गणित का इतिहास
यह अध्याय गणित के उद्भव और विकास की पड़ताल करता है, जिसमें सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर आधुनिक काल तक के महत्वपूर्ण मील के पत्थर शामिल हैं। यह विशेष रूप से भारतीय गणित के योगदान पर प्रकाश डालता है, जैसे शून्य का आविष्कार, अंक प्रणाली का विकास, बीजगणित, रेखागणित, पाई का मान, और त्रिकोणमिति। छात्र वैदिक गणित की सरल गणना विधियों जैसे बीजांक, ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्, एकन्यूनेन पूर्वेण, एकाधिकेन पूर्वेण और निखिलम् विधियों का भी अध्ययन करेंगे, साथ ही वर्ग और वर्गमूल ज्ञात करने के तरीके भी सीखेंगे। यह अध्याय छात्रों को गणित के समृद्ध इतिहास और उसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों से परिचित कराता है।
गणित का आरंभ और प्राचीन सभ्यताएँ
गणित का आरंभ मानव सभ्यता के साथ ही हुआ, हालाँकि इसका ठीक-ठीक समय बता पाना कठिन है।
- प्राचीनतम साक्ष्य:
- दक्षिण अफ्रीका: गुफाओं में 'ओकरे' चट्टानों पर खुरच कर बनाए गए ज्यामितीय पैटर्न।
- कांगो (इशांगो अस्थि): अभाज्य संख्याओं की श्रृंखला का सबसे पुराना ज्ञात प्रदर्शन, लगभग 20,000 वर्ष पुराना।
- प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ और उनका योगदान:
- इजिप्ट (लगभग 5000 ई.पू.): ज्यामितिक स्थानिक आकृतियों (Spatial design) का प्रदर्शन।
- सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता (3000-2600 ई.पू.):
- समान वजन और मापन की प्रणाली।
- उन्नत ईंट तकनीक में अनुपात का प्रयोग।
- समकोण पर बनाई गई गलियाँ, घनाभ, शंकु, बेलन, वृत्त, त्रिभुज जैसे ज्यामितीय आकारों का मिलना।
- यह उस समय के लोगों के विकसित गणितीय ज्ञान का संकेत देता है।
- चीनी गणित (शांग राजवंश, 1600 - 1046 ई.पू.): कछुए के कवच पर खरोंच कर बनाए गए अंक।
- सुमेरियन सभ्यता (मेसोपोटामिया, 2500-3000 ई.पू.): मापन विज्ञान की जटिल प्रणाली का विकास, लिखित गणित का प्रमाण।
- अन्य: इजिप्ट, ग्रीक, बेबीलोन और अरब के लोगों ने भी गणित में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- गणित का महत्व:
- गणित, विज्ञान एवं तकनीकी का मेरुदण्ड है।
- वेदांग ज्योतिष: ऋषि लगध के अनुसार, "यथा शिखा मयूराणाम् नागानाम् मणयो यथा। तद्वद् वेदांगशास्त्राणाम् गणितम् मूर्धनिस्थितम्।।" (जैसे मोर के सिर पर शिखा और सर्प के फन पर मणि सुशोभित है, वैसे ही सभी वेदांग शास्त्रों के शीर्ष पर गणित सुशोभित है।)
- भारत में गणित का योगदान प्राचीन काल से ही अत्यंत विशिष्ट और विश्वप्रसिद्ध रहा है।
गणित का विकास मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ हुआ है। प्राचीन सभ्यताओं ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार गणितीय अवधारणाओं को विकसित किया।
गणित में भारत का विशिष्ट योगदान
भारत ने गणित की विभिन्न शाखाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
1. अंक गणित
- आधार: अंक प्रणाली, जिसमें शून्य का महत्वपूर्ण स्थान है।
- शून्य का आविष्कार:
- संकल्पना: वेदों में निहित है ("ऊँ खं ब्रह्म" - यजुर्वेद)। 'खं' शब्द का तात्पर्य आकाश और शून्य दोनों से है।
- भास्कराचार्य (लीलावती): शून्य परिकर्माष्टक में 'ख' का प्रयोग किया।
- शून्य में किसी संख्या को जोड़ने पर योगफल वही संख्या होती है।
- शून्य के वर्गादि शून्य ही होते हैं।
- किसी राशि को शून्य से भाग देने पर वह 'खहर' (जिसका हर ख हो) कहलाती है।
- शून्य से किसी राशि को गुणा करने पर गुणनफल शून्य होता है।
- श्रेय: महान संस्कृत व्याकरणाचार्य पाणिनी (500 ई.पू.) तथा पिंगल (200 ई.पू.) को दिया जाता है। वैदिक ऋषि गृत्समद का भी उल्लेख मिलता है।
- चिह्न का साक्ष्य: सर्वप्रथम बक्शाली पांडुलिपि (300-400 ई.) में पाया गया।
- प्रोफेसर जी. बी. हालस्टेड के अनुसार, "बुद्धि और शक्ति के विकास के लिए गणित की कोई भी संकल्पना शून्य से महत्वपूर्ण सिद्ध नहीं हुई है।"
- अंक पद्धति (हिन्दू-अरेबिक प्रणाली):
- प्रसार: लगभग 770 ई. में उज्जैन के हिन्दू विद्वान कंक ने बगदाद के खलीफा अलमन्सूर के दरबार में हिन्दू अंकन पद्धति अरब पहुँचाई।
- अरबों ने इसे 'हिन्दू अंक' (अल-अरकान अल-हिन्दू) या 'हिन्दसा' कहा। यूरोपवासियों ने इसे अरबों से प्राप्त किया, इसलिए 'अरबी अंक' कहा।
- विशेषता: प्रत्येक अंक का एक निरपेक्ष मान और एक स्थानीय मान होता है। यह एक वैज्ञानिक अंक पद्धति है।
- दशमलव पद्धति: आधार दस होने के कारण इसे दाशमिक या दशमलव प्रणाली कहते हैं।
- पीयरे लाप्लास: "भारत ने ही हमें प्रत्येक संख्या को दस अंकों द्वारा व्यक्त करने (जिसमें प्रत्येक अंक का एक निरपेक्ष और एक स्थानीय मान है) की अत्यंत उत्तम प्रणाली दी है।"
- भारतीय अंकों का इतिहास एवं बड़ी संख्याएँ:
- खरोश्थी प्रणाली: चौथी शताब्दी ई.पू.
- ब्राह्मी प्रणाली: तीसरी शताब्दी ई.पू.
