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सजीवों की संरचना और कार्य II
Chhattisgarh · Class 6 · 🔬 Science · Chapter 9

सजीवों की संरचना और कार्य II

पाचन तंत्रपरिसंचरण तंत्रश्वसन तंत्रउत्सर्जन तंत्रतंत्रिका तंत्रप्रजनन तंत्र

अध्याय 'सजीवों की संरचना और कार्य II' मानव शरीर की जटिल अंग प्रणालियों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। छात्र पाचन तंत्र के अंगों और उनके कार्यों, परिसंचरण तंत्र में रक्त के प्रवाह, श्वसन तंत्र द्वारा ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के आदान-प्रदान, उत्सर्जन तंत्र द्वारा अपशिष्ट पदार्थों के निष्कासन, तंत्रिका तंत्र के समन्वयकारी कार्यों और प्रजनन तंत्र की भूमिका के बारे में सीखते हैं। यह अध्याय शरीर के स्वस्थ रहने के लिए इन सभी प्रणालियों के तालमेल के महत्व पर भी प्रकाश डालता है।

मनुष्य के शरीर की संरचना और कार्य

मनुष्य का शरीर अनेक अंगों से मिलकर बना है। ये अंग मिलकर अंग तंत्र बनाते हैं।

  • अंग तंत्र: विभिन्न अंगों का समूह जो किसी विशिष्ट कार्य को संपन्न करने के लिए मिलकर कार्य करता है।
  • समन्वय: सभी अंग तंत्र एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करते हैं ताकि शरीर की सभी क्रियाएँ सुचारु रूप से चल सकें।
  • उदाहरण: पाचन तंत्र भोजन को पचाता है, परिसंचरण तंत्र पोषक तत्वों को पूरे शरीर में पहुँचाता है, और श्वसन तंत्र ऑक्सीजन प्रदान करता है। इन सभी के बीच तालमेल आवश्यक है।

[IMAGE: cg_c6_science_ch09_chapter_hero] यह चित्र अध्याय के मुख्य विषयों का एक अवलोकन प्रस्तुत करता है।

शरीर के प्रमुख अंग तंत्र:

  1. पाचन तंत्र: भोजन का पाचन और अवशोषण।
  2. परिसंचरण तंत्र: रक्त का संचार, पोषक तत्वों और ऑक्सीजन का परिवहन।
  3. श्वसन तंत्र: गैसों का आदान-प्रदान (ऑक्सीजन लेना, कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ना)।
  4. उत्सर्जन तंत्र: अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना।
  5. कंकाल तंत्र: शरीर को सहारा और आकार प्रदान करना, अंगों की सुरक्षा।
  6. तंत्रिका तंत्र: शरीर की क्रियाओं का समन्वय और नियंत्रण।
  7. प्रजनन तंत्र: नए जीवों को उत्पन्न करना।

इन सभी तंत्रों का सुचारु रूप से कार्य करना स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है।

महत्त्वपूर्ण

सभी अंग तंत्रों के बीच तालमेल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

9.1 पाचन तंत्र

सभी सजीवों को जीवित रहने और कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो उन्हें भोजन से प्राप्त होती है।

पाचन तंत्र के कार्य:

  • भोजन को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ना।
  • पोषक तत्वों को अवशोषित करना।
  • अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना।

पाचन की प्रक्रिया के चरण:

  1. अंतर्ग्रहण: भोजन को मुख द्वारा ग्रहण करना।
  2. पाचन: जटिल भोजन पदार्थों को सरल रूपों में तोड़ना।
  3. अवशोषण: पचे हुए पोषक तत्वों को रक्त में मिलाना।
  4. बहिष्करण: बिना पचे भोजन को शरीर से बाहर निकालना।

पाचन तंत्र के प्रमुख अंग:

  • मुख: भोजन का अंतर्ग्रहण, चबाना (दाँतों द्वारा), लार मिलाना (लार ग्रंथियों द्वारा)।
  • ग्रसनी: भोजन को ग्रासनली तक पहुँचाना।
  • ग्रासनली: भोजन को ग्रसनी से आमाशय तक ले जाना।
  • आमाशय: भोजन का आंशिक पाचन, पाचक रसों का स्राव।
  • आँत (छोटी आँत और बड़ी आँत):
  • छोटी आँत: अधिकांश पाचन और पोषक तत्वों का अवशोषण।
  • बड़ी आँत: जल का अवशोषण और अपचित भोजन का संग्रहण।
  • मलाशय: अपशिष्ट पदार्थों का अस्थायी संग्रहण।
  • मलद्वार: अपशिष्ट पदार्थों का शरीर से निष्कासन।

