रेशों से वस्त्र तकः पादप रेशे
अध्याय 'रेशों से वस्त्र तकः पादप रेशे' हमें वस्त्रों की विविधता, रेशों के प्रकार और उनके स्रोतों के बारे में बताता है। छात्र प्राकृतिक रेशों (जैसे कपास, जूट, सेमल, नारियल) और संश्लेषित रेशों (जैसे टेरेलीन, पॉलिएस्टर, नायलॉन) के बीच अंतर करना सीखते हैं। यह अध्याय रेशों से धागा बनाने (कताई) और धागों से वस्त्र बनाने (बुनाई और निटिंग) की प्रक्रियाओं को भी समझाता है। यह छात्रों को वस्त्रों के महत्व और विभिन्न मौसमों के लिए उपयुक्त वस्त्रों के चुनाव को समझने में मदद करता है।
वस्त्रों में विविधता
1.1 वस्त्रों का इतिहास और विविधता
- प्राचीन काल: मनुष्य गर्मी, बारिश और ठंड से बचने के लिए वृक्षों की छाल, बड़ी पत्तियों और जंतुओं के चमड़े का उपयोग करते थे।
- विकास: धीरे-धीरे घास और पतली टहनियों से चटाइयाँ व टोकरियाँ बनाना सीखा। जंतुओं के बालों या ऊन को ऐंठकर लंबी लड़ियाँ बनाईं और उनसे वस्त्र तैयार किए।
- सुई का आविष्कार: सिलाई की सुई के आविष्कार के बाद सिले हुए वस्त्रों का प्रचलन बढ़ा।
- वर्तमान: आज भी कुछ बिना सिले वस्त्रों का उपयोग होता है (जैसे साड़ी, धोती, लुंगी, पगड़ी)।
1.2 वस्त्रों में विविधता का अनुभव
- स्पर्श का अनुभव: विभिन्न वस्त्रों को छूने पर अलग-अलग अनुभव होता है (चिकना, खुरदुरा, मुलायम, कठोर)।
- बुनावट: प्रत्येक कपड़े की अपनी विशिष्ट बुनावट होती है, जिसे ध्यान से देखने पर समझा जा सकता है।
- कतरनें: दर्जी की दुकान से बची हुई कपड़ों की कतरनों को छूकर और देखकर इस विविधता को आसानी से समझा जा सकता है।
1.3 धागे से रेशे तक
- वस्त्र की संरचना: कपड़े की बुनावट धागों से मिलकर बनी होती है।
- धागे की संरचना: धागे भी स्वयं कई पतली-पतली लड़ियों से बने होते हैं।
- रेशे: धागे की ये पतली-पतली लड़ियाँ और अधिक पतली लड़ियों से मिलकर बनी होती हैं, जिन्हें रेशे (तंतु) कहते हैं।
- उदाहरण: सूई में धागा डालते समय धागे का सिरा बिखर जाता है, ये बिखरी हुई लड़ियाँ ही रेशे होती हैं।
- रेशे वस्त्रों की सबसे छोटी इकाई हैं।
1.4 रेशों के प्रकार
वस्त्रों के रेशे मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
1.4.1 प्राकृतिक रेशे
- परिभाषा: वे रेशे जो वनस्पतियों (पौधों) और जंतुओं से प्राप्त होते हैं।
- उप-प्रकार:
- पादप रेशे (वनस्पति रेशे): पौधों से प्राप्त होते हैं।
- उदाहरण: कपास, जूट, सेमल, नारियल।
- जंतु रेशे: जंतुओं से प्राप्त होते हैं।
- उदाहरण: ऊन (भेड़, बकरी, याक, ऊँट, खरगोश के बाल), रेशम (रेशम कीट के कोकून से)।
1.4.2 संश्लेषित रेशे (मानव निर्मित रेशे)
- परिभाषा: वे रेशे जो रासायनिक पदार्थों से मनुष्य द्वारा बनाए जाते हैं।
- उदाहरण: टेरेलीन, पॉलिएस्टर, नायलॉन, ऐक्रिलिक।
1.5 विभिन्न प्रकार के रेशों का उपयोग
- सूती रेशे: हवादार, नमी सोखने वाले। गर्मियों में आरामदायक।
