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सजीवों में परिवहन
Chhattisgarh · Class 7 · 🔬 Science · Chapter 13

सजीवों में परिवहन

संवहन ऊतक (जाइलम और फ्लोएम)रक्त के घटक और कार्यमानव हृदय की संरचनाधमनी और शिरा में अंतरपरिसंचरण तंत्र के प्रकार

यह अध्याय सजीवों में पदार्थों के परिवहन की महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का परिचय देता है। छात्र पौधों में जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहन ऊतकों के माध्यम से जल, खनिज लवण और भोजन के परिवहन के बारे में जानेंगे। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय मानव शरीर में रक्त परिसंचरण प्रणाली, रक्त के घटकों (लाल रक्त कणिकाएं, श्वेत रक्त कणिकाएं, प्लेटलेट्स) और उनके कार्यों की व्याख्या करता है। धमनी और शिरा के बीच के अंतर, हृदय की संरचना और कार्यप्रणाली को भी समझाया गया है। यह छात्रों को सजीवों के जीवन के लिए परिवहन के महत्व को समझने में मदद करता है।

पौधों में जल और खनिज लवणों का परिवहन

पौधों की जड़ें मिट्टी से पानी और खनिज लवणों को अवशोषित करती हैं।
पौधों की जड़ें मिट्टी से पानी और खनिज लवणों को अवशोषित करती हैं।
जड़ों द्वारा अवशोषित पानी और खनिज लवण तने के माध्यम से पौधे के ऊपरी भागों तक पहुँचाए जाते हैं।
जड़ों द्वारा अवशोषित पानी और खनिज लवण तने के माध्यम से पौधे के ऊपरी भागों तक पहुँचाए जाते हैं।

पौधों में जल और खनिज लवणों का परिवहन एक जटिल प्रक्रिया है जो पौधों के जीवित रहने और बढ़ने के लिए आवश्यक है।

  • अवशोषण:
  • पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से मिट्टी से पानी और खनिज लवण अवशोषित करते हैं।
  • जड़ों की सतह पर मौजूद मूल रोम (Root Hairs) पानी और खनिजों के अवशोषण के लिए सतह क्षेत्र को बढ़ाते हैं।
  • खनिज लवण घुलित अवस्था में पानी के साथ अवशोषित होते हैं।
  • ऊपर की ओर गति (Ascent of Sap):
  • अवशोषित पानी और खनिज लवण जाइलम नामक विशेष ऊतक के माध्यम से जड़ों से पौधे के ऊपरी भागों (तना, पत्तियाँ, फूल) तक पहुँचते हैं।
  • यह गति वाष्पोत्सर्जन खिंचाव (Transpirational Pull), मूल दाब (Root Pressure) और केशिका क्रिया (Capillary Action) जैसी प्रक्रियाओं द्वारा संचालित होती है।
  • वाष्पोत्सर्जन पत्तियों से पानी का वाष्प के रूप में निकलना है, जो एक खिंचाव बल उत्पन्न करता है जो पानी को ऊपर खींचता है।
  • भोजन का स्थानांतरण:
  • पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा बना भोजन (शर्करा) फ्लोएम नामक अन्य संवहन ऊतक द्वारा पौधे के सभी भागों में स्थानांतरित होता है।
  • यह भोजन जड़ों, फलों, फूलों और बढ़ते हुए भागों तक पहुँचता है जहाँ इसकी आवश्यकता होती है या इसे संग्रहीत किया जाता है।
  • उदाहरण: आलू, गाजर, मूली, शकरकंद जैसे भूमिगत भागों में भोजन का संग्रह फ्लोएम द्वारा नीचे की ओर परिवहन के कारण होता है।
  • संवहन ऊतक:
  • पौधों में जल, खनिज लवण और भोजन के परिवहन के लिए विशेष प्रकार के ऊतक होते हैं जिन्हें संवहन ऊतक (Vascular Tissues) कहते हैं।
  • मुख्य संवहन ऊतक जाइलम और फ्लोएम हैं।
  • महत्व:
  • यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि पौधे के प्रत्येक भाग को उसकी वृद्धि और उपापचयी क्रियाओं के लिए आवश्यक पोषक तत्व मिलें।
  • खाद डालने के बाद पानी डालना आवश्यक है ताकि खनिज लवण घुल सकें और जड़ों द्वारा अवशोषित होकर पौधे तक पहुँच सकें।

