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स्थिर विद्युत
Chhattisgarh · Class 7 · 🔬 Science · Chapter 15

स्थिर विद्युत

विद्युत आवेशआवेशन की विधियाँसजातीय और विजातीय आवेशतड़िततड़ित चालक

यह अध्याय स्थिर विद्युत की अवधारणाओं, आवेशित वस्तुओं के गुणों और वस्तुओं को आवेशित करने की विभिन्न विधियों जैसे घर्षण, संपर्क और प्रेरण के बारे में बताता है। छात्र विद्युतदर्शी और स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी के कार्य को समझते हैं। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय वायुमंडल में आवेश, तड़ित की घटना और तड़ित चालक के महत्व पर भी प्रकाश डालता है, साथ ही तड़ित से होने वाले लाभों और सुरक्षा सावधानियों पर भी चर्चा करता है।

स्थिर विद्युत का परिचय

स्थिर विद्युत अवधारणा मानचित्र
स्थिर विद्युत अवधारणा मानचित्र

स्थिर विद्युत, विद्युत आवेशों के अध्ययन से संबंधित है जो स्थिर अवस्था में होते हैं।

  • विद्युत धारा के विपरीत, स्थिर विद्युत में आवेशों का प्रवाह नहीं होता, बल्कि वे किसी वस्तु पर संचित रहते हैं।
  • दैनिक जीवन के उदाहरण:
  • सूखे बालों में कंघी करने पर कागज के छोटे टुकड़ों का आकर्षित होना।
  • टेलीविजन स्क्रीन के पास हाथ लाने पर 'चट-चट' की आवाज आना।
  • गुब्बारे या स्ट्रॉ को रगड़ने पर दीवार से चिपकना।
  • ये सभी घटनाएँ वस्तुओं पर विद्युत आवेश उत्पन्न होने के कारण होती हैं।

आवेशित और अनावेशित वस्तुएँ

  • अनावेशित वस्तुएँ: सामान्य परिस्थितियों में, वस्तुएँ आवेश की उपस्थिति नहीं दर्शातीं। उनमें धन और ऋण आवेशों की संख्या बराबर होती है, इसलिए वे विद्युत रूप से उदासीन होती हैं।
  • आवेशित वस्तुएँ: जब किसी वस्तु को किसी अन्य पदार्थ से रगड़ा जाता है, तो वह आवेश ग्रहण कर लेती है। ऐसी वस्तुएँ आवेशित वस्तुएँ कहलाती हैं।
  • उदाहरण: प्लास्टिक स्केल को कागज से रगड़ने पर वह आवेशित हो जाता है और कागज के टुकड़ों को आकर्षित करता है। लकड़ी का स्केल आमतौर पर आवेशित नहीं होता।

आवेशों की प्रकृति

  • आवेश दो प्रकार के होते हैं:
  1. धन आवेश (+): काँच की छड़ को रेशम से रगड़ने पर काँच की छड़ पर उत्पन्न आवेश।
  2. ऋण आवेश (-): प्लास्टिक की स्ट्रॉ को कागज से रगड़ने पर स्ट्रॉ पर उत्पन्न आवेश।
  • आकर्षण और प्रतिकर्षण:
  • समान आवेशों में प्रतिकर्षण होता है (जैसे: धन-धन, ऋण-ऋण)।
  • विपरीत आवेशों में आकर्षण होता है (जैसे: धन-ऋण)।
  • आवेशन की निश्चित पहचान: दो वस्तुओं के बीच प्रतिकर्षण ही यह निश्चित करता है कि दोनों वस्तुएँ आवेशित हैं। आकर्षण अनावेशित वस्तु और आवेशित वस्तु के बीच भी हो सकता है (प्रेरण के कारण)।
महत्त्वपूर्ण

किसी वस्तु पर आवेश उत्पन्न होने का अर्थ है, उसमें इलेक्ट्रॉन का स्थानांतरण। इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने वाली वस्तु ऋण आवेशित होती है, और इलेक्ट्रॉन त्यागने वाली वस्तु धन आवेशित होती है।

याद रखें

याद रखें:

  • काँच की छड़ + रेशम = काँच पर धन आवेश, रेशम पर ऋण आवेश
  • प्लास्टिक की स्ट्रॉ + कागज = स्ट्रॉ पर ऋण आवेश, कागज पर धन आवेश