- ऊनी रेशे: गर्म, शरीर की गर्मी बनाए रखते हैं। सर्दियों में पहने जाते हैं।
- रेशमी रेशे: चिकने, चमकदार, विशेष अवसरों के लिए।
- संश्लेषित रेशे: मजबूत, जल-प्रतिरोधी, सिकुड़न-मुक्त।
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वस्त्र की सबसे छोटी इकाई 'रेशा' कहलाती है। रेशे से धागा बनता है और धागे से वस्त्र।
प्राकृतिक और संश्लेषित रेशों के उदाहरण और उनके गुणों को याद रखें। यह अंतर अक्सर पूछा जाता है।
कुछ पादप रेशे
पादप रेशे वे प्राकृतिक रेशे हैं जो विभिन्न पौधों से प्राप्त होते हैं। इनका उपयोग वस्त्र, रस्सी, बोरे, चटाई आदि बनाने में होता है।
2.1 कपास (Cotton)
- स्रोत: कपास के पौधे के फल (डोडे या कोए) से प्राप्त होता है।
- प्राप्ति: फूल झड़ने के बाद डोडे विकसित होते हैं। परिपक्व होने पर डोडे फट जाते हैं और अंदर की सफ़ेद रुई बाहर आ जाती है। यह रुई बीज से जुड़ी होती है।
- ओटाई (Ginnying): रुई से बीजों को अलग करने की प्रक्रिया। पहले हाथ से की जाती थी, अब मशीनों से होती है।
- गुण: मुलायम, हवादार, नमी सोखने वाला।
- उपयोग: सूती वस्त्र, तकिए, गद्दे, रजाई, पट्टियाँ बनाने में। भारत कपास का एक प्रमुख उत्पादक देश है।
2.2 सेमल (कापोक)
- स्रोत: सेमल के पौधे के कोए से प्राप्त होता है, कपास की तरह ही।
- प्राप्ति: फूल झड़ने के बाद कोए पकने पर रुई जैसे रेशे छोड़ते हैं।
- विशेषता: इन रेशों में प्राकृतिक ऐंठन का अभाव होता है।
- परिणाम: इस कारण इनकी कताई करके धागा बनाना कठिन होता है।
- गुण: रेशम के समान चमकीले और उत्तम श्रेणी के होते हैं। हल्के और फुर्तीले होते हैं।
- उपयोग: मुख्य रूप से चटाई, बिछौने, तकिए और गद्दे भरने में, जहाँ धागे की आवश्यकता नहीं होती।
2.3 जूट (पटसन)
- स्रोत: जूट के पौधे के तने से प्राप्त होता है।
- खेती: इसे उगने के लिए पर्याप्त नमी और गर्मी की आवश्यकता होती है। भारत में गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा (पश्चिम बंगाल, बिहार, असम) जैसे क्षेत्रों में खूब उगता है।
- प्राप्ति प्रक्रिया:
- कटाई: फूलों के मुरझाने के बाद पौधे को काटा जाता है।
- गलाना (Retting): तने को कई दिनों तक पानी में डुबोकर गलाया जाता है।
- रेशा निकालना: इस प्रक्रिया से तने की बाहरी छाल गल जाती है और अंदर से कोमल, पीले रंग के चमकदार रेशे प्राप्त होते हैं।
- गुण: मजबूत, चमकदार।
- उपयोग: बोरे (टाट), दरियाँ, गलीचे, रस्सियाँ, चटाईयाँ बनाने में।
2.4 नारियल का रेशा (कॉयर)
- स्रोत: नारियल के फल की बाहरी रेशेदार छाल से प्राप्त होता है।
- गुण: बहुत मजबूत, टिकाऊ, जल-प्रतिरोधी।
- उपयोग: गद्दियाँ, चटाइयाँ, ब्रश, डोरमैट, रस्सियाँ बनाने में। भारत के तटीय क्षेत्रों में इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।
