कितना भोजन, कैसा भोजन
यह अध्याय छात्रों को विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों, उनमें मौजूद पोषक तत्वों (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन और खनिज लवण) और उनके महत्व के बारे में सिखाता है। इसमें संतुलित भोजन की आवश्यकता, कुपोषण के प्रभाव और जल के महत्व पर भी चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त, यह अध्याय खाद्य पदार्थों के परीक्षण और उनके संरक्षण के विभिन्न तरीकों जैसे अचार बनाना, सुखाना और ठंडा रखना सिखाता है। यह छात्रों को स्वस्थ जीवन शैली के लिए भोजन के महत्व को समझने में मदद करता है।
विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ: ऊर्जा और वृद्धि के लिए
हमारे भोजन में मुख्य रूप से एक या दो पदार्थ होते हैं, जैसे चावल, गेहूँ, मक्का, बाजरा, ज्वार, कोदो, कुटकी, आलू, केला या रतालू। इन मुख्य पदार्थों का अधिकांश भाग कार्बोहाइड्रेट होता है।
- कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates):
- मुख्य रूप से ऊर्जा प्रदान करते हैं।
- स्रोत: चावल, गेहूँ, मक्का, बाजरा, ज्वार, आलू, गुड़, शक्कर, शहद।
- यदि कोई व्यक्ति केवल कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन ही खाए तो वह कमजोर हो जाएगा और उसे कई बीमारियाँ हो सकती हैं, क्योंकि संतुलित भोजन में अन्य पोषक तत्व भी आवश्यक होते हैं।
- प्रोटीन (Proteins):
- शरीर के ठीक से बढ़ने और मस्तिष्क के अच्छे विकास के लिए आवश्यक।
- शरीर के नए भाग बनाने और टूट-फूट की मरम्मत में सहायक।
- स्रोत: सभी प्रकार की दालें (मूंग, तुअर, चना), सोयाबीन, मूँगफली, मटर, दूध, दही, अंडा, मछली और माँस।
- वसा (Fats):
- ऊर्जा प्रदान करते हैं, कार्बोहाइड्रेट से अधिक ऊर्जा देते हैं।
- स्रोत: मक्खन, घी, सभी प्रकार के तेल (मूंगफली का तेल, सरसों का तेल)।
याद रखें: केवल एक प्रकार का भोजन खाने से शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिलते।
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कार्बोहाइड्रेट और वसा मुख्य रूप से ऊर्जा देते हैं, जबकि प्रोटीन शरीर के निर्माण और मरम्मत के लिए आवश्यक है।
विटामिन और खनिज लवण: रोगों से बचाव
विटामिन और खनिज लवण पोषक पदार्थों का एक ऐसा समूह है जो हमें स्वस्थ रखता है और रोगों से बचाता है। इनकी आवश्यकता बहुत कम मात्रा में होती है, लेकिन इनकी कमी से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- विटामिन (Vitamins):
- शरीर को रोगों से बचाने और सामान्य कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक।
- इन्हें ए, बी, सी, डी, ई, के आदि नामों से जाना जाता है।
- विटामिन सीधे ऊर्जा नहीं देते, बल्कि शरीर को ऊर्जा का उपयोग करने और अन्य कार्यों को करने में सहायता करते हैं।
- खनिज लवण (Minerals):
- शरीर की विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक।
- महत्वपूर्ण खनिज लवण: आयोडीन, लोहा (आयरन), फास्फोरस और कैल्शियम।
विटामिन और खनिज लवण के स्रोत:
- सभी हरी पत्तेदार सब्जियाँ (पालक, मेथी, मुनगा/सहजन)
- फल (पपीता, आँवला, आम, संतरा, नीबू, अमरूद)