- ग्वालियर प्रणाली: 9वीं शताब्दी
- देवनागरी प्रणाली: 11वीं शताब्दी
- आधुनिक प्रणाली: वर्तमान में प्रयुक्त।
- बड़ी संख्याएँ: यजुर्वेद संहिता, रामायण आदि में 1 से लेकर $10^{53}$ तक की संख्याओं को अलग-अलग नाम दिए गए हैं (जैसे नियुतम $10^{11}$, उत्संग $10^{21}$, हेतुहीलम $10^{31}$, नित्रवाद्यम् $10^{41}$, तल्लक्षणा $10^{53}$)।
- कूटांक:
- किसी संख्या को अक्षर के रूप में व्यक्त करना।
- प्राचीन गणितज्ञों ने ज्योतिषादि ग्रंथों में इसका प्रयोग किया।
- प्रणालियाँ: वर्णांक प्रणाली, शब्दांक प्रणाली, व्यंजनांक प्रणाली।
2. बीजगणित
- परिभाषा: गणित की वह शाखा जिसमें अव्यक्त (अज्ञात) राशियों का अध्ययन किया जाता है। इसे 'बीज राशि' भी कहते हैं, इसलिए 'बीजगणित' नाम पड़ा।
- आरंभ: शुल्वसूत्रों के काल से ही, यज्ञवेदियों के निर्माण में रेखीय और अपरिमित समीकरणों के समाधान की आवश्यकता से।
- प्रमुख योगदानकर्ता:
- आर्यभट: अंकगणित के साथ-साथ बीजगणित में भी योगदान।
- ब्रह्मगुप्त: इनके काल से बीजगणित एक अलग शाखा के रूप में विकसित हुआ। इसे 'कुट्टक गणित' तथा 'अव्यक्त गणित' भी कहा जाता था।
- पृथूदक स्वामी (860 ई.): इसका नाम 'बीजगणित' रखा।
3. रेखागणित (ज्यामिति)
- नींव: वैदिक काल में 'कल्प' नामक वेदांग में शुल्व सूत्रों के रूप में।
- शुल्व सूत्र:
- 'शुल्व' का अर्थ वेदी के मापन में प्रयुक्त रस्सी। 'सूत्र' का अर्थ जानकारी को संक्षिप्ततम रूप में प्रस्तुत करना।
- रचयिता: बौधायन, आपस्तंभ, कात्यायन, मानव, मैत्रायण आदि।
- वर्णन: विभिन्न ज्यामितीय आकारों की वेदियों (गरुण वेदी, कूर्म वेदी) के निर्माण का वर्णन।
- उदाहरण: त्रिभुजों, वर्गों, आयतों तथा अन्य जटिल ज्यामितीय आकारों की रचना; ऐसे आकारों की रचना जिनका क्षेत्रफल दिए गए आकारों के क्षेत्रफल के जोड़ या अंतर के बराबर हो।
- बौधायन प्रमेय:
- "दीर्घ चतुरस्त्रस्य अक्षण्या रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यक् मानी च। यत पृथग्भूते कुरूतः तत् उभयं करोति।" (बौधायन शुल्व सूत्र 48(1))
- आशय: एक आयत के विकर्ण पर बने वर्ग का क्षेत्रफल आयत की दोनों भुजाओं पर बने वर्गों के क्षेत्रफलों के योग के बराबर होता है।
- यह प्रमेय पाइथागोरस प्रमेय के नाम से जाना जाता है, किंतु डॉ. ब्रजमोहन की पुस्तक 'गणित का इतिहास' के अनुसार, यह बौधायन को पाइथागोरस से सैकड़ों वर्ष पूर्व ज्ञात था। अतः इसे 'बौधायन प्रमेय' या 'शुल्व प्रमेय' भी कहते हैं।
- प्रमुख योगदानकर्ता: आर्यभट (476-550 ई.), ब्रह्मगुप्त (600 ई.), भास्कर प्रथम (629 ई.), महावीर (850 ई.)।
4. पाई (π) का भारतीय इतिहास
- आर्यभट (476-550 ई.):
- पहले गणितज्ञ जिन्होंने $\pi$ का लगभग परिमित मान निकाला।
- "चतुरधिकम् शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्त्राणाम्। अयुतद्वय विष्कम्भस्य आसन्नो वृत्त परिपाहः।।"
- अर्थ: 20,000 व्यास के वृत्त की परिधि 62832 होगी।
- $\pi = \frac{62832}{20000} = 3.1416$ (जो दशमलव के 4 स्थानों तक आज भी सही है)।
- भास्कराचार्य (1114-1193 ई.):
- अपने ग्रंथ 'लीलावती' में $\pi$ का मान दिया।
- "व्यासे भनन्दाग्नि हते विभक्ते खबाण सूर्यैः परिधिः स सूक्ष्मः। द्वाविंशतिघ्ने विहृतेऽथशैलैः स्थूलोऽथवास्याद् व्यवहार् योग्यः।।"
- अर्थ: व्यास को 3927 से गुणा कर 1250 से भाग देने पर सूक्ष्म परिधि प्राप्त होती है। अथवा व्यास को 22 से गुणा कर 7 से भाग देने पर व्यवहार के योग्य परिधि का स्थूल मान प्राप्त होता है।
- स्वामी भारती कृष्णतीर्थ (1884-1960):
- $\pi/10$ का मान सुविदित अनुष्टुप छंद में तथा वर्णमाला की कूट भाषा में दिया।
- $\pi/10 = 0.31415926535897932384626433832792$ (दशमलव के बत्तीस स्थानों तक)।
- इन्होंने 'वैदिक गणित' नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें 16 सूत्र और 13 उपसूत्र हैं।
- श्रीनिवास रामानुजन (1887-1920 ई.):
- 'प्रतिरूपक समीकरण और $\pi$ के सन्निकट मान' पर शोध निबंध।
- $\pi$ के सन्निकट मान के लिए कई सूत्रों की खोज की।
5. त्रिकोणमिति
- परिभाषा: गणित की वह शाखा जिसमें त्रिभुज की भुजाओं और कोणों के संबंध का अध्ययन किया जाता है।
- उपयोग: भारतीय ज्योतिषशास्त्र एवं खगोल शास्त्र में ग्रहों के स्थान की गणना में।
- प्रमुख योगदानकर्ता: आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त।
- ग्रंथ: "सूर्य सिद्धान्त" (400 ई.), वराहमिहिर के पंच सिद्धांत, ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुट सिद्धांत (630 ई.)।
- ज्या (Sine) का विकास:
- सबसे पहले ज्या का प्रयोग आर्यभट ने (लगभग 510 ई.) किया था।
- आर्यभट ने ज्या और उत्क्रम ज्या (उज्ज्या) की सारणियाँ भी दीं।