पाचक ग्रंथियाँ:

  • लार ग्रंथियाँ: लार का स्राव करती हैं, जिसमें एंजाइम होते हैं जो कार्बोहाइड्रेट का पाचन शुरू करते हैं।
  • यकृत: पित्त रस का उत्पादन करता है जो वसा के पाचन में मदद करता है।
  • पित्ताशय: पित्त रस का संग्रहण करता है।
  • अग्नाशय: अग्नाशयी रस का स्राव करता है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा को पचाने वाले एंजाइम होते हैं।

मुखगुहा में लार का कार्य:

  • भोजन को चिकना बनाना ताकि उसे आसानी से निगला जा सके।
  • भोजन में मौजूद स्टार्च का पाचन शुरू करना।
  • मुख को नम रखना और दाँतों को साफ रखना।

[IMAGE: cg_c6_science_ch09_t2_scene2] पाचन तंत्र अंगों का एक समूह है जो भोजन को तोड़ने, पोषक तत्वों को अवशोषित करने और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t2_scene3] पाचन अंग और पाचक ग्रंथियाँ मिलकर पाचन क्रिया को संपन्न करती हैं।

डॉक्टर बोमोन का प्रयोग (खिड़की वाले पेट की कहानी):

  • मार्टिन नामक सैनिक के पेट में गोली लगने से छेद हो गया था।
  • डॉक्टर बोमोन ने इस छेद का उपयोग करके पाचन प्रक्रिया का अध्ययन किया।
  • उन्होंने पाया कि पेट में पाचक रस होते हैं जो भोजन को पचाते हैं, और यह प्रक्रिया पेट के बाहर भी हो सकती है।
  • यह दर्शाता है कि पाचन एक रासायनिक क्रिया है।
📖परिभाषा

पाचन: भोजन का ऐसे पदार्थों में बदलना जो शरीर द्वारा उपयोग में लाए जा सकें।

महत्त्वपूर्ण

आहार नली मुख द्वार से मल द्वार तक फैली होती है।

चित्र 9.2 विभिन्न प्रकार के दाँत

दाँत पाचन तंत्र का पहला और महत्वपूर्ण अंग हैं। ये भोजन को यांत्रिक रूप से छोटे टुकड़ों में तोड़ने का कार्य करते हैं।

दाँतों के प्रकार और उनके कार्य: मनुष्य के मुख में चार प्रकार के दाँत होते हैं:

  1. कृन्तक (Incisors):
  • आकृति: छेनी के समान, सपाट।
  • कार्य: भोजन को काटने या कुतरने का कार्य।
  • स्थिति: सबसे आगे के दाँत।
  • संख्या: ऊपरी जबड़े में 4, निचले जबड़े में 4 (कुल 8)।
  1. रदनक (Canines):
  • आकृति: नुकीले।
  • कार्य: भोजन को चीरने या फाड़ने का कार्य।
  • स्थिति: कृन्तक के बगल में।
  • संख्या: ऊपरी जबड़े में 2, निचले जबड़े में 2 (कुल 4)।
  1. अग्रचर्वणक (Premolars):
  • आकृति: चक्की के समान, चौड़े और सपाट।
  • कार्य: भोजन को चबाने और पीसने का कार्य।
  • स्थिति: रदनक के पीछे।
  • संख्या: ऊपरी जबड़े में 4, निचले जबड़े में 4 (कुल 8)।
  1. चर्वणक (Molars):
  • आकृति: चक्की के समान, सबसे चौड़े और सपाट।
  • कार्य: भोजन को बारीक पीसने का कार्य।
  • स्थिति: अग्रचर्वणक के पीछे, सबसे पीछे के दाँत।
  • संख्या: ऊपरी जबड़े में 6, निचले जबड़े में 6 (कुल 12)।

दाँतों का महत्व और देखभाल:

  • दाँत भोजन के प्रारंभिक पाचन के लिए आवश्यक हैं।
  • स्वस्थ दाँत बेहतर पाचन और पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं।
  • देखभाल: नियमित ब्रश करना, मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना, दाँतों को स्वस्थ रखता है।