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महत्त्वपूर्ण

पौधों में जाइलम और फ्लोएम को सामूहिक रूप से संवहन बंडल कहा जाता है, जो पौधे के पूरे शरीर में एक पाइपलाइन प्रणाली बनाते हैं।

💡सुझाव

क्रियाकलाप 1 (रंगीन पानी में टहनी रखना) यह दर्शाता है कि जाइलम ही वह ऊतक है जो पानी का संवहन करता है। सूक्ष्मदर्शी में रंगीन भाग जाइलम ही होता है।

पौधों में जाइलम और फ्लोएम की भूमिका

पौधों में जल, खनिज लवण और भोजन के परिवहन के लिए विशेष प्रकार के ऊतक होते हैं जिन्हें संवहन ऊतक कहा जाता है।
पौधों में जल, खनिज लवण और भोजन के परिवहन के लिए विशेष प्रकार के ऊतक होते हैं जिन्हें संवहन ऊतक कहा जाता है।
जाइलम एक जटिल ऊतक है जो पौधों में पानी और घुले हुए खनिजों के परिवहन के लिए जिम्मेदार होता है।
जाइलम एक जटिल ऊतक है जो पौधों में पानी और घुले हुए खनिजों के परिवहन के लिए जिम्मेदार होता है।
फ्लोएम भी एक जटिल ऊतक है जो पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा तैयार किए गए भोजन (शर्करा) को पौधे के अन्य भागों तक पहुंचाता है।
फ्लोएम भी एक जटिल ऊतक है जो पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा तैयार किए गए भोजन (शर्करा) को पौधे के अन्य भागों तक पहुंचाता है।

पौधों में जाइलम और फ्लोएम दो मुख्य संवहन ऊतक हैं जो पदार्थों के परिवहन के लिए जिम्मेदार होते हैं।

जाइलम (Xylem)

  • कार्य: पानी और खनिज लवणों को जड़ों से पत्तियों और पौधे के अन्य ऊपरी भागों तक पहुँचाना।
  • दिशा: परिवहन की दिशा एकतरफा होती है (हमेशा ऊपर की ओर)।
  • स्थिति: तने के अंदरूनी कठोर भाग में स्थित होता है।
  • संरचना: मुख्य रूप से मृत कोशिकाओं (वाहिकाएं, वाहिनिकाएं) से बना होता है, जो इसे यांत्रिक शक्ति भी प्रदान करता है।
  • उदाहरण: क्रियाकलाप 2 में, जब टहनी 'ब' में जाइलम को नष्ट किया जाता है, तो पत्तियाँ मुरझा जाती हैं क्योंकि पानी ऊपर नहीं पहुँच पाता।

फ्लोएम (Phloem)

  • कार्य: पत्तियों में बने भोजन (शर्करा) को पौधे के सभी भागों (जड़ों, फलों, बढ़ते हुए भागों) तक पहुँचाना।
  • दिशा: परिवहन की दिशा द्विदिशात्मक होती है (ऊपर और नीचे दोनों ओर)।
  • स्थिति: तने की छाल (बाहरी भाग) में स्थित होता है।
  • संरचना: मुख्य रूप से जीवित कोशिकाओं (चालनी नलिकाएँ, सहचर कोशिकाएँ) से बना होता है।
  • उदाहरण: क्रियाकलाप 2 में, जब टहनी 'अ' में छाल (और फ्लोएम) को हटा दिया जाता है, तो जड़ों तक भोजन नहीं पहुँच पाता, जिससे जड़ें कमजोर हो सकती हैं, लेकिन पत्तियाँ तुरंत मुरझाती नहीं हैं क्योंकि जाइलम अक्षुण्ण रहता है।