- भारत से 'ज्या' शब्द अरब गया, जहाँ 'जीबा' के रूप में प्रचलित हुआ, फिर 'जैब' बना। अरबी में 'जैब' का अर्थ 'वक्ष' है।
- 1150 ई. में अरबी पुस्तकों के लैटिन अनुवाद में 'जैब' के स्थान पर 'साइनस' (Sinus) का प्रयोग किया गया, जिसका लैटिन में एक अर्थ 'वक्ष' भी है।
- ब्रह्मगुप्त ने 'ज्या' के अर्थ में 'क्रमज्या' का प्रयोग किया।
- भारतीय ज्या और कोटिज्या ही यूरोपीय भाषाओं में 'साइन' (sine) और 'को-साइन' (co-sine) बन गए।
- अनुप्रयोग: ज्योतिष, खगोलशास्त्र, अभियांत्रिकी, नौ-परिवहन (Navigation), ऊँचाई, दूरी आदि के अध्ययन में।
शून्य, दशमलव प्रणाली और स्थानीय मान पद्धति भारतीय गणित की विश्व को सबसे बड़ी देन है।
पाइथागोरस प्रमेय से सैकड़ों वर्ष पूर्व बौधायन ने इसी प्रमेय को 'बौधायन प्रमेय' या 'शुल्व प्रमेय' के रूप में प्रस्तुत किया था।
वैदिक गणित का परिचय
स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ (1884-1960 ई.) ने 'वैदिक गणित' नामक ग्रंथ की रचना की।
- ग्रंथ की विशेषताएँ:
- 16 सूत्र और 13 उपसूत्र।
- गुणधर्मों और प्रयोगों का विस्तृत विवरण।
- चालीस अध्याय।
- गणना की सरल और तीव्र विधियाँ प्रस्तुत की गई हैं।
बीजांक
- परिभाषा: किसी संख्या के अंकों का जोड़ एक अंक प्राप्त होने तक करते हैं, यही अंक उसका बीजांक कहलाता है।
- उदाहरण:
- 10 का बीजांक: $1+0 = 1$
- 11 का बीजांक: $1+1 = 2$
- 321 का बीजांक: $3+2+1 = 6$
- 78 का बीजांक: $7+8 = 15 \rightarrow 1+5 = 6$
- बीजांक ज्ञात करने की विधियाँ:
- सभी अंकों का योग: संख्या के सभी अंकों का योग करें, यदि दो अंकों की संख्या मिले तो पुनः जोड़ें जब तक एक अंक न मिल जाए।
- उदाहरण: 8756904 का बीजांक: $8+7+5+6+9+0+4 = 39 \rightarrow 3+9 = 12 \rightarrow 1+2 = 3$
- क्रमशः योग: अंकों को क्रमशः जोड़ते जाएँ, जैसे ही योगफल दो अंकों की संख्या प्राप्त हो, तुरंत जोड़कर एक अंक प्राप्त कर लें।
- उदाहरण: 8756904 का बीजांक:
$8+7 \rightarrow 15 \rightarrow 6+5 \rightarrow 11 \rightarrow 2+6 \rightarrow 8+9 \rightarrow 17 \rightarrow 8+0 \rightarrow 8+4 \rightarrow 12 \rightarrow 3$
- शून्य और नौ को छोड़कर: शून्य, नौ तथा जिन दो अंकों को जोड़ने पर नौ आता है, उन्हें छोड़कर शेष अंकों के योगफल से बीजांक ज्ञात करें।
- उदाहरण: 8756904 में 0, 9 तथा $4+5=9$ छोड़ने पर बचे अंक 8, 7, 6।
$8+7+6 = 21 \rightarrow 2+1 = 3$
- बीजांक ज्ञात करने में ध्यान देने योग्य बातें:
- जैसे ही योग दो अंक की संख्या प्राप्त हो, वहां तुरंत जोड़कर एक अंक प्राप्त कर लेना चाहिए।
- शून्य और नौ जोड़ने या छोड़ने से बीजांक में कोई अंतर नहीं आता।
- किसी संख्या का बीजांक उस संख्या में 9 से भाग देने पर बचने वाले शेषफल के बराबर होता है।
- यदि किसी संख्या का बीजांक 9 है, तो वह संख्या 9 से पूरी-पूरी विभाजित होगी। ऐसी स्थिति में उसका बीजांक शून्य न होकर 9 ही होगा।
- 3 की विभाज्यता की जाँच बीजांक से भी की जा सकती है: जिस संख्या का बीजांक 3, 6 या 9 हो, वह संख्या 3 से पूरी-पूरी विभाजित होगी।
- बीजांक से उत्तर की जाँच की जा सकती है, अतः इसका पर्याप्त अभ्यास करना चाहिए।
बीजांक से उत्तर की जाँच
- जोड़ की जाँच: संख्याओं के बीजांकों के योगफल का बीजांक = उत्तर का बीजांक होने पर उत्तर सही होगा।
- उदाहरण: $3469 + 2220 + 1239 = 6928$
- $3469 \rightarrow 3+4+6+9 = 22 \rightarrow 4$
- $2220 \rightarrow 2+2+2+0 = 6$
- $1239 \rightarrow 1+2+3+9 = 15 \rightarrow 6$
- संख्याओं के बीजांकों का योग: $4+6+6 = 16 \rightarrow 7$
- उत्तर $6928 \rightarrow 6+9+2+8 = 25 \rightarrow 7$
- दोनों बीजांक 7 हैं, अतः उत्तर सही है।
- घटाने की जाँच: (घटने वाली संख्या का बीजांक + उत्तर का बीजांक) का बीजांक = ऊपर की संख्या का बीजांक।
- उदाहरण: $7816 - 3054 = 4762$
- $7816 \rightarrow 7+8+1+6 = 22 \rightarrow 4$
- $3054 \rightarrow 3+0+5+4 = 12 \rightarrow 3$
- $4762 \rightarrow 4+7+6+2 = 19 \rightarrow 1$
- (घटने वाली संख्या का बीजांक + उत्तर का बीजांक) = $3+1 = 4$
- ऊपर की संख्या का बीजांक 4 है।
- दोनों बीजांक 4 हैं, अतः उत्तर सही है।
- गुणा की जाँच: (प्रथम संख्या का बीजांक $\times$ द्वितीय संख्या का बीजांक) का बीजांक = उत्तर का बीजांक।
- उदाहरण: $456 \times 814 = 371184$
- $456 \rightarrow 4+5+6 = 15 \rightarrow 6$
- $814 \rightarrow 8+1+4 = 13 \rightarrow 4$
- (प्रथम संख्या का बीजांक $\times$ द्वितीय संख्या का बीजांक) = $6 \times 4 = 24 \rightarrow 6$
- उत्तर $371184 \rightarrow 3+7+1+1+8+4 = 24 \rightarrow 6$
- दोनों बीजांक 6 हैं, अतः उत्तर सही है।
- भाग की जाँच: भाज्य का बीजांक = (भागफल का बीजांक $\times$ भाजक का बीजांक) का बीजांक + शेषफल का बीजांक।