[IMAGE: cg_c6_science_ch09_t2_scene4] दाँतों की विविधता हमें विभिन्न प्रकार के भोजन को कुशलता से चबाने में मदद करती है। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t3_scene3] मानव के दाँत चार मुख्य प्रकार के होते हैं: कृन्तक, रदनक, अग्रचर्वणक और चर्वणक। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t3_scene4] दाँतों की उचित देखभाल उन्हें स्वस्थ रखने और बीमारियों से बचाने के लिए महत्वपूर्ण है।

महत्त्वपूर्ण

मनुष्य में दाँत दो बार निकलते हैं: दूध के दाँत और स्थायी दाँत। वयस्कों में 32 स्थायी दाँत होते हैं।

चित्र 9.3 जीभ के विभिन्न क्षेत्र

जीभ एक पेशीय अंग है जो मुख गुहा में स्थित होती है। यह भोजन को चबाने और निगलने में मदद करती है, लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण कार्य स्वाद का पता लगाना है।

जीभ की संरचना:

  • जीभ की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे उभार होते हैं जिन्हें पैपिला कहते हैं।
  • इन्हीं पैपिला के भीतर स्वाद कलिकाएँ (Taste buds) स्थित होती हैं।
  • एक वयस्क मनुष्य की जीभ पर लगभग 2,000 से 8,000 स्वाद कलिकाएँ होती हैं।
  • प्रत्येक स्वाद कलिका में 50 से 100 स्वाद कोशिकाएँ होती हैं।

स्वाद कलिकाओं के कार्य:

  • स्वाद कोशिकाएँ भोजन में मौजूद रासायनिक अणुओं के संपर्क में आती हैं।
  • ये तंत्रिका आवेग उत्पन्न करती हैं, जिन्हें मस्तिष्क स्वाद के रूप में व्याख्या करता है।
  • जीभ मुख्य रूप से पाँच मूल स्वादों का पता लगाती है:
  1. मीठा: जीभ के अग्र भाग पर अधिक संवेदनशील। (ऊर्जा से भरपूर खाद्य पदार्थों का संकेत)
  2. नमकीन: जीभ के अग्र-पार्श्व भागों पर।
  3. खट्टा: जीभ के पार्श्व भागों पर।
  4. कड़वा: जीभ के पश्च भाग पर अधिक संवेदनशील। (संभावित हानिकारक पदार्थों का संकेत)
  5. उमामी: एक प्रकार का स्वादिष्ट स्वाद, प्रोटीन युक्त भोजन में पाया जाता है।

[IMAGE: cg_c6_science_ch09_t4_scene1] जीभ हमें अपने आस-पास के वातावरण को समझने में मदद करती है। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t4_scene2] जीभ की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे उभार होते हैं जिन्हें 'पैपिला' कहते हैं। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t4_scene3] स्वाद कलिकाएँ मुख्य रूप से पाँच मूल स्वादों का पता लगाती हैं।

महत्त्वपूर्ण

यद्यपि जीभ के विभिन्न क्षेत्र कुछ स्वादों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, लेकिन प्रत्येक स्वाद कलिका सभी स्वादों का पता लगा सकती है

9.2 परिसंचरण तंत्र

परिसंचरण तंत्र शरीर में रक्त के प्रवाह को नियंत्रित करता है, जो ऑक्सीजन, पोषक तत्वों और अन्य आवश्यक पदार्थों को शरीर के सभी अंगों तक पहुँचाता है, और अपशिष्ट पदार्थों को उत्सर्जी अंगों तक ले जाता है।

परिसंचरण तंत्र के प्रमुख अंग:

  1. हृदय (Heart):
  • परिसंचरण तंत्र का प्रमुख अंग
  • वक्ष गुहा में थोड़ा बाईं ओर स्थित होता है।
  • रक्त को पूरे शरीर में पंप करने का कार्य करता है।
  • इसकी धड़कन (संकुचन और शिथिलन) रक्त को आगे बढ़ाती है।
  • सामान्यतः, एक स्वस्थ व्यक्ति का हृदय प्रति मिनट 72-80 बार धड़कता है। शारीरिक गतिविधि से यह दर बढ़ जाती है।
  1. रक्त वाहिनियाँ (Blood Vessels):
  • रक्त को पूरे शरीर में ले जाने वाली नलिकाएँ।
  • धमनियाँ (Arteries):
  • हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के सभी अंगों तक ले जाती हैं।
  • गहराई में स्थित होती हैं।
  • इनमें रक्त का दबाव अधिक होता है।
  • शिराएँ (Veins):
  • शरीर के अंगों से कार्बन डाइऑक्साइड युक्त (अनऑक्सीजनित) रक्त को हृदय तक वापस लाती हैं।
  • त्वचा के नीचे हरापन लिए हुए नीली दिखाई देती हैं।
  • इनमें रक्त का दबाव कम होता है।
  • रक्त केशिकाएँ (Blood Capillaries):
  • धमनियों और शिराओं को जोड़ने वाला सूक्ष्म नलिकाओं का जाल
  • इनके माध्यम से कोशिकाओं और रक्त के बीच पोषक तत्वों, ऑक्सीजन और अपशिष्ट पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।

रक्त का मार्ग:

  • शिराओं द्वारा अनऑक्सीजनित रक्त हृदय में आता है।
  • हृदय से यह रक्त फेफड़ों में जाता है, जहाँ यह ऑक्सीजन युक्त होता है।
  • ऑक्सीजन युक्त रक्त वापस हृदय में आता है।
  • हृदय इस ऑक्सीजन युक्त रक्त को धमनियों द्वारा शरीर के सभी अंगों में पंप करता है।

[IMAGE: blood_circulation_fig912] रक्त परिसंचरण का ऊर्ध्वाधर लेबल युक्त आरेख। [IMAGE: components_of_blood_fig617] रक्त के घटकों का लेबल युक्त चित्र। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t5_scene1] चोट लगने पर रक्त वाहिनियों के कटने से रक्त बाहर निकलता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t5_scene4] हृदय की धड़कन हृदय के संकुचन और शिथिलन के कारण उत्पन्न होती है।

महत्त्वपूर्ण

रक्त का मुख्य कार्य ऑक्सीजन, पोषक तत्वों, हार्मोन और अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करना है।

9.3 श्वसन तंत्र

श्वसन तंत्र वह तंत्र है जो शरीर में गैसों के आदान-प्रदान के लिए जिम्मेदार होता है, यानी ऑक्सीजन लेना और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ना।

श्वसन की प्रक्रिया:

  1. निःश्वसन (साँस लेना):
  • हवा (ऑक्सीजन सहित) नाक और श्वासनली से होती हुई फेफड़ों में जाती है।
  • इस क्रिया में डायफ्राम नीचे की ओर खींचता है और पसलियाँ ऊपर व बाहर की ओर गति करती हैं, जिससे वक्ष गुहा का आयतन बढ़ता है।
  • वायुमंडलीय दाब से फेफड़ों में दाब कम होने के कारण हवा अंदर आती है।
  1. उच्छ्वसन (साँस छोड़ना):
  • हवा (कार्बन डाइऑक्साइड सहित) फेफड़ों से बाहर निकलती है।
  • इस क्रिया में डायफ्राम ऊपर की ओर उठता है और पसलियाँ नीचे व अंदर की ओर गति करती हैं, जिससे वक्ष गुहा का आयतन घटता है।
  • फेफड़ों में दाब वायुमंडलीय दाब से अधिक होने के कारण हवा बाहर निकलती है।

श्वसन तंत्र के प्रमुख अंग:

  • नासा छिद्र (Nostrils): हवा का प्रवेश द्वार। नाक में बाल और श्लेष्मा धूल और कीटाणुओं को रोकते हैं।
  • श्वासनली (Windpipe/Trachea): हवा को नासा छिद्र से फेफड़ों तक ले जाने वाली नली।
  • फेफड़े (Lungs): वक्ष गुहा में स्थित, गैसों के आदान-प्रदान का मुख्य स्थल।
  • डायफ्राम (Diaphragm):
  • शरीर के अंदर पेट और छाती के मध्य स्थित पेशियों से बना पर्दा
  • श्वसन क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके संकुचन और शिथिलन से वक्ष गुहा का आयतन बदलता है।

रक्त की भूमिका:

  • फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के सभी अंगों तक ले जाता है।
  • अंगों से कार्बन डाइऑक्साइड को फेफड़ों तक वापस लाता है।

मुँह से साँस क्यों नहीं लेनी चाहिए?

