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कुछ सामान्य रोग
Chhattisgarh · Class 8 · 🔬 Science · Chapter 16

कुछ सामान्य रोग

संक्रामक रोगअसंक्रामक रोगरोगों के संचरण के तरीकेविभिन्न रोगों के लक्षण और बचावटीकाकरणसिकल सेल रोग

यह अध्याय मनुष्यों में होने वाले विभिन्न सामान्य रोगों, जैसे हैजा, तपेदिक, टाइफाइड, मलेरिया, पेचिश, डायरिया, फाइलेरिया, सर्दी-जुकाम, छोटी माता, पोलियो, रेबीज, एड्स और पीलिया के बारे में जानकारी प्रदान करता है। यह रोगों के फैलने के तरीके, उनके लक्षण, बचाव के उपाय और कुछ आनुवांशिक रोगों जैसे सिकल सेल एनीमिया पर भी प्रकाश डालता है। टीकाकरण के महत्व और विभिन्न टीकों की जानकारी भी दी गई है। यह अध्याय छात्रों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूक करता है।

सामान्य रोग

रोगों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

  • संक्रामक रोग:
  • ये वे रोग हैं जो एक संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकते हैं
  • ये सूक्ष्मजीवों (जैसे जीवाणु, विषाणु, प्रोटोजोआ, कृमि) के कारण होते हैं।
  • उदाहरण: हैजा, टी.बी., सर्दी-जुकाम, मलेरिया, एड्स।
  • असंक्रामक रोग:
  • ये वे रोग हैं जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलते
  • ये अक्सर जीवनशैली, आनुवंशिकी, उम्र या पर्यावरणीय कारकों से संबंधित होते हैं।
  • उदाहरण: पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोग, सिकल सेल रोग (आनुवांशिक)।

रोगोत्पादक सूक्ष्मजीव (पैथोजन): वे सूक्ष्मजीव जो रोग उत्पन्न करते हैं।

कैसे फैलते हैं रोग

संक्रामक रोगों के फैलने में पर्यावरण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीव गंदगी में पनपते हैं और विभिन्न माध्यमों से फैलते हैं।

  • रोग संचरण के मुख्य माध्यम:
  • वायु: खाँसने, छींकने से निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों द्वारा।
  • उदाहरण: सर्दी-जुकाम, टी.बी.
  • जल: दूषित पानी पीने से।
  • उदाहरण: हैजा, टाइफाइड, पीलिया, अतिसार, पेचिश।
  • भोजन: दूषित भोजन खाने से।
  • उदाहरण: हैजा, टाइफाइड, अतिसार, पेचिश।
  • सीधा संपर्क: संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से।
  • उदाहरण: एड्स, छोटी माता।
  • संक्रमित वस्तुएं: रोगी द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तुओं के उपयोग से।
  • उदाहरण: सर्दी-जुकाम, टी.बी.
  • वाहक: कुछ जीव जो रोग के रोगाणुओं को एक व्यक्ति से दूसरे तक ले जाते हैं।
  • मक्खियाँ: हैजा, पोलियो, पेचिश, अतिसार।
  • मच्छर: मलेरिया (मादा एनाफिलीज), फाइलेरिया (क्यूलेक्स मच्छर)।
  • जानवर: रेबीज (कुत्ता, बिल्ली आदि)।
  • बचाव के सामान्य उपाय:
  • स्वच्छता बनाए रखना।
  • साफ पानी पीना और ढका हुआ भोजन खाना।
  • मच्छरों व मक्खियों से बचाव।
  • नियमित रूप से हाथ धोना।
  • टीकाकरण।
  • सामुदायिक स्वच्छता और स्वास्थ्य शिक्षा।