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ओटाई वह प्रक्रिया है जिसमें कपास के रेशों से बीजों को अलग किया जाता है।
सेमल के रेशों से धागा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि उनमें प्राकृतिक ऐंठन नहीं होती।
धागे का निर्माण (कताई)
रेशों से वस्त्र निर्माण की प्रक्रिया का प्रथम चरण कताई है। इसमें रेशों को आपस में ऐंठकर धागा बनाया जाता है।
3.1 कताई (Spinning)
- परिभाषा: रेशों को आपस में ऐंठकर धागा बनाने की प्रक्रिया को कताई कहते हैं।
- उद्देश्य: रेशों को एक साथ लाकर मजबूत और सतत धागा बनाना।
- महत्व: यह वस्त्र निर्माण क्रिया का पहला चरण है। इसके बाद धागा बुनाई के लिए तैयार होता है।
3.2 कताई के उपकरण
3.2.1 हाथ की कताई
- सबसे प्राचीन विधि।
- रेशों को हाथ से खींचकर और ऐंठकर धागा बनाया जाता था।
3.2.2 तकली (Hand Spindle)
- परिभाषा: कताई का एक सरल और प्राचीन हस्तचालित उपकरण।
- संरचना: एक पतली लकड़ी या धातु की छड़ी (शाफ़्ट) और उसके निचले छोर पर लगी गोल चकती (whorl) होती है।
- कार्यविधि:
- रुई के गाले को एक हाथ में पकड़ा जाता है।
- दूसरे हाथ की उँगलियों से तकली को मरोड़कर घुमाया जाता है।
- तकली घूमते हुए रुई के रेशों को आपस में ऐंठकर धागा बनाती है।
- इतिहास: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में इसके अवशेष मिले हैं, जो 3000 BCE से भी पुराने हैं।
3.2.3 चरखा (Spinning Wheel)
- परिभाषा: तकली का विकसित और तेज़ रूप।
- संरचना: एक बड़ा लकड़ी का पहिया होता है जिसे हाथ से घुमाया जाता है। यह पहिया एक पट्टी (belt) के माध्यम से एक छोटी तकली से जुड़ा होता है।
- कार्यविधि: बड़ा पहिया घूमने पर पुली सिद्धांत के कारण छोटी तकली कई गुना तेजी से घूमती है, जिससे कताई की गति बढ़ जाती है।
- महत्व:
- महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान चरखे को आत्मनिर्भरता, श्रम के सम्मान और ब्रिटिश मिल-कपड़ों के बहिष्कार का प्रतीक बनाया।
- खादी वस्त्र चरखे से कते धागे से ही बनते हैं।
3.2.4 औद्योगिक कताई (मशीनी कताई)
- औद्योगिक क्रांति: 18वीं सदी की औद्योगिक क्रांति ने कताई मशीनों (जैसे स्पिनिंग जेनी, वॉटर फ्रेम, म्यूल) को जन्म दिया।
- क्षमता: एक मशीन एक साथ सैकड़ों तकलियाँ चला सकती थी, जिससे उत्पादन कई गुना बढ़ गया।
- भारत में: 1850 के बाद भारत में औद्योगिक कताई शुरू हुई। पहली कपड़ा मिल मुंबई में 1854 में लगी।
- आधुनिक मिलें: आज की आधुनिक मिलों में कताई स्वचालित मशीनों द्वारा चार चरणों में होती है:
- ब्लो रूम (Blow Room): रेशों की सफाई और मिश्रण।
- ड्रॉइंग फ्रेम (Drawing Frame): रेशों को सीधा करना और खींचना।
- रिंग फ्रेम (Ring Frame): रेशों को ऐंठकर धागा बनाना।
- वाइंडिंग (Winding): धागों को बॉबिन पर लपेटना।
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कताई: रेशों से धागा बनाने की प्रक्रिया को कताई कहते हैं।