  • नाक में मौजूद बाल और श्लेष्मा हवा को छानते हैं और गर्म व नम करते हैं।
  • मुँह से साँस लेने पर धूल, कीटाणु और ठंडी/सूखी हवा सीधे फेफड़ों में जा सकती है, जिससे संक्रमण या जलन हो सकती है।

[IMAGE: the_mechanism_of_breathing_inhalation_and_exhalation_fig523] श्वसन की क्रियाविधि का दो भागों वाला तुलनात्मक चित्र। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t6_scene3] श्वसन क्रिया के यांत्रिक पहलू को समझने में मदद करता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t6_scene4] फिनॉलफ्थलीन का गुलाबी रंग गायब होना कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति दर्शाता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t7_scene3] डायफ्राम के कार्य को मॉडल द्वारा समझाया गया है।

महत्त्वपूर्ण

हमारी नाक में छोटे-छोटे बाल व चिपचिपा श्लेष्मा पाया जाता है जो धूल व कीटाणुओं को आंतरिक अंगों तक जाने से रोकता है

💡सुझाव

श्वसन क्रिया में डायफ्राम की भूमिका को समझने के लिए मॉडल वाले क्रियाकलाप को ध्यान से पढ़ें। यह अवधारणात्मक समझ के लिए महत्वपूर्ण है।

श्वसन क्रिया में डायफ्रॉम की भूमिका

श्वसन क्रिया में डायफ्राम की भूमिका (मॉडल द्वारा): यह मॉडल श्वसन प्रक्रिया के यांत्रिक पहलू को समझने में मदद करता है।

मॉडल के घटक और उनकी तुलना शरीर के अंगों से:

  • बोतल: हमारे सीने की गुहा (Chest cavity) का प्रतिनिधित्व करती है।
  • छोटा गुब्बारा: फेफड़े का प्रतिनिधित्व करता है।
  • नीचे बंधा गुब्बारा (कटा हुआ): डायफ्राम का प्रतिनिधित्व करता है।
  • नली का बाहरी मुँह: नाक का प्रतिनिधित्व करता है।
  • नली का लंबा भाग: श्वासनली का प्रतिनिधित्व करता है।

क्रियाविधि:

  1. डायफ्राम को नीचे खींचना (निःश्वसन):
  • जब बोतल की पेंदी पर बंधे गुब्बारे (डायफ्राम) को बाहर की ओर खींचा जाता है, तो बोतल के अंदर का आयतन बढ़ता है।
  • इससे बोतल के अंदर का दाब कम हो जाता है, और बाहर की हवा नली के माध्यम से अंदर आती है।
  • परिणामस्वरूप, अंदर वाला छोटा गुब्बारा (फेफड़ा) फूल जाता है, जो साँस लेने की क्रिया को दर्शाता है।
  1. डायफ्राम को अंदर दबाना (उच्छ्वसन):
  • जब बोतल की पेंदी पर बंधे गुब्बारे (डायफ्राम) को अंदर की ओर दबाया जाता है, तो बोतल के अंदर का आयतन घटता है।
  • इससे बोतल के अंदर का दाब बढ़ जाता है, और हवा नली के माध्यम से बाहर निकल जाती है।
  • परिणामस्वरूप, अंदर वाला छोटा गुब्बारा (फेफड़ा) सिकुड़ जाता है, जो साँस छोड़ने की क्रिया को दर्शाता है।

निष्कर्ष:

  • यह मॉडल स्पष्ट करता है कि डायफ्राम की गति के कारण वक्ष गुहा के आयतन में परिवर्तन होता है, जिससे फेफड़ों में हवा अंदर आती और बाहर जाती है।
  • डायफ्राम श्वसन क्रिया का एक महत्वपूर्ण नियंत्रक है।

[IMAGE: cg_c6_science_ch09_t6_scene3] यह क्रियाकलाप श्वसन क्रिया के यांत्रिक पहलू को समझने में मदद करता है।

याद रखें

डायफ्राम के नीचे जाने पर हवा अंदर आती है (निःश्वसन), और ऊपर जाने पर हवा बाहर जाती है (उच्छ्वसन)।

9.4 उत्सर्जन तंत्र

शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं के परिणामस्वरूप हानिकारक या अनुपयोगी पदार्थ बनते हैं, जिन्हें अपशिष्ट पदार्थ कहते हैं। इन पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना उत्सर्जन कहलाता है।