हैजा

हैजा से बचाव के उपाय
हैजा से बचाव के उपाय
  • कारण: विब्रियो कोलेरी (Vibrio cholerae) नामक जीवाणु।
  • फैलाव: दूषित पानी और भोजन के माध्यम से।
  • प्रभावित अंग: पाचन तंत्र (आंतें)।
  • लक्षण:
  • सफेद व पतले दस्त (चावल के पानी जैसे)।
  • पेट में ऐंठन व मरोड़।
  • धँसी हुई आँखें, पिचके गाल, निम्न रक्तचाप।
  • निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन): शरीर में पानी की अत्यधिक कमी, जो जानलेवा हो सकती है।
  • बचाव और उपचार:
  • स्वच्छ पानी का सेवन (उबला या फिल्टर किया हुआ)।
  • हाथों की स्वच्छता (खाना बनाने/खाने से पहले, शौच के बाद)।
  • भोजन की स्वच्छता (ताज़ा, अच्छी तरह पका हुआ, ढका हुआ)।
  • शौचालय का उचित उपयोग और खुले में शौच न करना।
  • रोगी को जीवन रक्षक घोल (O.R.S.) बार-बार देना।
  • हैजे का टीका लगवाना (प्रभाव 6 माह तक)।
  • रोगी के मल व उल्टी का उचित निपटान (गड्ढे में गाड़ना)।
महत्त्वपूर्ण

जीवन रक्षक घोल (O.R.S.) बनाने की विधि: एक लीटर उबले हुए ठंडे पानी में एक चुटकी नमक और एक चाय का चम्मच शक्कर मिलाएं। यदि उपलब्ध हो तो आधा नीबू का रस डालें।

तपेदिक या टी.बी.

टी.बी. के कारण और फैलाव
टी.बी. के कारण और फैलाव
टी.बी. से बचाव और उपचार
टी.बी. से बचाव और उपचार
  • कारण: माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) नामक जीवाणु।
  • फैलाव: हवा के माध्यम से (खाँसने, छींकने से)।
  • प्रभावित अंग: मुख्य रूप से फेफड़े, लेकिन मस्तिष्क, आँख, आँत, हड्डियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
  • लक्षण:
  • 2 सप्ताह या उससे अधिक समय तक लगातार खाँसी (बलगम या खून के साथ)।
  • बुखार (खासकर शाम या रात में)।
  • रात को पसीना आना।
  • भूख न लगना और वजन कम होना
  • थकान और कमजोरी।
  • सीने में दर्द या साँस लेने में तकलीफ।
  • बचाव और उपचार:
  • बच्चों को बी.सी.जी. (BCG) का टीका लगवाना।
  • खाँसते या छींकते समय मुँह और नाक को ढकना।
  • पौष्टिक आहार और नियमित व्यायाम।
  • रोगी को अलग, स्वच्छ कमरे में रखना।
  • रोगी द्वारा उपयोग की गई वस्तुओं का प्रयोग न करना।
  • रोगी के थूक का उचित निपटान।
  • लम्बे समय तक प्रतिजैविक (एंटी-ट्यूबरकुलर ड्रग) का सेवन (डॉक्टर की सलाह पर)।
महत्त्वपूर्ण

24 मार्च को विश्व टी.बी. दिवस मनाया जाता है।

मोतीझिरा या मियादी बुखार टायफाइड

मोतीझिरा के कारण और फैलाव
मोतीझिरा के कारण और फैलाव
  • कारण: सालमोनेला टाइफी (Salmonella Typhi) नामक जीवाणु।
  • फैलाव: दूषित भोजन और पानी के माध्यम से (मक्खियों द्वारा)।
  • प्रभावित अंग: आँत, प्लीहा (spleen) और पित्ताशय (gallbladder)।
  • लक्षण:
  • लगातार तेज बुखार (103-104°F तक), जो पहले सप्ताह में बढ़ता है और बाद में कम होता है।
  • सिरदर्द, कमजोरी, भूख न लगना।
  • उदर के ऊपरी भाग में गुलाबी रंग के चकत्ते
  • कभी-कभी दस्त या कब्ज।
  • गंभीर मामलों में आँत में छेद (परफोरेशन) का खतरा।
  • बचाव और उपचार:
  • रोगी को उचित भोजन, उबला जल और पर्याप्त आराम दें।
  • भोजन को मक्खियों से बचाएं।
  • रोगी के मल का उचित निपटान।
  • रोगी द्वारा प्रयुक्त वस्तुओं को डेटॉल से धोकर धूप में सुखाएं।
  • T.A.B. का टीका लगवाएं (3 वर्ष की सुरक्षा)।
  • प्रतिजैविकों (एंटीबायोटिक्स) का प्रयोग (डॉक्टर की सलाह पर)।

