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सजीवों में नियंत्रण एवं समवय
Chhattisgarh · Class 7 · 🔬 Science · Chapter 16

सजीवों में नियंत्रण एवं समवय

तंत्रिका तंत्रहार्मोनप्रतिवर्ती क्रियामस्तिष्क और मेरुरज्जुअंतःस्रावी ग्रंथियाँपादप हार्मोन

यह अध्याय सजीवों में नियंत्रण और समन्वय की जटिल प्रक्रियाओं की पड़ताल करता है। छात्र तंत्रिका तंत्र के घटकों - मस्तिष्क, मेरुरज्जु और तंत्रिकाओं - के बारे में सीखते हैं, और वे शरीर की विभिन्न क्रियाओं को कैसे नियंत्रित करते हैं। प्रतिवर्ती क्रियाओं और उनके महत्व को समझाया गया है। इसके अतिरिक्त, अध्याय रासायनिक समन्वय में हार्मोन की भूमिका, प्रमुख अंतःस्रावी ग्रंथियों और उनके कार्यों पर प्रकाश डालता है। पौधों में नियंत्रण और समन्वय, विशेष रूप से पादप हार्मोन द्वारा वृद्धि के नियमन को भी शामिल किया गया है। यह अध्याय छात्रों को सजीवों के शरीर के भीतर होने वाली आश्चर्यजनक आंतरिक कार्यप्रणाली की गहरी समझ प्रदान करता है।

नियंत्रण एवं समन्वय की आवश्यकता और तंत्रिका तंत्र

सजीवों में सभी जैविक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए नियंत्रण एवं समन्वय आवश्यक है। यह शरीर को बाहरी और आंतरिक वातावरण के प्रति उचित प्रतिक्रिया देने में मदद करता है।

नियंत्रण एवं समन्वय के प्रकार:

  1. तंत्रिका तंत्र द्वारा: यह तीव्र और अल्पकालिक प्रतिक्रियाओं के लिए जिम्मेदार होता है।
  2. रासायनिक पदार्थों (हॉर्मोन) द्वारा: यह धीमी और दीर्घकालिक प्रतिक्रियाओं के लिए जिम्मेदार होता है।

मानव तंत्रिका तंत्र के प्रमुख अंग:

  • मस्तिष्क:
  • शरीर का सबसे कोमल और महत्वपूर्ण अंग
  • खोपड़ी के अंदर सुरक्षित रहता है।
  • बोलना, सुनना, पहचानना, स्पर्श, स्वाद, गंध जैसी सभी ऐच्छिक क्रियाओं और संवेदी अनुभवों को नियंत्रित करता है।
  • शरीर में होने वाली सभी क्रियाओं की जानकारी प्राप्त करता है और उन पर नियंत्रण रखता है।
  • मेरुरज्जु:
  • मस्तिष्क का पिछला भाग जो पतला होकर लंबी बेलनाकार नली का रूप ले लेता है।
  • रीढ़ की हड्डी की नलिका में सुरक्षित रहता है।
  • तंत्रिकाओं के माध्यम से शरीर के हर हिस्से से जुड़ा होता है।
  • शरीर में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी मस्तिष्क तक पहुँचाता है और प्रतिवर्ती क्रियाओं का संचालन करता है।
  • तंत्रिकाएँ:
  • धागे के समान संरचनाएँ जो शरीर में जाल के समान फैली होती हैं।
  • शरीर के प्रत्येक भाग को मेरुरज्जु तथा मस्तिष्क से जोड़ती हैं।
  • प्रकार:
  1. संवेदी तंत्रिकाएँ (Afferent Nerves): ये तंत्रिकाएँ शरीर के विभिन्न भागों से सूचना (उद्दीपन) को मस्तिष्क अथवा मेरुरज्जु तक ले जाती हैं।
  2. प्रेरक तंत्रिकाएँ (Efferent Nerves): ये तंत्रिकाएँ मस्तिष्क अथवा मेरुरज्जु से आदेश को शरीर के विभिन्न अंगों (पेशियों या ग्रंथियों) तक लाती हैं ताकि उचित अनुक्रिया हो सके।
  • संवेदी अंग (ज्ञानेन्द्रियाँ):
  • वे अंग जो बाहरी उद्दीपनों को ग्रहण करते हैं।
  • मुख्य संवेदी अंग: त्वचा, नाक, जीभ, आँख और कान।

उद्दीपक और अनुक्रिया:

  • उद्दीपक (Stimulus): हमारे आसपास या शरीर के अंदर होने वाले वे परिवर्तन जिनके प्रति शरीर प्रतिक्रिया करता है।
  • बाह्य उद्दीपक: गर्म वस्तु का स्पर्श, तेज आवाज, प्रकाश, गंध आदि।
  • आंतरिक उद्दीपक: पाचक नली में भोजन पहुँचने पर पाचक रसों का स्राव, भूख, प्यास आदि।
  • अनुक्रिया (Response): उद्दीपक के प्रति शरीर द्वारा की गई प्रतिक्रिया।
  • उदाहरण: गर्म वस्तु से हाथ हटना, तेज आवाज से चौंकना।

सारणी 16.1 का विस्तार (NCERT):

| क्र. | परिस्थिति | उद्दीपक | अनुक्रिया | |---|---|---|---| | 1. | धमाके की आवाज़ से चौंकना | धमाके की आवाज | चौंकना | | 2. | परीक्षा के नजदीक आने पर घबराहट होना | परीक्षा का दबाव | घबराहट, हृदय गति बढ़ना | | 3. | ठंड में ठिठुरना | ठंड | ठिठुरना, कंपकंपी | | 4. | मनपसन्द भोजन देख कर मुँह में पानी आना | मनपसंद भोजन का दिखना/सोचना | लार का स्राव | | 5. | आवाज की दिशा में गर्दन घुमाना | आवाज | गर्दन घुमाना |

[IMAGE: cg_c7_science_ch16_chapter_hero] मानव शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय के दो मुख्य तरीके: तंत्रिका तंत्र द्वारा और रासायनिक पदार्थों द्वारा।

महत्त्वपूर्ण

तंत्रिका तंत्र शरीर में सूचनाओं का तीव्र संचरण करता है, जबकि रासायनिक समन्वय (हॉर्मोन) धीमी गति से और दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। दोनों मिलकर शरीर के कार्यों को नियंत्रित करते हैं।

याद रखें

मस्तिष्क और मेरुरज्जु मिलकर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) बनाते हैं। तंत्रिकाएँ परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS) का हिस्सा होती हैं।

प्रतिवर्ती क्रियाएँ और प्रतिवर्ती चाप

शरीर में होने वाली क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं:

1. ऐच्छिक क्रियाएँ (Voluntary Actions):

  • वे क्रियाएँ जो हमारी इच्छाशक्ति के नियंत्रण में होती हैं।
  • उदाहरण: उठना, बैठना, चलना, बोलना, लिखना, गर्दन घुमाना, झुकना।

2. अनैच्छिक क्रियाएँ (Involuntary Actions):

  • वे क्रियाएँ जो हमारी इच्छा के नियंत्रण में नहीं होतीं, बल्कि स्वतः ही होती रहती हैं।
  • उदाहरण: हृदय का धड़कना, पाचन, पलकें झपकना, लार आना, छींकना, ठंड में काँपना।

प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Reflex Actions):

  • विशेष प्रकार की अनैच्छिक क्रियाएँ जो किसी बाहरी उद्दीपन के प्रति शरीर की तीव्र, स्वचालित और अचानक प्रतिक्रिया होती हैं।
  • ये क्रियाएँ अक्सर शरीर को संभावित क्षति या खतरे से बचाने के लिए होती हैं।
  • इनमें सोचने-समझने का समय नहीं लगता क्योंकि इनका संचालन सीधे मेरुरज्जु से होता है, मस्तिष्क से नहीं। मस्तिष्क को इसकी सूचना क्रिया संपन्न होने के बाद मिलती है।
  • उदाहरण: गर्म वस्तु से हाथ हटना, आँखों में धूल जाने पर पलकें झपकना, तेज धूप में आँखों का सिकुड़ना, रास्ता पार करते समय अचानक गाड़ी आने पर रुक जाना।

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प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc):

  • वह मार्ग जिसके माध्यम से प्रतिवर्ती क्रिया संपन्न होती है। यह एक तंत्रिका मार्ग है जो उद्दीपन से अनुक्रिया तक जाता है।
  • इसमें मुख्य रूप से पाँच घटक होते हैं:
  1. उद्दीपक: वह कारक जो प्रतिक्रिया को उत्तेजित करता है (जैसे गर्म वस्तु)।
  2. संवेदी अंग (ग्राही): जो उद्दीपन को ग्रहण करता है (जैसे त्वचा)।
  3. संवेदी तंत्रिका (Afferent Nerve): जो संदेश को संवेदी अंग से मेरुरज्जु तक ले जाती है।
  4. मेरुरज्जु: जो संदेश का विश्लेषण कर प्रतिक्रिया का आदेश देती है (यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र का हिस्सा है)।
  5. प्रेरक तंत्रिका (Efferent Nerve): जो मेरुरज्जु से आदेश को संबंधित पेशी या ग्रंथि तक ले जाती है।
  6. पेशी/ग्रंथि (कार्यकारी अंग): जो प्रतिक्रिया करती है (जैसे हाथ की पेशी का सिकुड़ना)।