आवेशित वस्तुओं के गुण

आवेशित वस्तुओं के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं:

  1. आकर्षण: प्रत्येक आवेशित वस्तु अनावेशित वस्तु को अपनी ओर आकर्षित करती है। (जैसे आवेशित कंघी कागज के टुकड़ों को आकर्षित करती है)।
  2. प्रतिकर्षण: एक ही प्रकार के आवेश (सजातीय आवेश) आपस में प्रतिकर्षित होते हैं।
  3. आकर्षण: विपरीत प्रकार के आवेश (विजातीय आवेश) एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।

विद्युत टेस्टर

  • उपयोग: किसी विद्युत परिपथ में विद्युत की उपस्थिति की जाँच करने के लिए।
  • संरचना:
  • एक धातु की छड़।
  • मध्य भाग प्लास्टिक या रबर की नली से ढका।
  • छड़ के एक सिरे पर कार्बन का प्रतिरोध।
  • प्रतिरोध के दूसरे सिरे से नियॉन बल्ब, स्प्रिंग, पीतल की घुंडी और हुक जुड़े होते हैं।
  • कार्यप्रणाली:
  • टेस्टर के खुले धातु छड़ को विद्युत परिपथ से और पीतल की घुंडी को हाथ से स्पर्श किया जाता है।
  • विद्युत आवेश धातु की छड़ से होता हुआ बल्ब, स्प्रिंग और हमारे शरीर से पृथ्वी में चला जाता है (भू-संपर्कन)
  • जब आवेश प्रवाहित होता है, तो नियॉन बल्ब जल उठता है, जो विद्युत की उपस्थिति दर्शाता है।

वस्तुओं को आवेशित करने की विभिन्न विधियाँ

वस्तुओं को मुख्य रूप से तीन विधियों से आवेशित किया जा सकता है:

1. घर्षण द्वारा आवेशन (Charging by Friction)

  • परिभाषा: जब दो वस्तुओं को आपस में रगड़ा जाता है, तो दोनों वस्तुएँ आवेशित हो जाती हैं। इसे घर्षण द्वारा आवेशन कहते हैं।
  • सिद्धांत: रगड़ने पर एक वस्तु से इलेक्ट्रॉन दूसरी वस्तु में स्थानांतरित होते हैं। जो वस्तु इलेक्ट्रॉन त्यागती है वह धन आवेशित हो जाती है और जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती है वह ऋण आवेशित हो जाती है।
  • उदाहरण:
  • काँच की छड़ को रेशम से रगड़ना।
  • प्लास्टिक की स्ट्रॉ को कागज से रगड़ना।
  • प्लास्टिक की कुर्सी को ऊनी कपड़े से रगड़ने पर उस पर बैठे बच्चे का आवेशित होना।
  • विशेषता: इस विधि में दोनों वस्तुएँ विपरीत प्रकृति के आवेश से आवेशित होती हैं।

2. संपर्क द्वारा आवेशन (Charging by Contact)

  • परिभाषा: जब एक आवेशित वस्तु को किसी अनावेशित वस्तु के संपर्क में लाया जाता है, तो अनावेशित वस्तु भी आवेशित हो जाती है।
  • सिद्धांत: आवेशित वस्तु से आवेश अनावेशित वस्तु में स्थानांतरित हो जाते हैं।
  • विशेषता: संपर्क द्वारा आवेशित वस्तु पर आवेशित करने वाली वस्तु के समान प्रकृति का आवेश उत्पन्न होता है।
  • उदाहरण: एक आवेशित प्लास्टिक स्केल को दूसरे अनावेशित प्लास्टिक स्केल से छूने पर दूसरा स्केल भी आवेशित हो जाता है।
  • ध्यान दें: धातुओं से बनी वस्तुओं को संपर्क द्वारा आवेशित करना कठिन हो सकता है, क्योंकि आवेश मानव शरीर के संपर्क में आने पर पृथ्वी में चला जाता है।

3. प्रेरण द्वारा आवेशन (Charging by Induction)