- उदाहरण: $7481 \div 31 = 241$ (शेष 10)
- भाज्य $7481 \rightarrow 7+4+8+1 = 20 \rightarrow 2$
- भाजक $31 \rightarrow 3+1 = 4$
- भागफल $241 \rightarrow 2+4+1 = 7$
- शेषफल $10 \rightarrow 1+0 = 1$
- (भागफल का बीजांक $\times$ भाजक का बीजांक) का बीजांक = $(7 \times 4) = 28 \rightarrow 1$
- (भागफल का बीजांक $\times$ भाजक का बीजांक) का बीजांक + शेषफल का बीजांक = $1+1 = 2$
- भाज्य का बीजांक 2 है।
- दोनों बीजांक 2 हैं, अतः उत्तर सही है।
बीजांक विधि से गणनाओं की शुद्धता की जाँच करना समय बचाने और आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायक होता है। इसका अभ्यास अवश्य करें।
ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम् विधि से गुणा
यह वैदिक गणित का एक महत्वपूर्ण सूत्र है जिसका अर्थ है ऊर्ध्व (खड़ा) और तिर्यक (तिरछा)। यह विधि किसी भी संख्या के गुणा के लिए उपयोगी है, चाहे वे कितने भी अंकों की हों।
1. दो अंकों की संख्याओं का गुणा
- सूत्र: ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्
- उदाहरण: $41 \times 38$
- इकाई का गुणा (ऊर्ध्व): $1 \times 8 = 8$ (इकाई स्थान पर लिखें)
- तिर्यक गुणा और योग: $(4 \times 8) + (1 \times 3) = 32 + 3 = 35$ (5 को दहाई स्थान पर लिखें, 3 हासिल)
- दहाई का गुणा (ऊर्ध्व): $4 \times 3 = 12$ (हासिल 3 जोड़ें: $12+3 = 15$) (15 को बाईं ओर लिखें)
- उत्तर: 1558
2. तीन अंकों की संख्याओं का गुणा
- सूत्र: ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम्
- उदाहरण: $231 \times 425$
- इकाई का गुणा (ऊर्ध्व): $1 \times 5 = 5$ (इकाई स्थान)
- इकाई और दहाई का तिर्यक गुणा और योग: $(3 \times 5) + (1 \times 2) = 15 + 2 = 17$ (7 को दहाई स्थान पर, 1 हासिल)
- इकाई, दहाई और सैकड़ा का गुणा (तिर्यक और ऊर्ध्व): $(2 \times 5) + (1 \times 4) + (3 \times 2) = 10 + 4 + 6 = 20$ (हासिल 1 जोड़ें: $20+1 = 21$) (1 को सैकड़ा स्थान पर, 2 हासिल)
- दहाई और सैकड़ा का तिर्यक गुणा और योग: $(2 \times 2) + (3 \times 4) = 4 + 12 = 16$ (हासिल 2 जोड़ें: $16+2 = 18$) (8 को हजार स्थान पर, 1 हासिल)
- सैकड़ा का गुणा (ऊर्ध्व): $2 \times 4 = 8$ (हासिल 1 जोड़ें: $8+1 = 9$) (9 को दस हजार स्थान पर)
- उत्तर: 98175
एकन्यूनेन पूर्वेण विधि
- उपयोग: जब एक संख्या नौ की बनी हो (जैसे 9, 99, 999, आदि)।
- तीन स्थितियाँ:
- अंकों की संख्या बराबर हो (गुणक और गुण्य में):
- उदाहरण: $63 \times 99$
- बायाँ भाग: गुण्य (63) का एक न्यूनेन (एक कम) = 62
- दायाँ भाग: गुणक (99) में से बायाँ भाग (62) घटाएँ = $99 - 62 = 37$
- उत्तर: 6237
- उदाहरण: $3452 \times 9999$
- बायाँ भाग: $3452 - 1 = 3451$
- दायाँ भाग: $9999 - 3451 = 6548$
- उत्तर: 34516548
- गुणक में अंकों की संख्या गुण्य से अधिक हो (नौ अधिक हों):
- उदाहरण: $43 \times 999$
- गुण्य को गुणक के अंकों के बराबर बनाने के लिए बाईं ओर शून्य लगाएँ: $043 \times 999$
- बायाँ भाग: $043 - 1 = 042$
- दायाँ भाग: $999 - 042 = 957$
- उत्तर: 42957
- गुणक में अंकों की संख्या गुण्य से कम हो (नौ कम हों):
- उदाहरण: $438 \times 99$
- पहला चरण: गुण्य (438) का एक न्यूनेन = 437
- दूसरा चरण: 437 के बाद 99 यथावत लिखें = 43799
- तीसरा चरण: इसमें से पहले चरण का परिणाम (437) घटा दें = $43799 - 437 = 43362$
- उत्तर: 43362
एकाधिकेन पूर्वेण विधि
- उपयोग: जब गुण्य और गुणक की इकाइयों का योग 10 हो तथा शेष समूह समान हो।
- सूत्र: एकाधिकेन पूर्वेण तथा अन्त्ययोर्दशकेऽपि
- उदाहरण: $12 \times 18$
- इकाइयों का योग $2+8=10$, शेष समूह समान (1)।
- बायाँ भाग: दहाई का एकाधिक $\times$ दहाई = $(1+1) \times 1 = 2 \times 1 = 2$
- दायाँ भाग: इकाइयों का गुणनफल = $2 \times 8 = 16$
- उत्तर: 216
- उदाहरण: $21 \times 29$
- इकाइयों का योग $1+9=10$, शेष समूह समान (2)।
- बायाँ भाग: $(2+1) \times 2 = 3 \times 2 = 6$
- दायाँ भाग: $1 \times 9 = 9$ (इकाइयों का योग 10 है, जिसमें एक शून्य है, अतः दाएँ भाग में दो अंक रखने होंगे, इसलिए 09 लिखें)
- उत्तर: 609
- उदाहरण: $102 \times 108$
- इकाइयों का योग $2+8=10$, शेष समूह समान (10)।
- बायाँ भाग: $(10+1) \times 10 = 11 \times 10 = 110$
- दायाँ भाग: $2 \times 8 = 16$
- उत्तर: 11016
निखिलम् विधि
- उपयोग: जब संख्याएँ आधार (10, 100, 1000, आदि) या उपाधार (20, 30, 200, आदि) के निकट हों।
- विचलन: संख्या - आधार
- यदि संख्या आधार से बड़ी है, तो विचलन धनात्मक (+)।
- यदि संख्या आधार से छोटी है, तो विचलन ऋणात्मक (-)।