उत्सर्जन की आवश्यकता:

  • यदि अपशिष्ट पदार्थ शरीर में जमा होते रहें, तो वे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं।
  • ये कोशिकाओं और अंगों के सामान्य कार्यों में बाधा डाल सकते हैं, जिससे विषाक्तता हो सकती है।
  • उत्सर्जन शरीर के आंतरिक वातावरण को स्थिर (समस्थिति) बनाए रखने में मदद करता है।

शरीर द्वारा उत्सर्जित किए जाने वाले अपशिष्ट पदार्थ:

  1. ठोस अपशिष्ट:
  • उदाहरण: मल (बिना पचा हुआ भोजन)।
  • उत्सर्जन अंग: मलाशय में एकत्रित होकर गुदाद्वार से बाहर निकाला जाता है।
  1. गैसीय अपशिष्ट:
  • उदाहरण: कार्बन डाइऑक्साइड।
  • उत्सर्जन अंग: फेफड़ों द्वारा श्वसन प्रक्रिया के दौरान बाहर निकाला जाता है।
  1. द्रव अपशिष्ट:
  • उदाहरण: मूत्र, पसीना।
  • पसीना: त्वचा में मौजूद स्वेद ग्रंथियों द्वारा उत्सर्जित होता है। यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करने में भी मदद करता है।
  • मूत्र: रक्त से हानिकारक पदार्थों को छानकर वृक्कों द्वारा बनाया जाता है।

मूत्र उत्सर्जन तंत्र के प्रमुख अंग:

  • वृक्क (Kidneys):
  • एक जोड़ी (दो) सेम के आकार के अंग।
  • मुख्य कार्य: रक्त को छानकर हानिकारक पदार्थों को अलग करना और मूत्र का निर्माण करना।
  • मूत्रवाहिनी (Ureters):
  • एक जोड़ी पतली नलिकाएँ जो प्रत्येक वृक्क से निकलती हैं।
  • मूत्र को वृक्क से मूत्राशय तक ले जाती हैं।
  • मूत्राशय (Urinary Bladder):
  • थैले के आकार की संरचना जहाँ मूत्र अस्थायी रूप से संग्रहित होता है।
  • मूत्रमार्ग (Urethra):
  • वह नली जिसके माध्यम से मूत्र शरीर से बाहर निकाला जाता है।

[IMAGE: human_excretory_system_fig115] मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र का लेबल युक्त आरेख। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t8_scene1] शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप कई अनुपयोगी और हानिकारक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t8_scene3] शरीर विभिन्न भौतिक अवस्थाओं में अपशिष्ट पदार्थों का उत्सर्जन करता है। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t8_scene4] उत्सर्जन एक महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रिया है जो शरीर के आंतरिक वातावरण को स्थिर बनाए रखने में मदद करती है।

महत्त्वपूर्ण

उत्सर्जन तंत्र शरीर के जल संतुलन, लवण संतुलन और pH स्तर को भी नियंत्रित करता है।

याद रखें

यदि उत्सर्जी पदार्थ शरीर के अंदर ही रह जाएँ, तो शरीर में विषाक्तता फैल सकती है और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

9.5 कंकाल एवं संधियाँ

कंकाल तंत्र हमारे शरीर को एक मजबूत ढाँचा प्रदान करता है, जिससे शरीर सीधा खड़ा रह पाता है और आंतरिक अंगों की सुरक्षा होती है।

कंकाल (Skeleton):

  • शरीर की सभी हड्डियाँ मिलकर एक पूरा ढाँचा बनाती हैं, जिसे कंकाल कहते हैं।
  • कार्य:
  • शरीर को आकार और सहारा प्रदान करना।
  • आंतरिक अंगों (जैसे मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े) की सुरक्षा करना।
  • मांसपेशियों को जुड़ने के लिए सतह प्रदान करना, जिससे गति संभव होती है।

कंकाल के प्रमुख भाग:

  • खोपड़ी (Skull): मस्तिष्क की सुरक्षा करती है।
  • रीढ़ की हड्डी (Spinal Cord/Vertebral Column): 33 छोटी-छोटी कशेरुकाओं से बनी होती है, जो शरीर को झुकने, मुड़ने और सीधा रहने में मदद करती है।
  • पसलियाँ (Ribs): छाती में 24 पसलियाँ होती हैं जो हृदय और फेफड़ों की सुरक्षा करती हैं।
  • हाथों और पैरों की हड्डियाँ: शरीर को गति प्रदान करती हैं।