- गाजर, कद्दू, इमली, चुकंदर
- गुड़, माँस, अंडे, दूध
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विटामिन और खनिज लवणों की आवश्यकता सूक्ष्म मात्रा में होती है, लेकिन इनकी कमी से गंभीर रोग हो सकते हैं।
पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोग
विभिन्न विटामिनों और खनिज लवणों की कमी से शरीर में कई रोग हो सकते हैं।
- विटामिन A:
- स्रोत: दूध, अंडे का पीला भाग, कलेजी, हरी सब्जियाँ, टमाटर, गाजर।
- कमी से रोग: रतौंधी (रात को दिखाई न देना)।
- विटामिन B (समूह):
- स्रोत: अनाज, माँस, दूध, दही, मक्खन, अंडे।
- कमी से रोग: रक्त की कमी, रीढ़ की हड्डी का टेढ़ापन, बेरी-बेरी (तंत्रिका तंत्र का ठीक से काम न करना)।
- विटामिन C:
- स्रोत: आँवला, संतरा, नीबू, अमरूद जैसे खट्टे फल।
- कमी से रोग: स्कर्वी (त्वचा/चमड़ी के रोग, मसूड़ों से खून आना)।
- विटामिन D:
- स्रोत: दूध, दही, मक्खन, छाछ। धूप की उपस्थिति में शरीर में स्वतः बनता है।
- कार्य: हड्डियों तक कैल्शियम पहुँचाने में मदद करता है।
- कमी से रोग: रिकेट्स (हड्डियाँ कमजोर होकर टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं)।
- लौह तत्व (Iron):
- स्रोत: हरी पत्तेदार सब्जियाँ, गुड़, इमली, चुकंदर, बाजरा, माँस, अंडे, मछली।
- कमी से रोग: रक्ताल्पता (एनीमिया)।
- लक्षण: त्वचा फीकी/सफेद, जीभ चमकदार/चिकनी, आँखों की पलकों के अंदर का भाग, नाखून और मसूड़े रंगहीन, कमजोरी, जल्दी थकावट।
- आयोडीन (Iodine):
- स्रोत: आयोडीन युक्त नमक, समुद्री भोजन।
- कमी से रोग: घेंघा (गर्दन में सूजन)।
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छात्र अक्सर विटामिन और खनिज लवणों को ऊर्जा प्रदान करने वाले पोषक तत्व मान लेते हैं। याद रखें, ये रोगों से बचाव और शरीर के कार्यों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं, सीधे ऊर्जा नहीं देते।
जल और रुक्षांश: शरीर के लिए अनिवार्य
जल और रुक्षांश सीधे पोषक तत्व नहीं हैं, लेकिन शरीर के उचित कार्यप्रणाली के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
- जल (Water):
- हमारे शरीर का लगभग 70% हिस्सा जल से बना है।
- कार्य: पोषक तत्वों और ऑक्सीजन का परिवहन, शरीर के तापमान का नियंत्रण, जोड़ों को चिकनाई देना, शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालना।
- आवश्यकता: स्वस्थ मनुष्य को प्रतिदिन 2 से 3 लीटर पानी पीना चाहिए।
- जल शुद्धिकरण:
- देखने में स्वच्छ जल में भी रोग-वाहक सूक्ष्म जीव और घुले हुए अपद्रव्य हो सकते हैं।
- पीने से पहले जल को शुद्ध करना आवश्यक है। पीने योग्य जल को पेय जल कहते हैं।
- शुद्धिकरण के तरीके:
- छनन (फिल्ट्रेशन): कैंडल फिल्टर का उपयोग करके अपद्रव्यों को दूर करना (भौतिक विधि)।
- उबालना: जल में उपस्थित जीवाणुओं को मारना।
- क्लोरीनीकरण: जल में क्लोरीन की गोलियाँ या विरंजक चूर्ण मिलाकर सूक्ष्म जीवों को नष्ट करना (रासायनिक विधि)। निर्धारित मात्रा से अधिक क्लोरीन का उपयोग न करें।
- रुक्षांश (Roughage/Fibre):
- पौधों से प्राप्त होने वाले खाद्य पदार्थों का वह हिस्सा जिसे हमारा शरीर पूरी तरह से पचा नहीं पाता।