- उदाहरण: 12 (आधार 10) $\rightarrow +2$; 9 (आधार 10) $\rightarrow -1$; 104 (आधार 100) $\rightarrow +04$; 98 (आधार 100) $\rightarrow -02$
- गुणा निखिलम् (आधार):
- उदाहरण: $12 \times 14$ (आधार 10)
- संख्या: 12, विचलन: +2
- संख्या: 14, विचलन: +4
- दायाँ भाग: विचलनों का गुणा = $2 \times 4 = 8$
- बायाँ भाग: (प्रथम संख्या + दूसरी का विचलन) या (द्वितीय संख्या + प्रथम का विचलन) = $12+4 = 16$ या $14+2 = 16$
- उत्तर: 168
- नियम: उत्तर के दाएँ भाग में उतने ही अंक रखते हैं जितने आधार में शून्य होते हैं।
- उदाहरण: $16 \times 15$ (आधार 10)
- संख्या: 16, विचलन: +6
- संख्या: 15, विचलन: +5
- दायाँ भाग: $6 \times 5 = 30$ (आधार 10 में एक शून्य, अतः 0 रखें, 3 हासिल)
- बायाँ भाग: $16+5 = 21$ (हासिल 3 जोड़ें: $21+3 = 24$)
- उत्तर: 240
- उदाहरण: $8 \times 13$ (आधार 10)
- संख्या: 8, विचलन: -2
- संख्या: 13, विचलन: +3
- दायाँ भाग: $(-2) \times (+3) = -6$
- बायाँ भाग: $8+3 = 11$ या $13-2 = 11$
- उत्तर: $11 \overline{6}$ (110 - 6) = 104
- उदाहरण: $104 \times 108$ (आधार 100)
- संख्या: 104, विचलन: +04
- संख्या: 108, विचलन: +08
- दायाँ भाग: $04 \times 08 = 32$ (आधार 100 में दो शून्य, दो अंक रखें)
- बायाँ भाग: $104+08 = 112$ या $108+04 = 112$
- उत्तर: 11232
- उदाहरण: $92 \times 107$ (आधार 100)
- संख्या: 92, विचलन: -08
- संख्या: 107, विचलन: +07
- दायाँ भाग: $(-08) \times (+07) = -56$
- बायाँ भाग: $92+07 = 99$ या $107-08 = 99$
- उत्तर: $99 \overline{56}$ (9900 - 56) = 9844
- उदाहरण: $1014 \times 994$ (आधार 1000)
- संख्या: 1014, विचलन: +014
- संख्या: 994, विचलन: -006
- दायाँ भाग: $(+014) \times (-006) = -084$ (आधार 1000 में तीन शून्य, तीन अंक रखें)
- बायाँ भाग: $1014-006 = 1008$ या $994+014 = 1008$
- उत्तर: $1008 \overline{084}$ (1008000 - 84) = 1007916
किसी संख्या का वर्ग ज्ञात करना
- 1. एकाधिकेन पूर्वेण तथा अन्त्ययोर्दशकेऽपि (इकाई अंक 5 वाली संख्याओं के लिए):
- उदाहरण: $65^2$
- बायाँ भाग: दहाई $\times$ दहाई का एकाधिकेन = $6 \times (6+1) = 6 \times 7 = 42$
- दायाँ भाग: इकाइयों का गुणनफल = $5 \times 5 = 25$
- उत्तर: 4225
- 2. आनुरूप्येण विधि (दो अंकों की संख्या के लिए):
- सूत्र: $(a | b)^2 = a^2 | 2ab | b^2$
- प्रत्येक खंड में इकाई की ओर से एक-एक अंक रखें, शेष अंक बाईं ओर के खंड में हासिल के रूप में जोड़ें।
- उदाहरण: $64^2$
- $b^2 = 4^2 = 16$ (6 रखें, 1 हासिल)
- $2ab = 2 \times 6 \times 4 = 48$ (हासिल 1 जोड़ें: $48+1 = 49$) (9 रखें, 4 हासिल)
- $a^2 = 6^2 = 36$ (हासिल 4 जोड़ें: $36+4 = 40$)
- उत्तर: 4096
- 3. यावत् ऊनम् तावत् ऊनी कृत्य वर्गम् च योजयेत सूत्र (आधार के निकट की संख्याओं के लिए):
- सूत्र: संख्या = (संख्या + विचलन) | (विचलन)$^2$
- उदाहरण: $13^2$ (आधार 10 से +3 विचलन)
- $(13+3) | 3^2 = 16 | 9 = 169$
- उदाहरण: $7^2$ (आधार 10 से -3 विचलन)
- $(7-3) | (-3)^2 = 4 | 9 = 49$
- उदाहरण: $98^2$ (आधार 100 से -02 विचलन)
- $(98-2) | (02)^2 = 96 | 04 = 9604$
- उदाहरण: $106^2$ (आधार 100 से +06 विचलन)
- $(106+6) | 6^2 = 112 | 36 = 11236$
वर्गमूल (विलोकनम विधि)
- उपयोग: चार, पाँच अंकों तक की पूर्ण वर्ग संख्या का वर्गमूल अवलोकन से ज्ञात करना।
- नियम:
- जिन संख्याओं की इकाई 2, 3, 7, 8 हो, वे पूर्ण वर्ग संख्याएँ नहीं होंगी।
- वर्ग संख्या के अंकों के जितने जोड़े बनेंगे, वर्गमूल की संख्या में उतने अंक होंगे।
- जिन संख्याओं का बीजांक 2, 3, 5, 6 या 8 हो, वह संख्या पूर्णवर्ग नहीं है।
- वर्ग संख्या की इकाई से वर्गमूल की इकाई का निर्धारण:
- वर्ग की इकाई 1 $\rightarrow$ वर्गमूल की इकाई 1 या 9
- वर्ग की इकाई 4 $\rightarrow$ वर्गमूल की इकाई 2 या 8
- वर्ग की इकाई 5 $\rightarrow$ वर्गमूल की इकाई 5
- वर्ग की इकाई 6 $\rightarrow$ वर्गमूल की इकाई 4 या 6
- वर्ग की इकाई 9 $\rightarrow$ वर्गमूल की इकाई 3 या 7
- वर्ग की इकाई 0 $\rightarrow$ वर्गमूल की इकाई 0
- उदाहरण: $\sqrt{6889}$
- दो जोड़े बन रहे हैं (68 और 89), अतः वर्गमूल में दो अंक होंगे।
- दाएँ जोड़े (89) से इकाई निर्धारित करें: वर्ग की इकाई 9 है, अतः वर्गमूल की इकाई 3 या 7 होगी।
- बाएँ जोड़े (68) से दहाई निर्धारित करें: 68 का निकटतम वर्गमूल 8 है ($8^2=64$, $9^2=81$)। $9^2$ 68 से अधिक है, अतः दहाई में 8 रखेंगे।
- संभावित उत्तर 83 या 87।
- मध्य की संख्या 85 का वर्ग ज्ञात करें: $85^2 = 7225$ (एकाधिकेन पूर्वेण से)।
- चूंकि 6889, 7225 से छोटी है, अतः वर्गमूल 85 से छोटी संख्या 83 होगा।
- उत्तर: 83
ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम् सूत्र: यह विधि किसी भी संख्या के गुणा के लिए लागू होती है। यह अंकों को लंबवत और तिर्यक रूप से गुणा करने और जोड़ने पर आधारित है।
वैदिक गणित की ये विधियाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में गणना की गति बढ़ाने के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इनका नियमित अभ्यास करें।
ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम् विधि से गुणा
यह खंड वैदिक गणित की गुणा विधियों को विस्तार से समझाता है, जो अंकगणित और बीजगणित दोनों में उपयोगी हैं।
गुणा की वैदिक गणित विधियाँ
1. ऊर्ध्व तिर्यक विधि
- सूत्र: ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम् (ऊर्ध्व = खड़ा, तिर्यक = तिरछा)
- अनुप्रयोग: किसी भी संख्या के गुणा के लिए।
- दो अंकों की संख्याओं के लिए चरण:
- प्रथम स्तंभ (इकाई): इकाइयों का ऊर्ध्व गुणा करें।
- प्रथम एवं द्वितीय स्तंभ (इकाई और दहाई): तिर्यक गुणा करके जोड़ें।
- द्वितीय स्तंभ (दहाई): दहाइयों का ऊर्ध्व गुणा करें।
- उदाहरण: $41 \times 38$
- $1 \times 8 = 8$ (इकाई)
- $(4 \times 8) + (1 \times 3) = 32 + 3 = 35$ (5 दहाई, 3 हासिल)
- $4 \times 3 = 12$ (हासिल 3 जोड़ें: $12+3 = 15$) (सैकड़ा और हजार)
- उत्तर: 1558
- तीन अंकों की संख्याओं के लिए चरण:
- इकाई का ऊर्ध्व गुणा।
- इकाई और दहाई का तिर्यक गुणा और योग।
- इकाई, दहाई और सैकड़ा का तिर्यक गुणा (बाहरी) और ऊर्ध्व गुणा (मध्य) का योग।
- दहाई और सैकड़ा का तिर्यक गुणा और योग।
- सैकड़ा का ऊर्ध्व गुणा।
- उदाहरण: $231 \times 425$
- $1 \times 5 = 5$
- $(3 \times 5) + (1 \times 2) = 15 + 2 = 17$ (7, 1 हासिल)
- $(2 \times 5) + (1 \times 4) + (3 \times 2) = 10 + 4 + 6 = 20$ (हासिल 1 जोड़ें: $20+1 = 21$) (1, 2 हासिल)
- $(2 \times 2) + (3 \times 4) = 4 + 12 = 16$ (हासिल 2 जोड़ें: $16+2 = 18$) (8, 1 हासिल)
- $2 \times 4 = 8$ (हासिल 1 जोड़ें: $8+1 = 9$)
- उत्तर: 98175
2. एकन्यूनेन पूर्वेण विधि
- उपयोग: जब एक संख्या नौ की बनी हो (जैसे 9, 99, 999)।
- स्थितियाँ:
- 1. अंकों की संख्या बराबर हो:
- बायाँ भाग: गुण्य में से 1 घटाएँ।
- दायाँ भाग: गुणक में से बायाँ भाग घटाएँ।
- उदाहरण: $63 \times 99 \rightarrow$ बायाँ: $63-1=62$, दायाँ: $99-62=37$. उत्तर: 6237
- 2. गुणक में अंकों की संख्या गुण्य से अधिक हो (नौ अधिक हों):
- गुण्य के बाईं ओर शून्य लगाकर अंकों की संख्या बराबर करें।
- बायाँ भाग: संशोधित गुण्य में से 1 घटाएँ।
- दायाँ भाग: गुणक में से बायाँ भाग घटाएँ।
- उदाहरण: $43 \times 999 \rightarrow 043 \times 999$. बायाँ: $043-1=042$, दायाँ: $999-042=957$. उत्तर: 42957
- 3. गुणक में अंकों की संख्या गुण्य से कम हो (नौ कम हों):
- पहला भाग: गुण्य में से 1 घटाएँ।
- दूसरा भाग: पहले भाग के बाद गुणक यथावत लिखें।
- तीसरा भाग: दूसरे भाग में से पहले भाग घटाएँ।
- उदाहरण: $438 \times 99 \rightarrow$ बायाँ: $438-1=437$. $43799 - 437 = 43362$. उत्तर: 43362
3. एकाधिकेन पूर्वेण विधि
- उपयोग: जब गुण्य और गुणक की इकाइयों का योग 10 हो तथा शेष समूह समान हो।
- सूत्र: एकाधिकेन पूर्वेण तथा अन्त्ययोर्दशकेऽपि
- चरण:
- बायाँ भाग: समान समूह का एकाधिकेन $\times$ समान समूह।
- दायाँ भाग: इकाइयों का गुणनफल।
- उदाहरण: $12 \times 18$
- समान समूह 1, इकाइयों का योग $2+8=10$.
- बायाँ: $(1+1) \times 1 = 2$.
- दायाँ: $2 \times 8 = 16$.
- उत्तर: 216
- उदाहरण: $21 \times 29$
- समान समूह 2, इकाइयों का योग $1+9=10$.
- बायाँ: $(2+1) \times 2 = 6$.
- दायाँ: $1 \times 9 = 9$ (दो अंकों में लिखने के लिए 09).
- उत्तर: 609
4. निखिलम् विधि
- उपयोग: जब संख्याएँ आधार (10, 100, 1000) या उपाधार के निकट हों।
- विचलन: संख्या - आधार।
- धनात्मक (+) यदि संख्या आधार से बड़ी हो।
- ऋणात्मक (-) यदि संख्या आधार से छोटी हो।
- चरण:
- दायाँ भाग: विचलनों का गुणनफल। दाएँ भाग में आधार में जितने शून्य हों, उतने ही अंक रखें।
- बायाँ भाग: (प्रथम संख्या + दूसरी का विचलन) या (द्वितीय संख्या + प्रथम का विचलन)।
- उदाहरण: $12 \times 14$ (आधार 10)
- विचलन: $12 \rightarrow +2$, $14 \rightarrow +4$.
- दायाँ: $2 \times 4 = 8$.
- बायाँ: $12+4 = 16$.
- उत्तर: 168
- उदाहरण: $92 \times 107$ (आधार 100)
- विचलन: $92 \rightarrow -08$, $107 \rightarrow +07$.
- दायाँ: $(-08) \times (+07) = -56$.
- बायाँ: $92+7 = 99$.
- उत्तर: $99 \overline{56} = 9900 - 56 = 9844$.
किसी संख्या का वर्ग ज्ञात करना
1. एकाधिकेन पूर्वेण तथा अन्त्ययोर्दशकेऽपि (इकाई अंक 5 वाली संख्याओं के लिए)
- उदाहरण: $65^2$
- बायाँ: $6 \times (6+1) = 42$.
- दायाँ: $5 \times 5 = 25$.