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सारणी 16.2 का विस्तार (NCERT):

| क्र. | क्रिया | संवेदी अंग | |---|---|---| | 1. | सुई का चुभना | त्वचा | | 2. | फूलों की खुशबू | नाक | | 3. | स्वाद चखना | जीभ | | 4. | रंग दिखाई देना | आँख | | 5. | आवाज सुनना | कान | | 6. | गर्म वस्तु का स्पर्श | त्वचा |

💡सुझाव

प्रतिवर्ती क्रिया और प्रतिवर्ती चाप का नामांकित चित्र बनाना अक्सर परीक्षा में पूछा जाता है। इसके घटकों को सही क्रम में याद रखें।

🚧ग़लत धारणा

छात्र अक्सर प्रतिवर्ती क्रिया को मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित मानते हैं। याद रखें, प्रतिवर्ती क्रियाओं का मुख्य केंद्र मेरुरज्जु है, मस्तिष्क को सूचना बाद में मिलती है।

रासायनिक समन्वय और अंतःस्रावी ग्रंथियाँ

तंत्रिका तंत्र के अलावा, शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय का एक और महत्वपूर्ण तरीका रासायनिक समन्वय है, जो हॉर्मोन नामक रासायनिक पदार्थों द्वारा होता है।

अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (Endocrine Glands):

  • ये वे ग्रंथियाँ हैं जो अपने स्रावों (हॉर्मोन) को सीधे रक्तप्रवाह में छोड़ती हैं।
  • इन्हें नलिकाविहीन ग्रंथियाँ भी कहा जाता है, क्योंकि इनमें स्रावों को ले जाने के लिए कोई विशिष्ट नलिकाएँ नहीं होतीं।
  • हॉर्मोन रक्त परिसंचरण के माध्यम से शरीर के दूरस्थ भागों में स्थित लक्षित कोशिकाओं या अंगों तक पहुँचते हैं और उनकी क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।

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हॉर्मोन (Hormones):

  • ये रासायनिक संदेशवाहक होते हैं जो शरीर की विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं जैसे वृद्धि, विकास, प्रजनन, उपापचय आदि को नियंत्रित करते हैं।
  • ये बहुत कम मात्रा में स्रावित होते हैं, लेकिन इनका प्रभाव बहुत विशिष्ट और महत्वपूर्ण होता है।

प्रमुख अंतःस्रावी ग्रंथियाँ और उनके कार्य:

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  1. पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland):
  • स्थिति: मस्तिष्क के निचले भाग में।
  • आकार: मटर के दाने के बराबर।
  • महत्व: इसे 'मास्टर ग्रंथि' भी कहते हैं, क्योंकि यह अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों को हॉर्मोन स्रावित करने के लिए उत्तेजित करती है।
  • प्रमुख हॉर्मोन:
  • वृद्धि हॉर्मोन (Growth Hormone): शरीर की लंबाई में वृद्धि को नियंत्रित करता है।
  • अधिकता: शरीर की लंबाई अत्यधिक बढ़ जाती है (अतिकायता)।
  • कमी: व्यक्ति बौना रह जाता है (बौनापन)।
  1. थायरॉयड ग्रंथि (Thyroid Gland):
  • स्थिति: गले में।
  • कार्य: शरीर में होने वाली उपापचयी क्रियाओं को नियंत्रित करने वाले हॉर्मोन बनाती है।
  • आवश्यकता: इस ग्रंथि के सुचारू रूप से कार्य करने के लिए आयोडीन की आवश्यकता होती है।
  • कमी: आयोडीन की कमी से थायरॉयड ग्रंथि बढ़ जाती है, जिससे घेंघा रोग होता है (गले में सूजन)।
  1. अग्न्याशय (Pancreas):
  • स्थिति: पेट के पीछे।
  • यह एक मिश्रित ग्रंथि है, जो पाचक रस (बहिःस्रावी) और हॉर्मोन (अंतःस्रावी) दोनों स्रावित करती है।
  • प्रमुख हॉर्मोन:
  • इंसुलिन (Insulin): रक्त में शर्करा (ग्लूकोज) की मात्रा को नियंत्रित करता है।
  • कमी: इंसुलिन की कमी से रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे मधुमेह (Diabetes) नामक बीमारी होती है। मधुमेह के रोगियों को मीठी चीजों से परहेज करना पड़ता है।
  1. वृषण (Testis) (पुरुषों में):
  • स्थिति: पुरुषों में उदर गुहा के बाहर वृषण कोष में।
  • कार्य: पुरुष द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के विकास के लिए उत्तरदायी हॉर्मोन स्रावित करते हैं।
  • उदाहरण: दाढ़ी-मूंछों का उगना, शरीर पर बालों का आना, आवाज का भारी होना, पेशियों का विकास।
  1. अंडाशय (Ovary) (महिलाओं में):
  • स्थिति: महिलाओं में उदर गुहा में।
  • कार्य: नारी सुलभ लक्षणों (मासिक धर्म चक्र, स्तन विकास आदि) के विकास के लिए उत्तरदायी हॉर्मोन स्रावित करते हैं।

