन्स (Homo sapiens)
- मेंढक: राना टिग्रीना (Rana tigrina)
- गुलाब: रोजा इंडिका (Rosa indica)
- चूहा: रेटस रेटस (Rattus rattus)
छत्तीसगढ़ के राज्य प्रतीक:
- राज्य पक्षी: पहाड़ी मैना (ग्रेकुला रिलिजिओसा पेनिनसुलेरिस) [IMAGE: pahari_mynah_fig625]
- राज्य पशु: वन भैंसा (ब्यूबेलस ब्यूबेलिस) [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t10_scene3]
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t10_scene1] यह चित्र नामों की विविधता को दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch07_t10_scene2] यह चित्र वैज्ञानिक नामकरण की आवश्यकता को दर्शाता है।
द्विपद नामकरण: जीवधारियों को दो भागों (वंश और जाति) वाले वैज्ञानिक नाम देने की पद्धति।
केरोलस लिनियस को 'आधुनिक वर्गीकरण विज्ञान का जनक' कहा जाता है।
पौधों और जन्तुओं का महत्व
पौधे और जन्तु मिलकर एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं, जहाँ सभी सजीव एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। हमारे जीवन में इनका अत्यधिक महत्व है।
1. पौधों का महत्व:
- खाद्य पदार्थ: गेहूँ, मक्का, दाल, शक्कर, तेल, फल, सब्जियाँ। [IMAGE: root_vegetables_fig418]
- मसाले: सरसों, धनिया, सौंफ, हल्दी, जीरा, मेथी।
- औषधि: तुलसी, बेलाडोना, सिनकोना।
- पेय पदार्थ: चाय, कॉफी।
- रेशे: कपास, पटसन, सन (कपड़े, रस्सी बनाने में)।
- ईंधन: लकड़ी।
- कागज उद्योग: बाँस।
- उद्योग धंधे: रेजिन, राल, रबर (टायर, ट्यूब)।
- पर्यावरण शुद्धिकरण: प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन का उत्पादन और कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण, जिससे वायु शुद्ध होती है।
- तेल: अंडी, मूँगफली, आंवला, नीम।
2. जन्तुओं का महत्व:
- खाद्य पदार्थ: दूध, घी, मांस, अण्डे, मक्खन, दही।
- यातायात: घोड़े, ऊँट, खच्चर, हाथी (भार ढोने और परिवहन में)।
- चमड़ा उद्योग: मरे पशुओं की खाल (चमड़ा बनाने में)।
- ऊन: भेड़, याक से प्राप्त।
- शहद, मोम: मधुमक्खी से प्राप्त।
- परागण: कीट और पक्षी पौधों में परागण में मदद करते हैं।
- बीज फैलाव: जन्तु बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाने में मदद करते हैं।
- जैविक नियंत्रण: कुछ जन्तु हानिकारक कीटों को खाकर फसलों की रक्षा करते हैं।
[IMAGE: cg_c6_science_ch07_t11_scene3] यह चित्र जीवन के लिए पौधों और जन्तुओं की अनिवार्यता को दर्शाता है। [IMAGE: bread_with_fungus_fig619] यह चित्र कवक (मृतोपजीवी) के महत्व को दर्शाता है।
पौधे प्राथमिक उत्पादक होते हैं, जो सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके भोजन बनाते हैं और खाद्य श्रृंखला का आधार होते हैं।
जन्तु और पौधे दोनों ही पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।