संधियाँ (Joints):

  • शरीर के वे स्थान जहाँ दो हड्डियाँ आपस में मिलती हैं
  • संधियों के कारण ही शरीर के विभिन्न भागों को मोड़ा या घुमाया जा सकता है।
  • यदि हड्डियाँ आपस में जुड़ी न होतीं, तो शरीर गति नहीं कर पाता।

संधियों के प्रकार:

  1. कंदुक-खल्लिका संधि (Ball-and-Socket Joint):
  • एक हड्डी का गोलाकार सिरा दूसरी हड्डी की कटोरी जैसी गुहा में फिट होता है।
  • यह सभी दिशाओं में गति की अनुमति देती है।
  • उदाहरण: कंधे की संधि (हाथ की हड्डी और कंधे की हड्डी), कूल्हे की संधि (पैर की हड्डी और कूल्हे की हड्डी)।
  1. कब्जा संधि (Hinge Joint):
  • एक दरवाजे के कब्ज़े की तरह केवल एक तल में गति की अनुमति देती है।
  • उदाहरण: कोहनी की संधि, घुटने की संधि।

[IMAGE: feel_the_shoulder_bones_fig618] कंधे की हड्डियों का लेबल युक्त चित्र। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t9_scene2] शरीर में जितनी भी हड्डियाँ हैं, सब मिलकर एक पूरा ढाँचा बनाती हैं — इसे कंकाल कहते हैं। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t9_scene3] शरीर सिर्फ़ उन्हीं जगहों पर मुड़ता है जहाँ 2 हड्डियाँ आपस में मिलती हैं। इन मिलन-बिंदुओं को ही संधियाँ कहते हैं।

महत्त्वपूर्ण

कंकाल शरीर को आकार, सहारा और सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि संधियाँ गति को संभव बनाती हैं।

तंत्रिका तंत्र के अंग और कार्य

तंत्रिका तंत्र शरीर के सभी अंगों और तंत्रों के बीच तालमेल और नियंत्रण बनाए रखने का कार्य करता है। यह हमें बाहरी वातावरण के प्रति प्रतिक्रिया करने में भी मदद करता है।

तंत्रिका तंत्र के प्रमुख अंग:

  1. मस्तिष्क (Brain):
  • तंत्रिका तंत्र का केंद्रीय नियंत्रण कक्ष
  • सोचने, समझने, याद रखने, सीखने और निर्णय लेने का कार्य करता है।
  • ऐच्छिक क्रियाओं (अपनी इच्छा से की जाने वाली क्रियाएँ) जैसे खेलना, पढ़ना, लिखना आदि को नियंत्रित करता है।
  1. मेरुरज्जु (Spinal Cord):
  • मस्तिष्क से निकलकर रीढ़ की हड्डी के भीतर स्थित होता है।
  • मस्तिष्क और शरीर के अन्य भागों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान करता है।
  • अनैच्छिक क्रियाओं (बिना सोचे-समझे होने वाली क्रियाएँ) और प्रतिवर्ती क्रियाओं को नियंत्रित करता है (जैसे काँटा गड़ने पर पैर तुरंत हटाना)।
  1. तंत्रिकाएँ (Nerves):
  • मस्तिष्क और मेरुरज्जु से निकलने वाली धागे के समान रचनाएँ
  • ये पूरे शरीर में फैली होती हैं और सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाती हैं।
  • संवेदी अंगों से सूचनाएँ मस्तिष्क तक और मस्तिष्क से आदेश मांसपेशियों तक ले जाती हैं।

तंत्रिका तंत्र का महत्व:

  • यह सुनिश्चित करता है कि सभी अंग तंत्र (पाचन, श्वसन, परिसंचरण आदि) समन्वय में कार्य करें
  • शरीर को बाहरी उत्तेजनाओं के प्रति उचित प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाता है।

[IMAGE: human_brain_fig910] मनुष्य के मस्तिष्क का लेबल युक्त पार्श्व चित्र। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t10_scene1] शरीर में तालमेल क्यों ज़रूरी है? यह चित्र बताता है कि सभी तंत्रों का एक साथ काम करना क्यों महत्वपूर्ण है।