मलेरिया

मलेरिया कैसे फैलता है
मलेरिया कैसे फैलता है
मलेरिया से बचाव के उपाय
मलेरिया से बचाव के उपाय
  • कारण: प्लाज्मोडियम (Plasmodium) नामक प्रोटोजोआ परजीवी।
  • वाहक: मादा एनाफिलीज मच्छर
  • फैलाव: संक्रमित मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से।
  • प्रभावित अंग: लाल रक्त कणिकाएँ (RBCs) और यकृत कोशिकाएँ (Liver cells)।
  • लक्षण:
  • अचानक ठंड व कंपकपी के साथ तेज बुखार आना।
  • सिर व शरीर में दर्द, अकड़न।
  • पसीने के साथ बुखार उतरना।
  • शरीर में रक्त की कमी (एनीमिया)।
  • यकृत व तिल्ली में सूजन या आकार का बढ़ना।
  • मलेरिया ज्वर का आक्रमण प्रतिदिन, तीसरे दिन या दो दिन छोड़कर होता है।
  • बचाव:
  • मच्छरदानी का प्रयोग करें।
  • घर में जालियां लगाएं।
  • बर्तन आदि में पानी जमा न होने दें।
  • नीम की पत्ती का धुआँ करें।
  • संग्रहित जल को ढंक कर रखें।
  • छोटे तालाबों में मछलियां डालें (जो मच्छर के लार्वा खाती हैं)।
  • रुके हुए पानी की सतह पर तेल अथवा इंजन का जला हुआ तेल डालें।
महत्त्वपूर्ण

मलेरिया के उपचार में क्लोरोक्वीन जैसी दवाएं उपयोग की जाती हैं, लेकिन हमेशा डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए।

पेचिश (अमीबियासिस)

पेचिश के कारण और लक्षण
पेचिश के कारण और लक्षण
  • कारण: एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolytica) नामक प्रोटोजोआ परजीवी।
  • फैलाव: दूषित भोजन और जल के माध्यम से (मक्खियों द्वारा)।
  • प्रभावित अंग: बड़ी आंत।
  • लक्षण:
  • पेट में ऐंठन या मरोड़ के साथ बार-बार दस्त
  • मल के साथ रक्त, श्लेष्मा (म्यूकस) या आंव आना।
  • हल्का ज्वर।
  • रोग कभी-कभी वर्षों तक बना रह सकता है, जिससे परजीवी आंत की झिल्ली से हृदय व तिल्ली में पहुँच कर घाव बना सकते हैं।
  • बचाव:
  • स्वच्छता बनाए रखें।
  • साफ पानी और ढका हुआ भोजन खाएं।
  • हाथों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।

अतिसार (डायरिया)

अतिसार के कारण और लक्षण
अतिसार के कारण और लक्षण
अतिसार से बचाव
अतिसार से बचाव
  • कारण: जीवाणु (जैसे एश्चेरियाई कोलाई, साल्मोनेला) और परजीवी (जैसे एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका) के कारण आंतों में संक्रमण।
  • फैलाव: दूषित भोजन और जल के माध्यम से।
  • लक्षण:
  • दिन में 3 या उससे अधिक बार तरल या अर्धतरल मल त्याग
  • पेट में ऐंठन व मरोड़, उल्टी, बुखार, कमजोरी।
  • मुँह सूखना, प्यास लगना, चिड़चिड़ापन।
  • वजन में अचानक कमी, मंद नाड़ी, लंबी व तेज साँसें।
  • धँसी आँखें, सिकुड़ी नाक, जीभ व गाल का भीतरी भाग सूख जाना।
  • निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन): शरीर का जल अत्यधिक मात्रा में निकलने से मृत्यु भी हो सकती है।
  • बचाव:
  • हमेशा साफ और सुरक्षित पानी पिएँ (उबला हुआ)।
  • भोजन को ढककर रखें और अच्छी तरह पकाकर खाएं।
  • खाना खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोएं।
  • खुले में शौच न करें और अपने आस-पास सफाई रखें।
  • रोगी को ओ.आर.एस. (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन) का घोल दें।