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📖परिभाषा

हॉर्मोन: वे रासायनिक पदार्थ जो अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा सीधे रक्त में स्रावित होते हैं और शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

महत्त्वपूर्ण

पीयूष ग्रंथि को 'मास्टर ग्रंथि' कहा जाता है क्योंकि यह अन्य ग्रंथियों के कार्यों को नियंत्रित करती है।

💡सुझाव

प्रत्येक ग्रंथि की स्थिति, स्रावित हॉर्मोन और उसके कार्य/कमी से होने वाले रोग को याद रखना महत्वपूर्ण है। मधुमेह और घेंघा रोग अक्सर पूछे जाते हैं।

पौधों में नियंत्रण एवं समन्वय और पादप हॉर्मोन

जंतुओं की तरह पौधों में भी नियंत्रण एवं समन्वय होता है, लेकिन उनमें तंत्रिका तंत्र नहीं पाया जाता। पौधे अपने पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों (उद्दीपन) के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।

पौधों में संवेदनशीलता:

  • पौधे प्रकाश, जल, स्पर्श, गुरुत्वाकर्षण, रसायन आदि के प्रति संवेदनशील होते हैं।
  • यह संवेदनशीलता उन्हें जीवित रहने, बढ़ने और प्रजनन करने में मदद करती है।
  • उदाहरण: सूरजमुखी का सूर्य की ओर मुड़ना, छुईमुई के पौधे का छूने पर सिकुड़ना, जड़ों का पानी की ओर बढ़ना।

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पादप हॉर्मोन (Phytohormones):

  • ये पौधों द्वारा उत्पादित रासायनिक पदार्थ होते हैं जो उनकी वृद्धि, विकास और पर्यावरणीय उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
  • इन्हें वृद्धि-नियंत्रक हॉर्मोन भी कहा जाता है।
  • ये हॉर्मोन बहुत कम मात्रा में बनते हैं, लेकिन पौधों के जीवन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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प्रमुख पादप हॉर्मोन और उनके कार्य:

| क्र. | हॉर्मोन | कार्य | |---|---|---| | 1. | ऑक्सिन (Auxin) | पौधों में वृद्धि को प्रेरित करता है (कोशिका वृद्धि और कोशिका विभाजन)। तने की लंबाई में वृद्धि में सहायक। | | 2. | जिबरेलिन (Gibberellin) | पौधों में पुष्प खिलने को प्रेरित करता है। तने की लंबाई बढ़ाता है और बीज के अंकुरण में मदद करता है। | | 3. | साइटोकाइनिन (Cytokinin) | पौधों में कोशिका विभाजन को प्रेरित करता है। पत्तियों को हरा-भरा रखने में सहायक। | | 4. | एब्सिसिक एसिड (Abscisic Acid - ABA) | पौधों में वृद्धि को रोकने का कार्य करता है। पत्तियों के झड़ने, बीजों की प्रसुप्ति (dormancy) और रंध्रों को बंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे वृद्धि संदमक हॉर्मोन भी कहते हैं। |

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महत्त्वपूर्ण

पौधों में तंत्रिका तंत्र नहीं होता, फिर भी वे हॉर्मोन के माध्यम से उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।

💡सुझाव

पादप हॉर्मोन के नाम और उनके विशिष्ट कार्य अक्सर एक या दो अंक के प्रश्नों में पूछे जाते हैं। विशेष रूप से ऑक्सिन और एब्सिसिक एसिड के विपरीत कार्य को समझें।

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