महत्त्वपूर्ण

ऐच्छिक क्रियाओं पर मस्तिष्क का नियंत्रण होता है, जबकि अनैच्छिक क्रियाओं पर मेरुरज्जु का नियंत्रण होता है।

संवेदी अंग और उनके कार्य

संवेदी अंग वे अंग होते हैं जो हमें अपने आस-पास के वातावरण को समझने में मदद करते हैं। ये बाहरी उत्तेजनाओं को ग्रहण करते हैं और उन्हें तंत्रिका तंत्र तक पहुँचाते हैं।

प्रमुख संवेदी अंग और उनके कार्य:

  1. आँखें (Eyes):
  • संवेदना: प्रकाश।
  • कार्य: हमें देखने में मदद करती हैं।
  1. कान (Ears):
  • संवेदना: ध्वनि तरंगें।
  • कार्य: हमें सुनने में सक्षम बनाते हैं।
  1. नाक (Nose):
  • संवेदना: गंध के कण।
  • कार्य: हमें सूंघने का अनुभव कराती है।
  1. जीभ (Tongue):
  • संवेदना: रासायनिक स्वाद (मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, उमामी)।
  • कार्य: हमें स्वाद का अनुभव कराती है।
  1. त्वचा (Skin):
  • संवेदना: स्पर्श, दबाव, दर्द, तापमान।
  • कार्य: हमें स्पर्श, गर्मी, ठंड और दर्द का अनुभव कराती है। यह शरीर का सबसे बड़ा संवेदी अंग है।

संवेदी अंगों का महत्व:

  • ये अंग बाहरी वातावरण से प्राप्त होने वाली सभी प्रकार की सूचनाओं को तंत्रिका आवेगों में परिवर्तित करते हैं।
  • ये आवेग तंत्रिकाओं के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, जहाँ उनकी व्याख्या की जाती है।
  • मस्तिष्क इन सूचनाओं के आधार पर उचित प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है, जिससे शरीर बाहरी परिवर्तनों के अनुकूल हो पाता है और आंतरिक संतुलन बनाए रखता है।

[IMAGE: cg_c6_science_ch09_t10_scene3] हमारे संवेदी अंग और उनके कार्य। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t11_scene3] संवेदी अंग हमारे तंत्रिका तंत्र का एक अभिन्न अंग हैं।

महत्त्वपूर्ण

संवेदी अंग हमें अपने परिवेश को समझने और उसमें अनुकूलन करने में मदद करते हैं।

प्रजनन तंत्र और प्रजनन क्रिया

सभी जीवधारियों में अपने समान नए जीव उत्पन्न करने की क्षमता होती है। इस प्रक्रिया को प्रजनन क्रिया कहते हैं।

प्रजनन का महत्व:

  • यह क्रिया जीवों की प्रजाति को पृथ्वी पर बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • प्रजनन के बिना, कोई भी प्रजाति समय के साथ विलुप्त हो जाएगी
  • यह जीवन चक्र का एक अभिन्न अंग है।

प्रजनन के प्रकार (संक्षेप में):

  • अंडे देने वाले जीव: जैसे मुर्गी (अंडों से चूजे निकलते हैं)।
  • बच्चों को जन्म देने वाले जीव: जैसे बिल्ली, कुत्ता, मनुष्य आदि।

मनुष्य में प्रजनन तंत्र के प्रमुख अंग:

  • नर में:
  • वृषण (Testis): मुख्य प्रजनन अंग जो शुक्राणु (male gametes) उत्पन्न करते हैं।
  • मादा में:
  • अंडाशय (Ovary): मुख्य प्रजनन अंग जो अंडाणु (female gametes) उत्पन्न करते हैं।

[IMAGE: human_fertilization_and_development_fig713] मनुष्य में निषेचन एवं परिवर्धन का चरणवार लेबल युक्त चित्र। [IMAGE: plant_fertilization_process_figunlabeled] पौधे में निषेचन की प्रक्रिया का लेबल युक्त चित्र। [IMAGE: cg_c6_science_ch09_t12_scene1] सभी जीवधारियों में अपने समान नए जीव उत्पन्न करने की क्षमता होती है।

महत्त्वपूर्ण

प्रजनन क्रिया जाति की निरंतरता सुनिश्चित करती है।

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