हाथी पांव (फाइलेरिया या फाइलेरियासिस )

हाथी पांव: एक अजीबोगरीब बदलाव
हाथी पांव: एक अजीबोगरीब बदलाव
फाइलेरिया का संक्रमण और विकास
फाइलेरिया का संक्रमण और विकास
  • कारण: वाउचेरिया बैंक्राप्टाई (Wuchereria bancrofti) नामक कृमि (परजीवी)।
  • वाहक: क्यूलेक्स मच्छर
  • फैलाव: संक्रमित क्यूलेक्स मच्छर के काटने से।
  • प्रभावित अंग: लिम्फ वाहिनियाँ और ग्रंथियाँ।
  • लक्षण:
  • शरीर का कोई अंग (विशेषकर पैर) असामान्य रूप से मोटा और सूजा हुआ दिखाई देना।
  • बुखार और खुजली।
  • यकृत, प्लीहा, अंडकोष (स्क्रोटम) आदि में सूजन।
  • लिम्फ वाहिनियों में अवरोध के कारण लिम्फ द्रव का प्रवाह रुक जाना।
  • बचाव:
  • मच्छरों के प्रजनन को रोकना (पानी जमा न होने दें)।
  • मच्छरदानी का उपयोग करें।
  • मच्छर भगाने वाली क्रीम या स्प्रे का इस्तेमाल करें।
  • सरकार द्वारा चलाए जा रहे सामूहिक दवा सेवन (MDA) कार्यक्रमों में भाग लें।
  • डी.ई.सी. (डाइ इथाइल कार्बामाजीन) की खुराक लें (गर्भवती महिलाओं, 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और बीमार व्यक्तियों को छोड़कर)।

सर्दी-जुकाम और फ्लू: कारण, लक्षण और बचाव

सर्दी-जुकाम: एक सामान्य अनुभव
सर्दी-जुकाम: एक सामान्य अनुभव
सर्दी-जुकाम और फ्लू में अंतर
सर्दी-जुकाम और फ्लू में अंतर
  • सर्दी-जुकाम:
  • कारण: राइनोवायरस (Rhinovirus) जैसे विषाणु।
  • फैलाव: हवा के माध्यम से (खाँसने, छींकने से) और संक्रमित वस्तुओं के उपयोग से।
  • प्रभावित अंग: श्वासनली की ऊपरी श्लेष्मा झिल्ली (नाक और गला)।
  • लक्षण: बार-बार छींक आना, नाक बहना, नाक लाल होना, सूजन व जलन, नाक बंद होना, गले में खराश, हल्का बुखार, सिरदर्द।
  • फ्लू (इन्फ्लूएंजा):
  • कारण: इन्फ्लूएंजा विषाणु।
  • लक्षण: सर्दी-जुकाम से अधिक गंभीर, जैसे तेज बुखार, शरीर में दर्द, थकान, सिरदर्द, खांसी।
  • बचाव:
  • स्वच्छता का ध्यान रखें (नियमित रूप से हाथ धोना)।
  • संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाए रखें।
  • खाँसते या छींकते समय मुँह और नाक को रुमाल या कोहनी से ढकें।
  • रोगी द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तुओं का उपयोग न करें।
  • पौष्टिक आहार और पर्याप्त आराम।