जाइलम और फ्लोएम में अंतर

| विशेषता | जाइलम (जलवाहिनी) | फ्लोएम (रसवाहिनी) | |---|---|---| | परिवहन | जल और खनिज लवण | पत्तियों में बना भोजन (शर्करा) | | दिशा | एकतरफा (जड़ों से ऊपर) | द्विदिशात्मक (पत्तियों से ऊपर और नीचे) | | स्थिति | तने के अंदरूनी भाग में | तने की छाल (बाहरी भाग) में | | कोशिकाएँ | मुख्य रूप से मृत कोशिकाएँ (वाहिकाएं, वाहिनिकाएं) | मुख्य रूप से जीवित कोशिकाएँ (चालनी नलिकाएँ, सहचर कोशिकाएँ) | | यांत्रिक सहारा | प्रदान करता है | कम प्रदान करता है |

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याद रखें

पौधों में जाइलम और फ्लोएम की स्थिति को याद रखने के लिए: 'जा' से जाइलम 'ज' से जल, 'फ' से फ्लोएम 'फ' से फूड। जाइलम अंदर होता है, फ्लोएम बाहर।

💡सुझाव

क्रियाकलाप 2 (वलय काटने वाला प्रयोग) जाइलम और फ्लोएम के कार्यों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। टहनी 'अ' (छाल हटी) में फ्लोएम नष्ट होता है, भोजन परिवहन रुकता है। टहनी 'ब' (अंदरूनी ऊतक हटे) में जाइलम नष्ट होता है, जल परिवहन रुकता है, पत्तियाँ मुरझाती हैं।

जंतुओं में परिवहन की आवश्यकता

सभी जीवों को अपनी जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो उन्हें भोजन के पाचन से प्राप्त होती है।
सभी जीवों को अपनी जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो उन्हें भोजन के पाचन से प्राप्त होती है।
शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को रक्त के माध्यम से उत्सर्जी अंगों तक पहुँचाया जाता है।
शरीर में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को रक्त के माध्यम से उत्सर्जी अंगों तक पहुँचाया जाता है।
ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान रक्त द्वारा होता है।
ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान रक्त द्वारा होता है।
जीवों में पदार्थों का निरंतर परिवहन होता रहता है।
जीवों में पदार्थों का निरंतर परिवहन होता रहता है।

सभी सजीवों को जीवित रहने और अपनी जैविक क्रियाओं को पूरा करने के लिए पदार्थों के परिवहन की आवश्यकता होती है। जंतुओं में यह आवश्यकताएँ और भी स्पष्ट होती हैं।

  • ऊर्जा और भोजन का परिवहन:
  • प्रत्येक जीव को अपनी जैविक क्रियाओं (जैसे चलना, साँस लेना, सोचना) के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
  • यह ऊर्जा उन्हें भोजन के पाचन से प्राप्त होती है।
  • पाचन अंगों द्वारा पचा हुआ भोजन रक्त के माध्यम से शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाया जाता है।
  • ऑक्सीजन का परिवहन:
  • कोशिकाओं को लगातार ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है ताकि वे श्वसन क्रिया द्वारा ऊर्जा उत्पन्न कर सकें।
  • यह ऑक्सीजन फेफड़ों से रक्त द्वारा कोशिकाओं तक पहुँचती है।
  • अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन:
  • शरीर में होने वाली विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के परिणामस्वरूप अपशिष्ट पदार्थ बनते हैं (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, यूरिया)।
  • ये पदार्थ शरीर के लिए हानिकारक हो सकते हैं, इसलिए इन्हें शरीर से बाहर निकालना आवश्यक है।
  • रक्त इन अपशिष्ट पदार्थों को कोशिकाओं से उत्सर्जी अंगों (जैसे किडनी, फेफड़े) तक पहुँचाता है, जहाँ से उन्हें शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
  • श्वसन के दौरान कोशिकाओं में बनी कार्बन डाइऑक्साइड को रक्त फेफड़ों तक लाता है, जहाँ से इसे साँस के साथ बाहर निकाल दिया जाता है।
  • परिवहन की व्यापकता:
  • एककोशिकीय जीव (जैसे अमीबा, पैरामीशियम) में पदार्थों का परिवहन विसरण (Diffusion) विधि द्वारा होता है, क्योंकि उनका शरीर सीधे पर्यावरण के संपर्क में होता है।
  • बहुकोशिकीय और जटिल जीवों में, एक विशेष परिवहन तंत्र (जैसे रक्त परिसंचरण तंत्र) होता है जो इन सभी कार्यों को कुशलतापूर्वक करता है।