  • परिभाषा: जब किसी आवेशित वस्तु को किसी अनावेशित वस्तु के समीप लाया जाता है, लेकिन संपर्क नहीं कराया जाता, तो अनावेशित वस्तु पर आवेश उत्पन्न हो जाते हैं। इस विधि को प्रेरण द्वारा आवेशन कहते हैं।
  • सिद्धांत: आवेशित वस्तु के समीप आने पर अनावेशित वस्तु के मुक्त इलेक्ट्रॉन आकर्षित या प्रतिकर्षित होकर वस्तु के एक सिरे पर जमा हो जाते हैं, जिससे वस्तु के दोनों सिरे विपरीत आवेशित हो जाते हैं।
  • विशेषता: प्रेरण द्वारा आवेशित वस्तु के निकट वाले सिरे पर विपरीत आवेश और दूर वाले सिरे पर समान आवेश उत्पन्न होता है।
  • उदाहरण:
  • स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी में आवेशित छड़ को पास लाने पर पत्तियाँ फैल जाती हैं।
  • आवेशित बादल का पृथ्वी के समीप आने पर पृथ्वी पर विपरीत आवेश प्रेरित करना।
💡सुझाव

घर्षण, संपर्क और प्रेरण द्वारा आवेशन की विधियों को उनके उदाहरणों सहित स्पष्ट रूप से समझें। प्रत्येक विधि में आवेश की प्रकृति कैसे बदलती है, यह महत्वपूर्ण है।

🚧ग़लत धारणा

छात्र अक्सर सोचते हैं कि आकर्षण हमेशा यह दर्शाता है कि दोनों वस्तुएँ आवेशित हैं। यह गलत है! आकर्षण आवेशित और अनावेशित वस्तु के बीच भी हो सकता है। प्रतिकर्षण ही आवेश की निश्चित पहचान है।

स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी

स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी एक संवेदनशील उपकरण है जिसका उपयोग किसी वस्तु में आवेश की उपस्थिति का परीक्षण करने और आवेश की सापेक्ष मात्रा का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है।

  • संरचना:
  • काँच का एक जार।
  • जार के अंदर एक धातु की छड़, जिसके ऊपरी सिरे पर एक धातु की चकती (नॉब) होती है जो जार के बाहर होती है।
  • छड़ के निचले सिरे पर सोने की दो पतली पत्तियाँ (स्वर्ण पत्र) लगी होती हैं जो जार के अंदर लटकी रहती हैं।
  • जार के मुख पर एक कुचालक स्टॉपर लगा होता है ताकि आवेश बाहर न निकलें।
  • कार्यप्रणाली (प्रेरण द्वारा आवेशन):
  1. जब कोई आवेशित वस्तु (जैसे आवेशित काँच की छड़) विद्युतदर्शी की धातु की चकती के निकट लाई जाती है (बिना स्पर्श किए), तो प्रेरण के कारण छड़ और पत्तियों पर आवेश उत्पन्न हो जाते हैं।
  2. यदि आवेशित छड़ धन आवेशित है, तो चकती पर ऋण आवेश प्रेरित होगा और पत्तियों पर धन आवेश प्रेरित होगा।
  3. चूंकि दोनों पत्तियों पर समान आवेश (धन आवेश) आ जाता है, वे एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करती हैं और फैल जाती हैं। पत्तियों का फैलाव आवेश की मात्रा का संकेत देता है।
  4. आवेशित वस्तु को हटा लेने पर, पत्तियाँ वापस अपनी मूल स्थिति में आ जाती हैं।
  • संपर्क द्वारा आवेशन: यदि आवेशित वस्तु को चकती से स्पर्श कराया जाए, तो आवेश विद्युतदर्शी में स्थानांतरित हो जाते हैं, और पत्तियाँ स्थायी रूप से फैल जाती हैं।
  • महत्व: यह उपकरण स्थिर विद्युत के सिद्धांतों को समझने और आवेशों का पता लगाने में महत्वपूर्ण है।
महत्त्वपूर्ण

स्वर्ण पत्र विद्युतदर्शी में पत्तियों का फैलना हमेशा यह दर्शाता है कि विद्युतदर्शी पर आवेश है। पत्तियों का अधिक फैलाव अधिक आवेश का संकेत देता है।

वायुमंडल में आवेश (तड़ित)

वायुमंडल में होने वाली तड़ित (बिजली चमकना) की घटना आवेशों के विद्युत विसर्जन का एक प्राकृतिक उदाहरण है।