छोटी माता (चिकन पॉक्स): कारण, लक्षण और बचाव

छोटी माता क्या है?
छोटी माता क्या है?
छोटी माता के कारण और लक्षण
छोटी माता के कारण और लक्षण
  • कारण: वेरिसला जोस्टर (Varicella Zoster) नामक विषाणु।
  • फैलाव: हवा के माध्यम से, संक्रमित व्यक्ति के खाँसने या छींकने से निकलने वाली बूंदों से, या सीधे संपर्क से।
  • प्रभावित अंग: त्वचा।
  • लक्षण:
  • शरीर पर लाल, खुजली वाले दाने जो बाद में पानी भरे फफोलों में बदल जाते हैं।
  • हल्का या तेज बुखार।
  • थकान, कमजोरी, भूख न लगना, सिरदर्द।
  • दाने पहले गले पर निकलते हैं, फिर चेहरे और पैरों पर फैलते हैं।
  • बचाव:
  • टीकाकरण (छोटी माता का टीका)।
  • व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखें।
  • संक्रमित व्यक्ति से सीधे संपर्क से बचें।
  • संक्रमित वस्तुओं का उपयोग न करें।
  • पौष्टिक आहार से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं।

पोलियो (पोलिमिलाइटिस): कारण, लक्षण और बचाव

पोलियो: एक गंभीर चुनौती
पोलियो: एक गंभीर चुनौती
पोलियो वायरस और उसका प्रभाव
पोलियो वायरस और उसका प्रभाव
  • कारण: पोलियो वायरस (Polio Virus) नामक अति सूक्ष्म विषाणु।
  • फैलाव: दूषित भोजन या पानी के माध्यम से (मल-मौखिक मार्ग), मक्खियों द्वारा।
  • प्रभावित अंग: केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी), विशेषकर पैरों की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली तंत्रिकाएँ।
  • लक्षण:
  • जुकाम के साथ बुखार, उल्टी।
  • गर्दन अकड़ना।
  • मांसपेशियों में सिकुड़न और दर्द।
  • पैरों की मांसपेशियां कमजोर होना और लकवाग्रस्त या अपंग होना
  • बचाव:
  • टीकाकरण (ओरल पोलियो वैक्सीन - O.P.V.): बच्चों को जन्म के तुरंत बाद से 5 वर्ष की आयु तक नियमित रूप से पोलियो ड्रॉप्स पिलाना।
  • स्वच्छता बनाए रखना।
  • रोगी के मल-मूत्र का सही ढंग से निपटान।
  • 'पल्स पोलियो अभियान' में सक्रिय भागीदारी।
महत्त्वपूर्ण

पोलियो एक लाइलाज बीमारी है, लेकिन यह पूरी तरह से रोके जाने योग्य है।

रेबीज (हाइड्रोफोबिया): कारण, लक्षण और बचाव

रेबीज का कारण और फैलाव
रेबीज का कारण और फैलाव
रेबीज के लक्षण
रेबीज के लक्षण
  • कारण: रेबीज वायरस।
  • फैलाव: संक्रमित पशुओं (कुत्ता, बिल्ली, गिलहरी, चमगादड़, लोमड़ी आदि) के काटने से उनकी लार के माध्यम से।
  • प्रभावित अंग: केंद्रीय तंत्रिका तंत्र।
  • लक्षण:
  • जल से अत्यधिक भय (हाइड्रोफोबिया)
  • तेज बुखार, सिरदर्द, बेचैनी।
  • अत्यधिक उत्तेजना, मांसपेशियों में ऐंठन, लकवा।
  • निगलने में कठिनाई, लार टपकना।
  • व्यवहार में बदलाव, भ्रम।
  • बचाव:
  • पालतू जानवरों को नियमित रूप से रेबीज का टीका लगवाएं।
  • आवारा जानवरों से दूर रहें।
  • यदि किसी जानवर ने काट लिया है, तो तुरंत घाव को साबुन और पानी से धोएं और डॉक्टर से संपर्क करें।
  • डॉक्टर की सलाह पर एंटी-रेबीज वैक्सीन और इम्यूनोग्लोबुलिन का कोर्स पूरा करें।
महत्त्वपूर्ण