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महत्त्वपूर्ण

जंतुओं में परिवहन तंत्र का मुख्य उद्देश्य समस्थापन (Homeostasis) बनाए रखना है, यानी शरीर के आंतरिक वातावरण को स्थिर रखना।

रक्त की संरचना और कार्य

रक्त एक विशेष प्रकार का संयोजी ऊतक है जो पूरे शरीर में विभिन्न पदार्थों का परिवहन करता है।
रक्त एक विशेष प्रकार का संयोजी ऊतक है जो पूरे शरीर में विभिन्न पदार्थों का परिवहन करता है।
प्लाज्मा रक्त का पीला, तरल घटक है जिसमें रक्त कोशिकाएँ निलंबित रहती हैं।
प्लाज्मा रक्त का पीला, तरल घटक है जिसमें रक्त कोशिकाएँ निलंबित रहती हैं।
रक्त में तीन मुख्य प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं: लाल रक्त कणिकाएँ, श्वेत रक्त कणिकाएँ, और प्लेटलेट्स।
रक्त में तीन मुख्य प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं: लाल रक्त कणिकाएँ, श्वेत रक्त कणिकाएँ, और प्लेटलेट्स।

रक्त एक विशेष प्रकार का संयोजी ऊतक है जो पूरे शरीर में विभिन्न पदार्थों का परिवहन करता है। यह तरल अवस्था में होता है और इसके दो मुख्य घटक होते हैं: प्लाज्मा और रक्त कोशिकाएँ।

1. प्लाज्मा (Plasma)

  • परिभाषा: रक्त का तरल, पीला भाग जिसमें रक्त कोशिकाएँ निलंबित रहती हैं।
  • आयतन: रक्त का लगभग 55% आयतन बनाता है।
  • घटक:
  • लगभग 92% पानी
  • शेष 8% में प्रोटीन (जैसे एल्ब्यूमिन, ग्लोब्युलिन, फाइब्रिनोजेन), ग्लूकोज, खनिज आयन, हार्मोन, कार्बन डाइऑक्साइड और अपशिष्ट पदार्थ होते हैं।
  • कार्य:
  • पोषक तत्वों (ग्लूकोज, अमीनो एसिड), हार्मोन, एंजाइम और अपशिष्ट पदार्थों (यूरिया) का परिवहन।
  • शरीर के तापमान को नियंत्रित करना।
  • रक्तचाप और रक्त की मात्रा बनाए रखना।

2. रक्त कोशिकाएँ (Blood Cells)

रक्त में मुख्यतः तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं जो प्लाज्मा में तैरती रहती हैं:

अ. लाल रक्त कणिकाएँ (Red Blood Cells - RBCs / एरिथ्रोसाइट्स)
  • आकार और संख्या: छोटी, उभयावतल (biconcave) और संख्या में सर्वाधिक
  • रंग: लाल, जिसके कारण रक्त का रंग लाल दिखाई देता है।
  • रंग का कारण: इनमें हीमोग्लोबिन नामक एक जटिल प्रोटीन होता है, जिसमें लौह (iron) होता है।
  • कार्य:
  • ऑक्सीजन का परिवहन: हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के साथ जुड़कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है और ऑक्सीजन को फेफड़ों से शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाता है।
  • कार्बन डाइऑक्साइड का कुछ हद तक परिवहन।
  • महत्व: अधिक RBCs का अर्थ है शरीर की अधिक ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता।
ब. श्वेत रक्त कणिकाएँ (White Blood Cells - WBCs / ल्यूकोसाइट्स)
  • आकार और संख्या: RBCs से बड़ी, रंगहीन और संख्या में कम
  • कार्य:
  • शरीर की रोगों से रक्षा करना (प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा)।
  • ये रोगाणुओं (बैक्टीरिया, वायरस), जीवाणुओं और अन्य बाहरी पदार्थों को नष्ट करती हैं।
  • विभिन्न प्रकार की WBCs होती हैं (जैसे न्यूट्रोफिल, लिम्फोसाइट, मोनोसाइट) जिनमें से प्रत्येक का विशिष्ट प्रतिरक्षा कार्य होता है।
स. प्लेटलेट्स (Platelets / थ्रोम्बोसाइट्स)
  • आकार और संख्या: अनियमित आकार की छोटी कोशिकाएँ, RBCs से कम संख्या में।
  • कार्य:
  • रक्त का थक्का जमाने (Blood Clotting) में सहायक।
  • चोट लगने पर रक्तस्राव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

रक्ताधान (Blood Transfusion)

  • परिभाषा: दुर्घटना या बीमारी के कारण शरीर में रक्त की कमी होने पर स्वस्थ व्यक्ति के रक्त को रोगी के शरीर में पहुँचाना
  • दाता (Donor): वह व्यक्ति जो रक्त देता है।
  • ग्राही (Recipient): वह रोगी जो रक्त लेता है।
  • महत्व: जीवन रक्षक प्रक्रिया।
  • सावधानी: रक्ताधान से पहले रक्त समूह का मिलान (Blood Group Matching) अत्यंत आवश्यक है ताकि कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया न हो।

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📖परिभाषा

हीमोग्लोबिन: लाल रक्त कणिकाओं में पाया जाने वाला लौह युक्त प्रोटीन जो ऑक्सीजन के परिवहन के लिए जिम्मेदार होता है।

🚧ग़लत धारणा

छात्र अक्सर RBCs और WBCs के कार्यों को भ्रमित करते हैं। याद रखें, RBCs ऑक्सीजन ले जाती हैं, और WBCs संक्रमण से लड़ती हैं

परिसंचरण तंत्र के प्रकार और नाड़ी स्पंद

रक्त केशिकाएँ धमनियों और शिराओं को जोड़ती हैं, जहाँ पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।
रक्त केशिकाएँ धमनियों और शिराओं को जोड़ती हैं, जहाँ पदार्थों का आदान-प्रदान होता है।
खुला परिसंचरण तंत्र कुछ अकशेरुकी जंतुओं में पाया जाता है, जहाँ रक्त सीधे शरीर की गुहाओं में बहता है।
खुला परिसंचरण तंत्र कुछ अकशेरुकी जंतुओं में पाया जाता है, जहाँ रक्त सीधे शरीर की गुहाओं में बहता है।
बंद परिसंचरण तंत्र में रक्त हमेशा रक्त वाहिकाओं के एक बंद नेटवर्क के भीतर ही रहता है।
बंद परिसंचरण तंत्र में रक्त हमेशा रक्त वाहिकाओं के एक बंद नेटवर्क के भीतर ही रहता है।
नाड़ी स्पंद धमनियों में रक्त के प्रवाह के कारण होने वाला लयबद्ध स्पंदन है।
नाड़ी स्पंद धमनियों में रक्त के प्रवाह के कारण होने वाला लयबद्ध स्पंदन है।
स्पंदन दर एक मिनट में होने वाले नाड़ी स्पंदों की संख्या है।
स्पंदन दर एक मिनट में होने वाले नाड़ी स्पंदों की संख्या है।