- उत्तर: 4225
2. आनुरूप्येण विधि (दो अंकों की संख्या के लिए)
- सूत्र: $(a | b)^2 = a^2 | 2ab | b^2$
- उदाहरण: $64^2$
- $b^2 = 4^2 = 16$ (6 लिखें, 1 हासिल)
- $2ab = 2 \times 6 \times 4 = 48$ (हासिल 1 जोड़ें: $48+1 = 49$) (9 लिखें, 4 हासिल)
- $a^2 = 6^2 = 36$ (हासिल 4 जोड़ें: $36+4 = 40$)
- उत्तर: 4096
3. यावत् ऊनम् तावत् ऊनी कृत्य वर्गम् च योजयेत सूत्र (आधार के निकट की संख्याओं के लिए)
- सूत्र: संख्या = (संख्या + विचलन) | (विचलन)$^2$
- उदाहरण: $13^2$ (आधार 10, विचलन +3)
- $(13+3) | 3^2 = 16 | 9 = 169$
- उदाहरण: $98^2$ (आधार 100, विचलन -02)
- $(98-2) | (02)^2 = 96 | 04 = 9604$
वर्गमूल (विलोकनम विधि)
- उपयोग: पूर्ण वर्ग संख्याओं का वर्गमूल अवलोकन से ज्ञात करना।
- चरण:
- वर्ग संख्या के अंकों के जोड़े बनाएँ। वर्गमूल में उतने ही अंक होंगे जितने जोड़े।
- इकाई अंक से वर्गमूल की इकाई निर्धारित करें (तालिका देखें)।
- बाएँ जोड़े से वर्गमूल की दहाई निर्धारित करें (निकटतम वर्गमूल)।
- मध्य की संख्या के वर्ग से तुलना करके अंतिम अंक चुनें।
- उदाहरण: $\sqrt{6889}$
- जोड़े: 68 | 89. वर्गमूल में दो अंक।
- इकाई 9 $\rightarrow$ वर्गमूल की इकाई 3 या 7।
- 68 का निकटतम वर्गमूल 8 ($8^2=64$, $9^2=81$)। दहाई 8।
- संभावित उत्तर: 83 या 87।
- $85^2 = 7225$. चूंकि $6889 < 7225$, अतः $\sqrt{6889} = 83$.
निखिलम् विधि में ऋणात्मक विचलन आने पर, दाएँ भाग के ऋणात्मक गुणनफल को बाएँ भाग से घटाया जाता है।
वर्ग और वर्गमूल ज्ञात करने की वैदिक विधियाँ तेज गणना के लिए बहुत प्रभावी हैं। विशेषकर इकाई अंक 5 वाली संख्याओं के वर्ग और पूर्ण वर्ग संख्याओं के वर्गमूल के लिए विलोकनम् विधि का अभ्यास करें।
परावर्त्य विधि से भाग
परावर्त्य विधि अंकगणित और बीजगणित दोनों में भाग के लिए उपयोगी है।
परावर्त्य विधि से भाग के चरण
- भाजक और भाज्य को व्यवस्थित करें:
- भाजक को $x+a$ या $x-a$ के रूप में लिखें।
- संशोधित भाजक (विचलन का परावर्त्य) ज्ञात करें। यदि भाजक $x+a$ है, तो संशोधित भाजक $-a$ होगा। यदि $x-a$ है, तो संशोधित भाजक $+a$ होगा।
- भाज्य के गुणांकों को घात के घटते क्रम में लिखें। यदि कोई घात अनुपस्थित है, तो उसका गुणांक शून्य (0) लिखें।
- विभाजन रेखा खींचें: संशोधित भाजक में जितने अंक हैं, भाज्य के इकाई की ओर से उतने अंक छोड़कर विभाजन रेखा खींचें।
- भागफल और शेषफल ज्ञात करें:
- भाज्य का प्रथम अंक उत्तर का प्रथम अंक (भागफल का प्रथम गुणांक) होगा।
- उत्तर के प्रथम अंक को संशोधित भाजक से गुणा करें और गुणनफल को भाज्य के अगले अंक के नीचे लिखें।
- अगले अंक और गुणनफल को जोड़ें, यह उत्तर का द्वितीय अंक होगा।
- यह प्रक्रिया तब तक दोहराएँ जब तक विभाजन रेखा पार न हो जाए।
- विभाजन रेखा के बाद के अंक शेषफल के गुणांक होंगे।
अंकगणित में परावर्त्य विधि (बीजगणितीय अवधारणा का उपयोग)
- उदाहरण: $7x^2 - 5x + 3$ को $x+1$ से भाग दीजिए।
- भाजक: $x+1 \rightarrow$ विचलन $+1 \rightarrow$ संशोधित भाजक $-1$
- भाज्य के गुणांक: $7, -5, 3$
- चरण:
` -1 | 7 -5 3 | -7 12 ---------------- 7 -12 | 15 `
- भागफल: $7x - 12$
- शेषफल: 15
- उदाहरण: $x^3 + 2x + 12$ को $x+2$ से भाग दीजिए।
- भाजक: $x+2 \rightarrow$ विचलन $+2 \rightarrow$ संशोधित भाजक $-2$
- भाज्य के गुणांक: $1, 0, 2, 12$ (क्योंकि $x^2$ पद अनुपस्थित है)
- चरण:
` -2 | 1 0 2 12 | -2 4 -12 ----------------- 1 -2 6 | 0 `
- भागफल: $x^2 - 2x + 6$
- शेषफल: 0
- उदाहरण: $4x^3 - 5x - 9$ को $2x+1$ से भाग दीजिए।
- महत्वपूर्ण: इस विधि में भाजक में चर की अधिकतम घात वाले पद का गुणांक 1 होना चाहिए।
- भाजक $2x+1$ को 2 से भाग दें: $x + \frac{1}{2}$
- संशोधित भाजक: $-\frac{1}{2}$
- भाज्य के गुणांक: $4, 0, -5, -9$
- चरण:
` -1/2 | 4 0 -5 -9 | -2 1 2 ------------------ 4 -2 -4 | -7 `
- भागफल के गुणांक: $4, -2, -4$
- शेषफल: $-7$
- चूंकि हमने भाजक को 2 से भाग दिया था, भागफल के गुणांकों को भी 2 से भाग दें:
- भागफल: $\frac{4}{2}x^2 - \frac{2}{2}x - \frac{4}{2} = 2x^2 - x - 2$
- शेषफल: $-7$ (शेषफल में कोई परिवर्तन नहीं होता)
बीजगणित - गुणा (ऊर्ध्वतिर्यक विधि) से
- उपयोग: बीजगणितीय व्यंजकों के गुणा के लिए ऊर्ध्वतिर्यक विधि का प्रयोग।
- उदाहरण: $(3x+1)$ को $(2x+4)$ से गुणा करें।
- चरण:
- इकाई पद का गुणा (ऊर्ध्व): $(+1) \times (+4) = +4$
- तिर्यक गुणा और योग: $(3x \times 4) + (1 \times 2x) = 12x + 2x = 14x$
- दहाई पद का गुणा (ऊर्ध्व): $(3x) \times (2x) = 6x^2$
- उत्तर: $6x^2 + 14x + 4$
- बीजांक से उत्तर की जाँच (बीजगणित में):
