रेशों से वस्त्र तकः जन्तु रेशे
यह अध्याय छात्रों को जंतुओं से प्राप्त होने वाले रेशों, जैसे ऊन और रेशम, के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। इसमें ऊन प्राप्त करने की विभिन्न प्रक्रियाओं (जैसे कटाई, अभिमार्जन, छँटाई, रंगाई और रीलिंग) और रेशम कीट के जीवन चक्र तथा रेशम उत्पादन (सेरीकल्चर) के चरणों को समझाया गया है। यह अध्याय छात्रों को प्राकृतिक रेशों के महत्व और उनके उपयोग के बारे में शिक्षित करता है।
जन्तु रेशे और उनके स्रोत
जन्तु रेशे वे प्राकृतिक रेशे होते हैं जो जन्तुओं से प्राप्त होते हैं। इनका उपयोग विभिन्न प्रकार के वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनाने में किया जाता है।
- मुख्य जन्तु रेशे:
- ऊन
- रेशम
ऊन के स्रोत
ऊन विभिन्न जन्तुओं से प्राप्त होता है, जिनके शरीर पर बालों की मोटी परत होती है। यह परत उन्हें ठंड से बचाती है।
- भेड़: ऊन का सबसे सामान्य स्रोत। भारत के विभिन्न भागों में भेड़ों की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- बकरी:
- कश्मीरी बकरी (अंगोरा प्रजाति) के मुलायम बालों से उत्तम किस्म की पश्मीना शालें बनाई जाती हैं।
- यॉक: लद्दाख और तिब्बत में ऊन का मुख्य स्रोत।
- ऊँट: ऊँट के शरीर से प्राप्त बालों का उपयोग भी ऊन के रूप में किया जाता है।
- लामा और ऐल्पेका: दक्षिण अमेरिका और अन्य देशों में इनसे भी ऊन प्राप्त किया जाता है।
- खरगोश: एक विशेष प्रजाति के खरगोश से प्राप्त फर सफेद, रेशमी और मुलायम होते हैं, जिनसे उच्च गुणवत्तायुक्त कपड़े तैयार किए जाते हैं।
- घोड़े के बाल: इनका उपयोग ब्रश बनाने, वायलिन जैसे वाद्य यंत्रों में तारों के रूप में और घर की सजावट में किया जाता है। ये मजबूत, मुलायम और पतले होते हैं।
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