चरखा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण प्रतीक था, जो स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का संदेश देता था।
वस्त्र निर्माण (बुनाई और निटिंग)
धागे बनने के बाद अगला चरण उनसे वस्त्र बनाना है। वस्त्र निर्माण की मुख्य विधियाँ बुनाई और निटिंग हैं।
4.1 बुनाई (Weaving)
- परिभाषा: धागों के दो अलग-अलग सेटों को एक साथ गूंथकर वस्त्र बनाने की प्रक्रिया को बुनाई कहते हैं।
- करघा (Loom): बुनाई के लिए उपयोग किया जाने वाला उपकरण।
- प्रकार: हस्तचलित (हाथ से चलने वाले) या विद्युत चलित (बिजली से चलने वाले)।
- धागों के सेट:
- ताना (Warp): लंबाई में लगाए गए धागे।
- बाना (Weft): चौड़ाई में लगाए गए धागे।
- कार्यविधि: ताने और बाने के धागों को एक-दूसरे के ऊपर और नीचे से बारी-बारी से फंसाकर बुना जाता है, जिससे वस्त्र का निर्माण होता है।
- गुण: बुनाई से बने वस्त्र स्थिर और मजबूत होते हैं। ये खींचने पर आसानी से फैलते नहीं हैं।
- उदाहरण: सूती कपड़े, डेनिम, रेशमी कपड़े।
- औद्योगिक बुनाई: अधिकांश वस्त्रों का निर्माण विद्युत चलित करघों पर बड़े पैमाने पर होता है।
4.2 निटिंग (Knitting)
- परिभाषा: वस्त्र निर्माण की वह विधि जिसमें केवल एक धागे का उपयोग करके लूप बनाए जाते हैं और इन लूपों को आपस में फंसाकर वस्त्र का निर्माण किया जाता है।
- उपकरण: हाथों से सलाइयों (बुनाई की सुई) से या मशीनों से।
- कार्यविधि: एक धागे से फंदे बनाए जाते हैं और उन फंदों को एक-दूसरे के भीतर से निकालकर एक श्रृंखला बनाई जाती है।
- गुण: निटिंग से बने वस्त्र लचीले और आरामदायक होते हैं। इनमें फैलने और सिकुड़ने की क्षमता होती है।
- कारण: फंदों में सभी दिशाओं में फैलने की क्षमता होती है। जब वस्त्र पर खिंचाव पड़ता है, तो फंदे फैलते हैं और सिकुड़ते हैं, जिससे वस्त्र शरीर पर अच्छी तरह फिट होता है।
- उदाहरण: स्वेटर, जरसी, कार्डिगन, बनियान, मोजे।
- उपयोग: खेल के कपड़ों और आरामदायक वस्त्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
4.3 बुनाई और निटिंग का महत्व
- दोनों ही वस्त्र निर्माण की आधारभूत विधियाँ हैं।
- बुनाई: स्थिर और मजबूत कपड़े (जैसे शर्ट, पैंट) बनाती है।
- निटिंग: लचीले और आरामदायक कपड़े (जैसे स्वेटर, टी-शर्ट) बनाती है।
- इन विधियों ने मानव को विभिन्न जलवायु और आवश्यकताओं के अनुसार वस्त्र प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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बुनाई: धागों के दो सेटों (ताना और बाना) को आपस में गूंथकर वस्त्र बनाने की प्रक्रिया।
निटिंग: एक ही धागे से फंदे बनाकर वस्त्र बनाने की प्रक्रिया।
बुनाई और निटिंग के बीच मुख्य अंतर उनके द्वारा उपयोग किए जाने वाले धागों की संख्या (दो बनाम एक) और परिणामी वस्त्रों के गुणों (स्थिर बनाम लचीला) में है।