रेबीज के उपचार की विधि की खोज लुईस पाश्चर ने की थी।

एड्स (AIDS): कारण, लक्षण और बचाव

एड्स क्या है?
एड्स क्या है?
एच.आई.वी. कैसे फैलता है?
एच.आई.वी. कैसे फैलता है?
  • पूरा नाम: एक्वायर्ड इम्यूनो डिफिशियन्सी सिन्ड्रोम (Acquired Immunodeficiency Syndrome)।
  • कारण: एच.आई.वी. (ह्यूमन इम्यूनो डिफिशियन्सी वायरस)।
  • प्रभावित अंग: शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को नष्ट करता है, विशेषकर श्वेत रक्त कणिकाओं (WBCs) को।
  • फैलाव:
  • असुरक्षित यौन संबंध
  • संक्रमित रक्त या रक्त उत्पादों के संपर्क में आने से (जैसे संक्रमित सुई का उपयोग)।
  • संक्रमित माँ से उसके बच्चे में (गर्भावस्था, प्रसव या स्तनपान के दौरान)।
  • यह सामान्य संपर्क से नहीं फैलता (जैसे गले मिलना, हाथ मिलाना, एक ही शौचालय का उपयोग करना)।
  • लक्षण: (एच.आई.वी. संक्रमण के तुरंत बाद लक्षण नहीं दिखते, 3-15 वर्षों के अंतराल में दिख सकते हैं)
  • शरीर का वजन तेजी से घटना।
  • लगातार बुखार और रात में पसीना आना।
  • लगातार पतले दस्त।
  • बहुत अधिक थकावट।
  • लसिका ग्रंथि में सूजन, जोड़ों में दर्द।
  • मुँह में सफेद छाले, त्वचा में दाने और खुजली।
  • बार-बार संक्रमण (जैसे निमोनिया, टी.बी.)।
  • बचाव:
  • सुरक्षित यौन संबंध बनाएं।
  • नशीले इंजेक्शन का उपयोग न करें और सुई साझा न करें।
  • रक्त चढ़ाने से पहले रक्त की जाँच करवाएं।
  • गर्भवती एच.आई.वी. संक्रमित महिलाएँ डॉक्टर की सलाह पर उपचार लें।
  • जागरूकता और सही जानकारी ही बचाव का उपाय है।
  • संक्रमित व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति और समर्थन रखें।
महत्त्वपूर्ण

1 दिसंबर को प्रतिवर्ष विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है।

पीलिया (वायरल हेपेटाइटिस ई): कारण, लक्षण और बचाव

पीलिया: एक सामान्य परिचय
पीलिया: एक सामान्य परिचय
पीलिया के कारण और लक्षण
पीलिया के कारण और लक्षण
  • कारण: वायरल हेपेटाइटिस ई वायरस।
  • फैलाव: प्रदूषित जल और भोजन के सेवन से।
  • प्रभावित अंग: यकृत (लीवर)।
  • लक्षण:
  • त्वचा, आँखें और नाखूनों का पीला पड़ना (बिलीरुबिन के बढ़ने से)।
  • गहरे रंग का मूत्र, हल्के रंग का मल।
  • थकान, भूख न लगना, मतली, उल्टी।
  • सिरदर्द, कमजोरी।
  • पेट में दाहिनी तरफ ऊपर की ओर दर्द।
  • गर्भवती महिलाओं के लिए अधिक गंभीर।
  • बचाव:
  • पीने के पानी को उबालकर या क्लोरीन की गोली डालकर उपयोग करें।
  • शौच के पश्चात् एवं भोजन के पहले हाथ साबुन से धोएं।
  • खुले में शौच न करें।
  • खुले में रखी, बासी व सड़ी-गली खाद्य सामग्री का सेवन न करें।
  • लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।