जंतुओं में पदार्थों के परिवहन के लिए परिसंचरण तंत्र होता है, जो दो मुख्य प्रकार का होता है: खुला और बंद।

1. परिसंचरण तंत्र के प्रकार

अ. खुला परिसंचरण तंत्र (Open Circulatory System)
  • परिभाषा: वह परिसंचरण तंत्र जिसमें रक्त रक्त वाहिकाओं के बंद नेटवर्क में सीमित नहीं होता है।
  • रक्त प्रवाह: रक्त सीधे शरीर की गुहाओं (जिन्हें हीमोकोल कहते हैं) में बहता है, जिससे ऊतक सीधे रक्त के संपर्क में आते हैं।
  • विशेषताएँ: हृदय और रक्त वाहिकाओं का जटिल नेटवर्क अनुपस्थित या कम विकसित होता है।
  • उदाहरण: कीटों (जैसे तिलचट्टा) और कुछ अन्य अकशेरुकी जंतुओं में पाया जाता है।
ब. बंद परिसंचरण तंत्र (Closed Circulatory System)
  • परिभाषा: वह परिसंचरण तंत्र जिसमें रक्त हमेशा रक्त वाहिकाओं के एक बंद नेटवर्क के भीतर ही रहता है।
  • रक्त प्रवाह: हृदय रक्त को धमनियों में पंप करता है, जो इसे केशिकाओं तक ले जाती हैं, और फिर शिराएँ रक्त को हृदय में वापस लाती हैं। रक्त कभी भी सीधे शरीर की गुहाओं के संपर्क में नहीं आता है।
  • विशेषताएँ: पदार्थों का अधिक कुशल और नियंत्रित परिवहन संभव होता है।
  • उदाहरण: मनुष्य, मछली, पक्षी और अन्य कशेरुकी जंतुओं में पाया जाता है।

2. मानव परिसंचरण तंत्र के घटक

अ. हृदय (Heart)
  • परिभाषा: परिसंचरण तंत्र का प्रमुख अंग, जो रक्त को पूरे शरीर में पंप करता है।
  • स्थिति: वक्ष गुहा में, थोड़ा बाईं ओर, लगभग बंद मुट्ठी के आकार का।
  • संरचना:
  • चार कक्षों में बंटा होता है: दो अलिंद (ऊपरी कक्ष) और दो निलय (निचले कक्ष)
  • दायाँ अलिंद और दायाँ निलय कम ऑक्सीजन वाले रक्त को संभालते हैं।
  • बायाँ अलिंद और बायाँ निलय अधिक ऑक्सीजन वाले रक्त को संभालते हैं।
  • हृदय हृद-पेशियों से बना होता है जो लगातार बिना रुके कार्य करती हैं।
  • एक पेशीय पट हृदय को दो भागों में बांटता है, जिससे ऑक्सीजन युक्त और ऑक्सीजन रहित रक्त आपस में नहीं मिलते।
  • कार्य:
  • दायाँ अलिंद शरीर से कम ऑक्सीजन वाला रक्त प्राप्त करता है और दाएँ निलय में भेजता है।
  • दायाँ निलय इस रक्त को फेफड़ों में पंप करता है ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए।
  • बायाँ अलिंद फेफड़ों से अधिक ऑक्सीजन वाला रक्त प्राप्त करता है और बाएँ निलय में भेजता है।
  • बायाँ निलय इस ऑक्सीजन युक्त रक्त को धमनियों के माध्यम से पूरे शरीर में पंप करता है।
ब. रक्त वाहिकाएँ (Blood Vessels)
  • i. धमनियाँ (Arteries):
  • कार्य: हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के विभिन्न भागों तक ले जाती हैं (फुफ्फुसीय धमनी को छोड़कर, जो कम ऑक्सीजन वाला रक्त फेफड़ों तक ले जाती है)।
  • दीवारें: मोटी, लचीली और पेशीय होती हैं ताकि हृदय द्वारा उत्पन्न उच्च दबाव को सहन कर सकें।
  • लुमेन: अंदर से संकरी होती हैं।
  • रक्त प्रवाह: तेज गति से, झटके के साथ बहता है।
  • रक्त न होने पर भी पिचकती नहीं हैं।
  • ii. शिराएँ (Veins):
  • कार्य: शरीर के विभिन्न भागों से कम ऑक्सीजन युक्त रक्त को हृदय तक वापस लाती हैं (फुफ्फुसीय शिरा को छोड़कर, जो अधिक ऑक्सीजन वाला रक्त फेफड़ों से हृदय तक लाती है)।
  • दीवारें: धमनियों की तुलना में पतली और कम लचीली होती हैं।
  • लुमेन: अंदर से चौड़ी होती हैं।
  • रक्त प्रवाह: धीमी और एक समान गति से बहता है।
  • रक्त न होने पर पिचक जाती हैं।
  • रक्त के वापस प्रवाह को रोकने के लिए इनमें वाल्व (Valves) होते हैं।
  • iii. केशिकाएँ (Capillaries):
  • कार्य: धमनियों और शिराओं को जोड़ने वाली अत्यंत सूक्ष्म रक्त वाहिकाएँ
  • दीवारें: केवल एक कोशिका मोटी होती हैं।
  • महत्व: रक्त और कोशिकाओं के बीच ऑक्सीजन, पोषक तत्वों और अपशिष्ट पदार्थों का सीधा आदान-प्रदान यहीं होता है।
  • कई केशिकाएँ मिलकर शिराएँ बनाती हैं।

