जैव विविधता एवं वर्गीकरण
यह अध्याय जीवों में पाई जाने वाली विशाल विविधता और उनके वर्गीकरण के महत्व को समझाता है। छात्र विभिन्न वर्गीकरण प्रणालियों, जैसे लीनियस का द्विजगत वर्गीकरण और व्हिटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण, के बारे में जानेंगे। इसमें मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनीमेलिया जैसे विभिन्न जगतों की विशेषताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है। यह अध्याय जीवों के नामकरण की द्विनाम पद्धति और वर्गीकरण के बदलते स्वरूप पर भी प्रकाश डालता है, जो छात्रों को जीव विज्ञान की मूलभूत अवधारणाओं को समझने में मदद करेगा।
जैव विविधता और जीवों में समानताएँ व भिन्नताएँ
जीवों में विविधता और समानताएँ:
- हमारे आस-पास विभिन्न प्रकार के जीव पाए जाते हैं, जिनमें कुछ समानताएँ और कुछ भिन्नताएँ होती हैं।
- समानताएँ: एक ही समूह या जाति के सदस्य आपस में अधिक समान लक्षण साझा करते हैं। उदाहरण के लिए, सभी मनुष्य सुविकसित मस्तिष्क और त्वचा पर कम घने बाल रखते हैं।
- भिन्नताएँ (विविधताएँ): एक ही जाति के सदस्यों में भी कुछ अंतर पाए जाते हैं। इन अंतरों को ही विभिन्नताएँ कहते हैं।
- उदाहरण: मनुष्यों में लंबाई, वजन, उंगलियों के निशान आदि में अंतर।
- जैव-विविधता: किसी क्षेत्र विशेष में पाए जाने वाले जीवों के विविध प्रकारों को उस क्षेत्र की जैव-विविधता कहते हैं।
- महत्व: इन विविधताओं के कारण ही हम एक ही जाति के सदस्यों को व्यक्तिगत स्तर पर पहचान पाते हैं।
जाति (Species): जीवों का वह समूह जिसके सदस्यों में अधिकांश लक्षण समान होते हैं और वे आपस में प्रजनन कर संतति उत्पन्न कर सकते हैं।
जैव विविधता का अध्ययन करने और उसे व्यवस्थित रूप से समझने के लिए वर्गीकरण की आवश्यकता होती है।
समूहीकरण एवं वर्गीकरण की प्रक्रिया
- समूहीकरण: वस्तुओं या जीवों को उनके समान गुणों के आधार पर एक साथ रखना समूहीकरण कहलाता है। यह एक अनौपचारिक प्रक्रिया हो सकती है।
- उदाहरण: रसोई घर का सामान, खेल का सामान।
- वर्गीकरण: यह समूहीकरण का एक विशिष्ट तरीका है जहाँ वस्तुओं या जीवों को उनके गुणों की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर वर्गों में बाँटा जाता है।
- विशेषताएँ:
- प्रत्येक स्तर पर गुण विशेष को आधार बनाया जाता है।
- एक वर्ग की सभी वस्तुओं में अधिकतम समानताएँ होती हैं।
- उन्हें अन्य वर्ग में नहीं रखा जा सकता।
- वर्गीकरण का महत्व: यह हमें पदार्थों और जीवों के बारे में विस्तृत और व्यवस्थित जानकारी प्राप्त करने में मदद करता है, जिससे उनका अध्ययन आसान हो जाता है।
- उपयोग: वर्गीकरण का उपयोग विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में होता है, जैसे पदार्थों का वर्गीकरण, विलयनों का वर्गीकरण, जीवों का वर्गीकरण आदि।
वर्गीकरण: वह प्रक्रिया जिसमें जीवों को उनके गुणों और विकास के आधार पर एक निश्चित श्रृंखला के अंतर्गत विभिन्न समूहों में व्यवस्थित किया जाता है।
समूहीकरण और वर्गीकरण के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें। वर्गीकरण अधिक व्यवस्थित और पदानुक्रमित होता है।
समूहीकरण एवं वर्गीकरण के पूर्व प्रयास
- अरस्तू (Aristotle):
- सर्वप्रथम जीवों को उनके आवास के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया।
- समूह: जलीय और स्थलीय जीव।
- जॉन रे (John Ray) (1686):
- पौधों के वर्गीकरण में उनके बाह्य लक्षणों को आधार बनाया।
- केरोलस लीनियस (Carolus Linnaeus) (1735):
- महत्वपूर्ण कार्य: फूलों में नर व मादा अंगों की उपस्थिति व संख्या के आधार पर एक सरल वर्गीकरण दिया, जिसे लैंगिक वर्गीकरण कहते हैं।
- पुस्तक: "सिस्टेमा नेचुरे" (Systema Naturae)।
- द्विजगत वर्गीकरण: संपूर्ण जीव-जगत को दो जगतों में बाँटा:
- पादप जगत
- जंतु जगत
- पदानुक्रम (Hierarchy): वर्गीकरण में सबसे पहले पदानुक्रम शब्द का प्रयोग किया। पदानुक्रम जीवों को उनके गुणों और विकास के आधार पर विभिन्न समूहों में व्यवस्थित करने की प्रक्रिया है।
- मनुष्य का पदानुक्रम उदाहरण:
- जगत (Kingdom): ऐनिमेलिया (बहुकोशिकीय, यूकेरियोटिक, अंतर्ग्रहण पोषण विधि)
- संघ (Phylum): कॉर्डेटा (कशेरूक दंड, जोड़ीदार उपांग)
- वर्ग (Class): मेमेलिया (शरीर रोएँ से ढका, बाह्यकर्ण उपस्थित)
- गण (Order): प्रायमेट्स (अंगूठे की स्थिति विपरीत, अग्र व पश्च पाद में पाँच-पाँच अँगुलियाँ)
- कुल (Family): होमोनीड (द्विपाद चलन)
- वंश (Genus): होमो (सुविकसित मस्तिष्क)
- जाति (Species): सेपियंस
- द्विजगत वर्गीकरण की कमियाँ:
- कई जीव ऐसे थे जो पादप और जंतु दोनों के लक्षण दर्शाते थे (जैसे यूग्लीना)।
- लीनियस के समय कोशिकाओं की आंतरिक संरचना (जैसे केंद्रक झिल्ली) के बारे में जानकारी का अभाव था।
- सूक्ष्मदर्शी के विकास के साथ नई जानकारियाँ सामने आईं, जिससे वर्गीकरण के नए आधारों की आवश्यकता महसूस हुई।
यूग्लीना: एककोशिकीय जीव जिसमें जंतु (कोशिका भित्ति का अभाव, प्रचलन) और पौधे (हरित लवक, प्रकाशसंश्लेषण) दोनों के लक्षण मिलते हैं। यह स्वपोषण और विषमपोषण दोनों प्रकार से भोजन प्राप्त कर सकता है।
केरोलस लीनियस को आधुनिक वर्गीकरण का जनक कहा जाता है।
व्हिटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण
- आर.एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) (1969) ने जीवों को पाँच जगत में वर्गीकृत किया।
- वर्गीकरण के मुख्य आधार:
- केन्द्रक झिल्ली की अनुपस्थिति व उपस्थिति: प्रोकेरियोटिक (झिल्ली रहित केंद्रक) व यूकेरियोटिक (झिल्ली सहित केंद्रक)।
- संगठन का स्तर: एककोशिकीय (एक कोशिका से बने) व बहुकोशिकीय (अनेक कोशिकाओं से बने)।
- पोषण प्राप्त करने की विधि: स्वपोषी (अपना भोजन स्वयं बनाने वाले) व विषमपोषी (दूसरों पर निर्भर रहने वाले)।
- पाँच जगत:
- जगत मोनेरा (Kingdom Monera):
- विशेषताएँ:
- सभी एककोशिकीय और प्रोकेरियोटिक (झिल्ली रहित केंद्रक) जीव।
- स्वपोषी या विषमपोषी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
- कोशिका झिल्ली के चारों ओर कोशिका भित्ति होती है, जो पेप्टिडोग्लाइकेन (प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट) से बनी होती है।
- उदाहरण: जीवाणु (बैक्टीरिया), एनाबीना (सायनोबैक्टीरिया)।
- जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista):
- विशेषताएँ:
- सभी एककोशिकीय और यूकेरियोटिक (झिल्ली सहित केंद्रक) जीव।
- स्वपोषी व विषमपोषी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
- जीवन की सभी क्रियाएँ एक ही कोशिका द्वारा संपन्न होती हैं।
- उदाहरण: अमीबा, पैरामीशियम, एंट अमीबा, यूग्लीना।
- जगत फंजाई (कवक) (Kingdom Fungi):
- विशेषताएँ:
- अधिकांश तंतुमयी होते हैं, जो कवक जाल (माइसीलियम) बनाते हैं।
- एककोशिकीय या बहुकोशिकीय, यूकेरियोटिक और विषमपोषी होते हैं।
- कोशिकाओं में हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) नहीं पाया जाता है।
- कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
- पोषण: मृतोपजीवी (सड़े-गले पदार्थों से भोजन), परजीवी (अन्य जीवों पर निर्भर), सहजीवी (लाइकेन)।
- उदाहरण: म्यूकर, यीस्ट, एगेरिकस (मशरूम), राइजोपस (ब्रेड मोल्ड), एस्पर्जिलस, पेनिसीलियम।
- जगत प्लांटी (पादप) (Kingdom Plantae):
- विशेषताएँ:
- सभी बहुकोशिकीय और यूकेरियोटिक जीव।
- अधिकांश पौधों में हरित लवक पाया जाता है, जिससे वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं (स्वपोषी)।
- कोशिका भित्ति सेलुलोज की बनी होती है।