  • बादलों में आवेश का निर्माण:
  • बादलों में पानी की सूक्ष्म बूँदें और बर्फ के कण आपस में टकराते हैं।
  • इन टकरावों के कारण इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण होता है।
  • हल्की, सूक्ष्म बूँदें धन आवेश ग्रहण करती हैं और बादल के ऊपरी भाग में चली जाती हैं।
  • बड़ी, भारी बूँदें ऋण आवेश ग्रहण करती हैं और बादल के निचले भाग में जमा हो जाती हैं।
  • इस प्रकार, बादल के ऊपरी और निचले भागों के बीच विपरीत आवेशों का पृथक्करण हो जाता है।
  • विद्युत विसर्जन (तड़ित):
  • जब बादलों में आवेश की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है, तो उनके बीच की वायु (जो एक कुचालक है) का विद्युत रोधन टूट जाता है
  • अत्यधिक आवेशित बादलों के बीच या बादल और पृथ्वी के बीच अचानक विद्युत आवेश का प्रवाह होता है। इसे विद्युत विसर्जन कहते हैं।
  • यह विसर्जन वायु को उच्च ताप तक गर्म कर देता है, जिससे वह दीप्तिमान हो जाती है और हमें चमकदार प्रकाश (तड़ित) दिखाई देता है।
  • इस प्रक्रिया में उत्पन्न अत्यधिक ऊष्मा से वायु का तेजी से प्रसार होता है, जिससे तेज ध्वनि (मेघ गर्जन) उत्पन्न होती है।
  • तड़ित आघात: कभी-कभी विद्युत विसर्जन ऊँचे वृक्षों, भवनों या अन्य संरचनाओं से होता हुआ पृथ्वी में चला जाता है, जिससे उन्हें क्षति पहुँचती है। इसे तड़ित आघात कहते हैं। यह मनुष्यों और जीव-जंतुओं के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

तड़ित से लाभ

तड़ित की घटना से कुछ लाभ भी होते हैं:

  1. नाइट्रोजन स्थिरीकरण: तड़ित के समय उत्पन्न अत्यधिक ऊष्मा में वायुमंडल की नाइट्रोजन और ऑक्सीजन गैसें संयोग करके नाइट्रोजन के ऑक्साइड बनाती हैं। ये ऑक्साइड पानी में घुलकर पृथ्वी में आते हैं और पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक नाइट्रोजन यौगिक उपलब्ध कराते हैं।
  2. ओजोन परत का निर्माण: तड़ित के समय ऑक्सीजन गैस (O₂) ओजोन गैस (O₃) में परिवर्तित हो जाती है। ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों को पृथ्वी तक पहुँचने से रोकती है।

तड़ित चालक (Lightning Conductor)

तड़ित चालक एक सुरक्षा युक्ति है जो ऊँचे भवनों को तड़ित आघात से बचाती है।

  • संरचना:
  • धातु की एक मोटी और चपटी पट्टी।
  • इसका ऊपरी सिरा त्रिशूल के आकार का या नुकीला होता है और इसे भवन के सबसे ऊँचे भाग पर लगाया जाता है।
  • धातु की पट्टी का निचला सिरा भूमि में गहराई पर गड़ी हुई धातु (तांबे) की प्लेट से जुड़ा होता है।
  • कार्यप्रणाली:
  1. जब कोई आवेशित बादल भवन के ऊपर से गुजरता है, तो तड़ित चालक के नुकीले सिरे पर प्रेरण द्वारा विपरीत आवेश उत्पन्न हो जाता है।
  2. नुकीले सिरे से आवेश धीरे-धीरे वायुमंडल में विसर्जित होने लगते हैं, जिससे बादल और भवन के बीच संभावित तड़ित आघात की संभावना कम हो जाती है।
  3. यदि फिर भी तड़ित आघात होता है, तो आवेश तड़ित चालक के माध्यम से सुरक्षित रूप से पृथ्वी में चला जाता है, जिससे भवन को कोई हानि नहीं पहुँचती।
  • महत्व: तड़ित चालक भवनों, मनुष्यों और अन्य संरचनाओं को तड़ित के विनाशकारी प्रभावों से बचाता है।
याद रखें

तड़ित चालक का सिद्धांत प्रेरण और भू-संपर्कन (अर्थिंग) पर आधारित है। नुकीले सिरे आवेशों को धीरे-धीरे विसर्जित करने में मदद करते हैं।

महत्त्वपूर्ण

बैंजामिन फ्रेंकलिन ने 1752 में अपने पतंग प्रयोग से सिद्ध किया कि तड़ित एक वैद्युत घटना है।

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