3. नाड़ी स्पंद (Pulse) और स्पंदन दर (Pulse Rate)

  • नाड़ी स्पंद:
  • परिभाषा: धमनियों में रक्त के प्रवाह के कारण होने वाला लयबद्ध स्पंदन
  • यह हृदय के प्रत्येक धड़कन के साथ होता है।
  • इसे शरीर की सतह के पास की धमनियों पर महसूस किया जा सकता है (जैसे कलाई, गर्दन, कनपटी)।
  • डॉक्टर नाड़ी स्पंद गिनकर हृदय की कार्यप्रणाली का अनुमान लगाते हैं।
  • स्पंदन दर:
  • परिभाषा: एक मिनट में होने वाले नाड़ी स्पंदों की संख्या
  • यह सीधे हृदय गति (Heart Rate) को दर्शाती है।
  • सामान्य दर: एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति की विश्राम अवस्था में सामान्य स्पंदन दर आमतौर पर प्रति मिनट 72 से 80 स्पंदन होती है।
  • शारीरिक गतिविधि, तनाव, बीमारी या उत्तेजना की स्थिति में स्पंदन दर बढ़ जाती है।

4. रक्तचाप (Blood Pressure)

  • परिभाषा: धमनियों की दीवारों पर रक्त द्वारा लगाया गया दबाव
  • मापन: इसे विशेष यंत्र (स्फिग्मोमैनोमीटर) से नापते हैं।
  • महत्व: सामान्य रक्तचाप शरीर के स्वस्थ कार्य के लिए आवश्यक है। सामान्य से अधिक (उच्च रक्तचाप) या कम (निम्न रक्तचाप) होना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।
  • प्रभावित करने वाले कारक: चिंता, अधिक वसायुक्त भोजन, शारीरिक निष्क्रियता आदि रक्तचाप को प्रभावित कर सकते हैं।

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महत्त्वपूर्ण

बंद परिसंचरण तंत्र अधिक कुशल होता है क्योंकि रक्त का प्रवाह नियंत्रित होता है और पदार्थों का आदान-प्रदान विशिष्ट स्थानों पर होता है।

💡सुझाव

धमनी और शिरा में अंतर बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है। उनकी दीवारों की मोटाई, रक्त प्रवाह की दिशा, ऑक्सीजन की मात्रा और वाल्व की उपस्थिति के आधार पर अंतर याद रखें।

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