- स्रोत: फल, कच्ची सब्जियाँ (ककड़ी, गाजर, मूली, चुकंदर), साबुत अनाज, दालें।
- कार्य: पाचन तंत्र को साफ रखता है, मल त्याग को नियमित करता है, कब्ज से बचाता है, अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है।
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जल शुद्धिकरण की विधियों (छनन, उबालना, क्लोरीनीकरण) को उनके कार्यप्रणाली के साथ याद रखें। यह अक्सर परीक्षा में पूछा जाता है।
कुपोषण: कारण और समाधान
कुपोषण वह स्थिति है जब शरीर को वृद्धि, विकास और सामान्य कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते।
- कुपोषण के कारण:
- भरपेट भोजन न मिलना।
- ऐसा भोजन मिलना जिसमें सभी आवश्यक पोषक पदार्थ (कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण) सही अनुपात में न हों (असंतुलित भोजन)।
- कुपोषण के प्रभाव:
- शरीर कमजोर पड़ जाता है।
- बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिससे बच्चे जल्दी बीमार पड़ते हैं।
- बीमारी और कुपोषण का एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है।
- कुपोषण का समाधान:
- संतुलित और भरपेट भोजन ही कुपोषण का एकमात्र इलाज है।
- कुपोषित बच्चों के लिए घरेलू उपाय (पाठ्यपुस्तक के अनुसार):
- बराबर मात्रा में मूंगफली, गेहूँ और चना मिलाकर आटा बना लें।
- इस आटे को तेल में भूनकर गुड़ मिला लें।
- इस खुराक को कुपोषित बच्चे को रोज खिलाने से वह ठीक हो सकता है।
- ठीक होने के बाद भी यह खुराक देते रहना चाहिए ताकि बच्चा पूरी तरह स्वस्थ रहे।
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कुपोषण केवल भोजन की कमी से नहीं, बल्कि असंतुलित भोजन से भी हो सकता है, जहाँ सभी पोषक तत्व सही अनुपात में नहीं होते।
खाद्य पदार्थों की जाँच: पोषक तत्वों की पहचान
हम विभिन्न रासायनिक परीक्षणों द्वारा खाद्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट (मंड), प्रोटीन और वसा की उपस्थिति का पता लगा सकते हैं।
1. आयोडीन का घोल (मंड परीक्षण के लिए):
- बनाने की विधि: टिंक्चर आयोडीन की 10 बूँदें एक परखनली में लेकर उसमें इतना पानी मिलाएँ कि हल्का पीला घोल बन जाए।
- मंड परीक्षण: जिस पदार्थ का परीक्षण करना हो उस पर आयोडीन के हल्के घोल की 2-4 बूँदें डालें।
- परिणाम: यदि रंग गहरा नीला या काला हो जाए, तो उस पदार्थ में मंड (starch) उपस्थित है।
2. नीले थोथे (कॉपर सल्फेट) का घोल (प्रोटीन परीक्षण के लिए):
- बनाने की विधि: 2 ग्राम नीला थोथा 100 मिली पानी में घोलें।
3. कास्टिक सोडे का घोल (प्रोटीन परीक्षण के लिए):
- बनाने की विधि: 10 ग्राम कास्टिक सोडा 100 मिली पानी में घोलें।
4. प्रोटीन परीक्षण:
- जिस पदार्थ का परीक्षण करना है, उसकी 10 बूँदें एक साफ परखनली में लें। यदि ठोस है, तो पीसकर 10 बूँद पानी डालकर हिलाएँ।
- इसमें नीले थोथे के 2% घोल की 2 बूँद और कास्टिक सोडे के 10% घोल की 10 बूँद डालकर अच्छी तरह हिलाएँ।
- परिणाम: यदि रंग जामुनी या बैंगनी हो जाए, तो उसमें प्रोटीन उपस्थित है।
5. वसा परीक्षण:
- जिस पदार्थ का परीक्षण करना है, उसकी थोड़ी सी मात्रा लेकर एक कागज के टुकड़े पर हल्के से रगड़ें।