- (प्रथम व्यंजक के गुणांकों का बीजांक $\times$ द्वितीय व्यंजक के गुणांकों का बीजांक) का बीजांक = उत्तर के गुणांकों का बीजांक।
- उदाहरण: $(3x+1) \times (2x+4) = 6x^2 + 14x + 4$
- प्रथम व्यंजक के गुणांकों का बीजांक: $(3+1) = 4$
- द्वितीय व्यंजक के गुणांकों का बीजांक: $(2+4) = 6$
- $(4 \times 6) = 24 \rightarrow 6$
- उत्तर के गुणांकों का बीजांक: $(6+14+4) = 24 \rightarrow 6$
- दोनों बीजांक 6 हैं, अतः उत्तर सही है।
- उदाहरण: बहुपदों $x^2 + 3x + 2$ और $5x^2 + x + 1$ का गुणनफल।
- चरण (ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम् विधि):
- इकाई पद: $2 \times 1 = 2$
- $x$ पद: $(3x \times 1) + (2 \times x) = 3x + 2x = 5x$
- $x^2$ पद: $(x^2 \times 1) + (2 \times 5x^2) + (3x \times x) = x^2 + 10x^2 + 3x^2 = 14x^2$
- $x^3$ पद: $(x^2 \times x) + (3x \times 5x^2) = x^3 + 15x^3 = 16x^3$
- $x^4$ पद: $x^2 \times 5x^2 = 5x^4$
- उत्तर: $5x^4 + 16x^3 + 14x^2 + 5x + 2$
परावर्त्य विधि में, यदि भाजक में चर की अधिकतम घात वाले पद का गुणांक 1 न हो, तो भागफल के गुणांकों को उस गुणांक से भाग देना आवश्यक है।
बीजगणितीय गुणा और भाग में वैदिक विधियों का प्रयोग जटिल गणनाओं को सरल और तीव्र बनाता है। अभ्यास से इन विधियों में दक्षता प्राप्त की जा सकती है।
बीजगणित का ऐतिहासिक विकास
गणित, विशेषकर बीजगणित, का विकास मानव सभ्यता के साथ-साथ हुआ है।
- गणित का जीवन से जुड़ाव:
- खरीद-फरोख्त, निर्माण कार्य, दैनिक दिनचर्या या बड़ी योजनाएँ - हर जगह गणित का उपयोग होता है।
- यह जुड़ाव आज का नहीं, बल्कि इंसानी सभ्यता के विकास के साथ ही गणित की विकास यात्रा भी लगातार जारी है।
- बीजगणित का जन्म:
- मनुष्य ने संख्याओं के साथ-साथ व्यापक संकेतों का इस्तेमाल करके समस्याओं का हल ढूंढने की कोशिश की।
- ऐसी कोशिशों से ही गणित की उस शाखा का जन्म हुआ जिसे आज हम बीजगणित कहते हैं।
- परिभाषा: बीजगणित, गणित की वह शाखा है जिसमें संख्याओं को अक्षरों (चरों) द्वारा निरूपित किया जाता है, परंतु संक्रिया के चिह्न वही रहते हैं जिनका प्रयोग अंकगणित में होता है।
- बीजगणित के विकास के चरण:
- प्राचीन काल (ईसा से 2000 वर्ष पूर्व): लोग अटकल लगाकर समीकरणों को हल करते थे।
- ईसा पूर्व 300 से 250 ईसवी: बीजगणित आम बोलचाल की भाषा में वर्णित किया जाता था।
- उदाहरण: $x+1=2$ को "किसी संख्या में एक जोड़ने पर दो प्राप्त होता है" कहा जाता था।
- लगभग 250 ईसवी (डायोफेन्टस की 'अरिथमेटिका'): कुछ आशुलिपिक संकेतों का प्रयोग दिखाई पड़ता है।
- ब्रह्मगुप्त ('ब्रह्मस्फुट सिद्धांत'): डायोफेन्टस जैसी बातें लिखीं।
- उदाहरण: "$x$ में जब 1 जोड़ते हैं तब 2 प्राप्त होता है।"
- 1600 ईसवी के बाद: चरों और स्थिर संख्याओं को संकेतों के रूप में लिखा जाने लगा।
- उदाहरण: $ax+b=c$ जहाँ $x$ चर और $a, b, c$ स्थिर संख्याएँ हैं।
- भारत का योगदान:
- शुल्व सूत्र (लगभग 800-500 ईसा पूर्व):
- यज्ञ के लिए विभिन्न प्रकार की वेदियों की रचना से संबंधित।
- निश्चित क्षेत्रफल की किंतु अलग-अलग आकृतियों की वेदियों के निर्माण की समस्याओं का हल।
- उदाहरण: किसी वर्ग के क्षेत्रफल के बराबर आयत की रचना करना। यदि वर्ग की भुजा 'व' और आयत की लंबाई 'ल' निश्चित हो, तो चौड़ाई 'च' के लिए समीकरण $व \times व = ल \times च$ बनता है।
- छठवीं शताब्दी ईसापूर्व: अंकगणित व संख्या समूहों को व्यापक रूप में लिखने का बहुत सारा काम हुआ।
- पाँचवीं व छठी शताब्दी (आर्यभट्ट व ब्रह्मगुप्त): संख्या श्रेणियों के कई तरह के व्यापक जोड़ और द्विघाती व सरल समीकरणों के हल पता किए।
- बारहवीं शताब्दी: अवकलजों, अतिसूक्ष्मों, मध्यमान प्रमेय आदि पर बहुत काम हुआ।
- चौदहवीं शताब्दी: sine (ज्या), cosine (कोज्या) के लिए अनंत श्रेणी आदि पर काम किया गया।
- वैश्विक विकास और आदान-प्रदान:
- दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी गणितज्ञों ने इस दिशा में काम किया (जैसे 500-300 ई.पू. में आर्कमिडीज ने प्राकृतिक संख्याओं के वर्गों का योग प्राप्त करने का तरीका ढूंढा)।
- भारतीय गणित, यूनानी व अरबी गणित में कई तरह का आदान-प्रदान भी हुआ।
- आज का 'एलजेब्रा' या 'बीजगणित' अलग-अलग जगह हुए प्रयासों की मिली-जुली समझ है।
- निष्कर्ष: गणित का इतिहास अत्यंत समृद्ध और विकासशील रहा है, जिसमें विभिन्न सभ्यताओं और गणितज्ञों का योगदान है।
बीजगणित अज्ञात राशियों को अक्षरों से निरूपित करके समस्याओं को हल करने की विधि है, जो अंकगणित से विकसित हुई।
शुल्व सूत्रों में ज्यामितीय समस्याओं के बीजगणितीय हल निहित थे, जो प्राचीन भारतीय गणित की गहराई को दर्शाते हैं।