सिकल सेल रोग: कारण, लक्षण और बचाव

सिकल सेल रोग क्या है?
सिकल सेल रोग क्या है?
सामान्य लाल रक्त कोशिका और हंसियाकार लाल रक्त कोशिका में अंतर
सामान्य लाल रक्त कोशिका और हंसियाकार लाल रक्त कोशिका में अंतर
  • कारण: यह एक आनुवांशिक बीमारी है, जो लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) के आकार में जन्मजात परिवर्तन के कारण होती है।
  • प्रभाव: सामान्य गोलाकार और लचीली लाल रक्त कणिकाएँ हंसिए (sickle) के आकार की हो जाती हैं।
  • ये ऑक्सीजन का परिवहन ठीक से नहीं कर पातीं।
  • छोटी रक्त वाहिनियों में गुच्छा बनाकर फंस जाती हैं, जिससे अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और दर्द होता है।
  • लक्षण:
  • एनीमिया (खून की कमी) के कारण शरीर का रंग पीला या सफेद दिखना।
  • जल्दी थकना, सांस फूलना, चिड़चिड़ापन, खान-पान में अरुचि।
  • हाथ-पैर की उंगलियों और जोड़ों में सूजन व दर्द।
  • बार-बार बुखार और सर्दी होना।
  • तिल्ली (प्लीहा) का आकार बड़ा हो जाना।
  • बच्चों के विकास में रुकावट।
  • सिकल सेल के प्रकार:
  • सिकल सेल वाहक: सामान्यतः स्वस्थ रहते हैं, कोई लक्षण नहीं होते, लेकिन रोग के जीन के धारक होते हैं।
  • सिकल सेल पीड़ित रोगी: रोग के लक्षण स्पष्ट होते हैं।
  • बचाव और प्रबंधन:
  • खूब पानी पीना चाहिए।
  • संतुलित आहार लेना चाहिए।
  • हर माह रक्त की जाँच करानी चाहिए।
  • चिकित्सक की सलाह से दवा लेनी चाहिए।
  • विवाह पूर्व लड़के-लड़कियों की रक्त जाँच (सिकल सेल स्टेटस) अवश्य करानी चाहिए, खासकर यदि दोनों वाहक हों तो पीड़ित संतान होने की संभावना बढ़ जाती है।
महत्त्वपूर्ण

यह बीमारी उन क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है जहाँ मलेरिया अधिक होता है। माना जाता है कि हंसियाकार लाल रक्त कणिकाएँ मलेरिया परजीवी से कुछ हद तक बचाव प्रदान करती हैं।

टीकाकरण और शिशु टीकाकरण तालिका

टीकाकरण क्या है?
टीकाकरण क्या है?
शिशुओं के लिए टीकाकरण तालिका
शिशुओं के लिए टीकाकरण तालिका
  • टीकाकरण क्या है?
  • यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें किसी जीव के शरीर में किसी विशेष रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) विकसित की जाती है।
  • इसमें रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों के निष्क्रिय या कमजोर रूपों को शरीर में प्रवेश कराया जाता है।
  • शरीर इन रोगाणुओं को पहचानना सीख जाता है और उनसे लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ बनाता है।
  • भविष्य में वास्तविक रोगाणु के हमले पर शरीर पहले से तैयार होता है और बीमारी से लड़कर उसे रोक देता है।
  • टीकाकरण का महत्व:
  • व्यक्तिगत स्वास्थ्य की रक्षा।
  • हर्ड इम्युनिटी (सामुदायिक प्रतिरक्षा) विकसित करना, जिससे रोग फैलने की संभावना कम हो जाती है।
  • चेचक जैसी कई बीमारियों को खत्म करने में मदद की है।
  • पोलियो जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका।
  • बच्चों को स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्रदान करता है।
  • शिशुओं के लिए टीकाकरण तालिका (उदाहरण):

| समय निर्धारण | टीकाकरण | जिन बीमारियों के लिए टीका दिया जाता है | |--------------------|-------------------|---------------------------------------| | जन्म से 12 महीनों तक | बी.सी.जी. | क्षयरोग | | 12 महीना | डी.पी.टी. - 1 | काली खांसी, डिफ्थीरिया, टैटनस | | | ओ.पी.वी. - 1 | पोलियो | | 9-12 महीने | खसरा | खसरा | | 16-24 महीने | डी.पी.टी. बूस्टर | काली खांसी, डिफ्थीरिया, टैटनस | | 5-6 वर्ष | डी.टी. | काली खांसी, टैटनस | | 10-16 वर्ष | टी.टी. | टैटनस |

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