- परिणाम: यदि कागज चिकना और अल्प-पारदर्शक हो जाए, तो उस पदार्थ में वसा उपस्थित है।
- सावधानी: मिट्टी का तेल, डीजल या मोम भी कागज को पारदर्शक कर सकते हैं, लेकिन ये खाने के पदार्थ नहीं हैं और इनमें वसा नहीं होती।
निष्कर्ष: प्रायः एक खाद्य वस्तु में कई प्रकार के पोषक पदार्थ पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, अंडे में वसा, प्रोटीन, विटामिन और खनिज लवण होते हैं। लेकिन कुछ पदार्थों में केवल एक ही पोषक तत्व होता है, जैसे शक्कर में केवल कार्बोहाइड्रेट और घी/तेल में केवल वसा।
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प्रोटीन, वसा और मंड के परीक्षण के लिए उपयोग किए जाने वाले रसायनों और उनके रंग परिवर्तन को याद रखना महत्वपूर्ण है। यह प्रायोगिक प्रश्न के रूप में आ सकता है।
संतुलित भोजन क्यों जरूरी है?
संतुलित भोजन वह है जिसमें शरीर के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व – कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज लवण और जल – सही मात्रा में मौजूद हों। यह शरीर को स्वस्थ रखने और ठीक से काम करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
संतुलित भोजन के लाभ:
- ऊर्जा प्रदान करना: शरीर के अंदर चलने वाली विभिन्न क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है।
- शारीरिक वृद्धि: शरीर के नए भाग बनते हैं, जिससे बच्चों का शरीर लगातार बढ़ता रहता है। असंतुलित भोजन से वृद्धि बाधित होती है।
- मरम्मत और रखरखाव: शरीर के भागों में होने वाली टूट-फूट की मरम्मत करता है।
- रोगों से बचाव: विटामिन और खनिज लवण रोगों से लड़ने की शक्ति (रोग प्रतिरोधक क्षमता) प्रदान करते हैं।
याद रखने योग्य कुछ बातें:
- अधिक मिठाई, मसालेदार और तली हुई चीजें तथा अधिक चाय-कॉफी पाचन तंत्र को खराब कर सकते हैं।
- महंगे खाद्य पदार्थों में हमेशा अधिक पोषक तत्व नहीं होते। हरी पत्तेदार सब्जियाँ और गाजर, कद्दू जैसी पीली सब्जियों में गोभी और शिमला मिर्च की तुलना में अधिक पोषक तत्व हो सकते हैं। आँवला और अमरूद में भी काफी विटामिन होते हैं।
- खाना बनाने और खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोना चाहिए ताकि कीटाणु पेट में न जाएँ।
- बच्चों, गर्भवती स्त्रियों और दूध पिलाने वाली माताओं को अधिक मात्रा में संतुलित भोजन की आवश्यकता होती है।
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संतुलित भोजन शरीर को ऊर्जा, वृद्धि, मरम्मत और रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।
खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकना
हमारे देश में बहुत सारे खाद्य पदार्थ बर्बाद हो जाते हैं, या तो लोगों द्वारा बर्बाद किए जाने के कारण या फिर कीड़ों, चूहों, फफूंद आदि के कारण खाने योग्य न रहने के कारण। हवा में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु भी खाद्य पदार्थों को सड़ा देते हैं। इसलिए खाद्य पदार्थों को इन सबसे बचाना बहुत महत्वपूर्ण है।
खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकने के उपाय:
- कीड़ों से सुरक्षा:
- खेतों में खड़ी फसल को कीटनाशकों (जैसे DDT, BHC) से बचाया जाता है, लेकिन ये जहरीले रसायन मनुष्य को नुकसान पहुँचाते हैं।
- आजकल नीम या तम्बाकू की पत्तियों का रस जैसे परम्परागत और जैविक कीटनाशकों का उपयोग करने की कोशिश की जा रही है।
- चूहों से सुरक्षा:
- चूहे अनाज का लगभग पाँचवाँ हिस्सा खा जाते हैं।
- अनाज का भंडारण सुरक्षित स्थानों पर करना चाहिए जहाँ चूहे न पहुँच सकें।
- दूषण से सुरक्षा:
- भोजन को हमेशा ढककर रखना चाहिए ताकि मक्खियाँ, कॉकरोच आदि कीड़े उस पर न बैठें। ये कीड़े अपने पैरों पर अनगिनत कीटाणु लाते हैं जो भोजन को दूषित कर देते हैं और रोग फैलाते हैं।
- पालतू जानवरों को भी भोजन से दूर रखना चाहिए।
- भोजन की बर्बादी रोकना:
- आवश्यकता से अधिक भोजन न लें ताकि उसे फेंकना न पड़े।
- आवश्यकता से अधिक भोजन पकाने पर उसकी उचित सुरक्षा व्यवस्था करें ताकि वह खराब न हो।
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भोजन की बर्बादी रोकने के लिए सुरक्षित भंडारण, दूषण से बचाव और आवश्यकतानुसार उपयोग महत्वपूर्ण हैं।
खाद्य पदार्थों का परिरक्षण
खाद्य पदार्थों के रखरखाव या उन्हें सुरक्षित रखने को परिरक्षण (Preservation) कहते हैं। इसका उद्देश्य सूक्ष्मजीवों (बैक्टीरिया, फफूंद), कीड़ों और ऑक्सीकरण से होने वाली क्षति से बचाना है, जिससे उनकी शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है।
परिरक्षण के तरीके:
- अचार बनाना (Pickling):
- तेल और नमक जैसे परिरक्षक फफूंद और अन्य सूक्ष्म कीटाणुओं की वृद्धि को रोकते हैं।
- यदि तेल और नमक कम हो जाए तो अचार खराब हो सकता है।
- तेल और नमक एक सुरक्षात्मक परत बनाते हैं और सूक्ष्मजीवों के विकास के लिए अनुपयुक्त वातावरण बनाते हैं।
- सुखाना (Drying):
- खाद्य पदार्थों से पानी हटा देना।
- पानी सूक्ष्मजीवों के जीवन और वृद्धि के लिए आवश्यक है, इसलिए इसे हटाने से भोजन लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।
- उदाहरण: हरी सब्जियाँ, प्याज, मिर्च, अनाज, दालें।
- नमक के उपयोग द्वारा (By using Salt):
- कुछ पदार्थों के टुकड़े काटकर उन्हें नमक लगाकर सुखाया जाता है (जैसे मछली, माँस)।
- नमक पानी को सोख लेता है और सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकता है।
- मुरब्बा बनाना (Making Jams/Murabbas):
- फलों को इस विधि से परिरक्षित किया जाता है।
- शक्कर की अधिक मात्रा फफूंद से खाद्य पदार्थ का बचाव करती है, क्योंकि उच्च शक्कर सांद्रता पानी को बांध लेती है, जिससे सूक्ष्मजीवों को इसका उपयोग करने से रोका जाता है।
- खाद्य पदार्थों को ठंडा रखना (Freezing/Refrigeration):
- खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का एक आसान तरीका है उन्हें ठंडा रखना।
- रेफ्रिजरेटर (फ्रिज) में रखने से सूक्ष्मजीवों की गतिविधि धीमी हो जाती है, जिससे भोजन अधिक दिनों तक सुरक्षित रहता है।
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खाद्य परिरक्षण का मूल सिद्धांत सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकना या उन्हें मारना है, जो नमी, तापमान या रासायनिक वातावरण को बदलकर किया जाता है।