- उदाहरण: स्पाइरोगाइरा (शैवाल), फ्यूनेरिया (मॉस), फर्न, साइकस, नीम, धान।
- पादप जगत का वर्गीकरण (पुष्पीय पौधों के संदर्भ में):
- जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी): बीज आवरण रहित (उदा. साइकस)।
- एंजियोस्पर्म (आवृतबीजी): बीज आवरण सहित।
- द्विबीजपत्री: एक से अधिक बीजपत्र, मूसला जड़ें, जालिकावत शिरा विन्यास (उदा. चना, मटर, मूंग)।
- एकबीजपत्री: एक बीजपत्र, झकड़ा जड़ें, समानांतर शिरा विन्यास (उदा. गेहूँ, मक्का)।
- जगत ऐनिमेलिया (जंतु जगत) (Kingdom Animalia):
- विशेषताएँ:
- सभी बहुकोशिकीय, यूकेरियोटिक और विषमपोषी जीव।
- कोशिकाओं के चारों ओर कोशिका भित्ति और हरित लवक नहीं पाया जाता है।
- पोषण अंतर्ग्रहण द्वारा होता है (भोजन ग्रहण करने के लिए विशिष्ट अंग)।
- अधिकांश जंतुओं में प्रचलन अंग पाए जाते हैं।
- उदाहरण: शेर, मैना, मछली, मनुष्य, हाइड्रा, फीताकृमि, केंचुआ, घोंघा, बिच्छू, सितारा मछली।
- जंतु जगत का वर्गीकरण (रीढ़ की हड्डी के आधार पर):
- रीढ़ की हड्डी उपस्थित (कशेरुकी):
- स्तनधारी: त्वचा पर बाल (मनुष्य, शेर, गाय, चमगादड़)।
- पक्षी: शरीर पर पंख (मैना, तोता, कौवा)।
- मत्स्य: शरीर पर शल्क (रोहू, कतला)।
- उभयचर: त्वचा नमीयुक्त (मेंढ़क, टोड)।
- सरीसृप: त्वचा शुष्क, शल्कयुक्त (छिपकली, साँप, कछुआ)।
- रीढ़ की हड्डी अनुपस्थित (अकशेरुकी): केंचुआ, जोंक, मच्छर, घोंघा, चींटी, फीताकृमि।
मोनेरा जगत में पेप्टिडोग्लाइकेन की बनी कोशिका भित्ति होती है, जो पौधों की सेलुलोज भित्ति से भिन्न होती है।
लाइकेन: कवक और शैवाल की सहजीविता से बना एक समुदाय, जहाँ दोनों जीव एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।
अमरबेल प्लांटी जगत का एक परजीवी पौधा है जिसमें पर्णहरित नहीं होता और यह दूसरे पौधों से भोजन प्राप्त करता है।
नामकरण की आवश्यकता एवं प्रक्रिया
- नामकरण की आवश्यकता:
- किसी भी जीव या वस्तु को विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं और बोलियों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है (उदा. आलू को हिंदी में आलू, अंग्रेजी में पोटेटो)।
- यह पहचान में असुविधा पैदा करता है।
- इस असुविधा को दूर करने और सार्वभौमिक पहचान के लिए वैज्ञानिक नामकरण की आवश्यकता हुई।
- द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature):
- केरोलस लीनियस द्वारा प्रतिपादित।
- प्रत्येक जीव का नाम दो शब्दों में रखा जाता है, जो पूरे विश्व में एक समान होता है।
- द्विनाम पद्धति के नियम:
- पहला शब्द: वंश (Genus) का नाम होता है।
- दूसरा शब्द: जाति (Species) का नाम होता है।
- वंश का नाम: पहला अक्षर अंग्रेजी के बड़े अक्षर से शुरू होता है, बाकी अक्षर छोटे होते हैं।
- जाति का नाम: सभी अक्षर अंग्रेजी के छोटे अक्षरों में लिखे जाते हैं।
- लिखने का तरीका: वंश और जाति के नाम को तिरछे अक्षरों (Italic) में लिखा जाता है। यदि सीधे अक्षरों में लिखा जाए, तो उनके नीचे रेखा खींची जाती है।
- उदाहरण:
- मेंढक: _Rana tigrina_
- शेर: _Panthera leo_
- गौरेया: _Passer domesticus_
- मनुष्य: _Homo sapiens_
- वर्गीकरण का बदलता स्वरूप:
- प्रकृति में प्रजातियों की विलुप्ति और नई प्रजातियों का विकास एक सतत प्रक्रिया है।
- जैसे-जैसे नए जीवों की खोज होती है और जैव विविधता के आयाम बदलते हैं, वर्गीकरण के आधार और स्वरूप भी बदलते रहते हैं।
- व्हिटेकर की पाँच जगत प्रणाली भी पूर्ण नहीं है और भविष्य में इसमें बदलाव संभव हैं।
द्विनाम पद्धति: जीवों के नामकरण की वह प्रणाली जिसमें प्रत्येक जीव का नाम दो शब्दों (वंश और जाति) से मिलकर बनता है।
द्विनाम पद्धति के नियमों को याद रखना महत्वपूर्ण है, खासकर वंश और जाति के नाम लिखने का तरीका (बड़े/छोटे अक्षर, इटैलिक/रेखांकन)।